Saturday, July 5, 2014

असग़र वजाहत साहिब से भेंट

यह बात '94 से '96 के बीच की रही होगी। उन दिनों हिंदी की इंडिया टुडे बिना-नागा हमारे घर में खरीदी जाती थी, जो पहले एक मासिक पत्रिका थी पर बाद में पाक्षिक आने लगी। तब इंडिया टुडे में छपने वाली हिंदी कहानियों के लेखकों में तीन नाम मुझे याद आते हैं - असग़र वज़ाहत, ज्ञान प्रकाश विवेक और मनोहर श्याम जोशी।

तब हिंदी इंडिया टुडे के किसी अंक में एक कहानी छपी थी, जो तब बड़ी पसंद आई थी - लेखक, असग़र वज़ाहत।

समय के साथ बहुत कुछ बदला। सूचना तकनीक की क्रांति तो बाद में आई, पर हमारे घर इंडिया टुडे का यूँ खरीदा जाना काफी पहले ही बंद हो गया था। जरूरत जो नहीं रह गयी थी।
 
कुछ साल पहले असग़र वजाहत की एक किताब का नाम फिर सामने आया।  यह ईरान का यात्रा वृतान्त था  - "साथ चलते तो अच्छा था"। पढ़ने की बड़ी इच्छा हुयी पर ना किताब कहीं दिखी और न मैंने  ही उसे कहीं ढूंढा। अभी दो साल पहले की बात है, ये यात्रा वृतान्त  फ्लिपकार्ट की वेब-साइट पर दिखाई पड़ा;  तुरंत खरीद लिया गया। पढ़ने का अनुभव भी मज़ेदार रहा।

सोचा तो था ही नहीं कि कभी वज़ाहत साहिब से मिलना नसीब में बदा होगा। इसी साल, मई में उनसे अचानक मिलना हो गया।  एक प्रिय मित्र जो उनकी कहानियों का अंग्रेज़ी अनुवाद कर रहे हैं, उनके साथ मैं भी वज़ाहत साहिब से मिलने जा पहुंचा।  अपने आइकॉन से मिलना न भी कहूँ तो भी ये काफी कुछ वैसा ही रहा। पूरा वक़्त उन्हें ध्यान से सुनता रहा मैं। चलते चलते उन्होंने अपना नया, स्व-हस्ताक्षरित, पाकिस्तान यात्रा वृतांत मुझे भेंट किया।

चलते समय ही, उनके किसी कहानी-संग्रह के पन्ने पलटते हुए, इंडिया टुडे में तब छपी वही कहानी फिर दिखी - "मैं हिन्दू हूँ"।


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