Saturday, August 2, 2014

अरुण कोलटकर की कविता "मनोहर" का हिंदी अनुवाद

देख खुला दरवाज़ा, मनोहर
एक और मंदिर में झाँका।  

कौन से प्रभु से यहाँ मिलूंगा
विस्मय संग अंदर को आया।   

ज्यों उसने वहां बछड़ा पाया
तुरंत कूद वो बाहर आया। 

एक और मंदिर था जाना
पर ये तो गौशाला निकली।

अंग्रेजी में लिखी मूल कविता

सम्यक दृष्टि

कुछ हैं, जिनकी समझ बड़ी है
बात समझते रहते हरदम
समझ-समझ के हेर फेर में
रहते तले ये नासमझी के

बुद्ध कह गए सम्यक दृष्टि
कहाँ कठिन सी बात कही है
इसको भी तू बूझेगा तो
"समझ" अकल में गिरह लगी है