Sunday, January 5, 2014

जापान यात्रा वृतांत

अकेले कहीं जाने में स्वंतंत्रता के भाव के साथ साथ एक डर और असुरक्षा के भाव का भी समन्वय रहता है; मेरी जापान की यात्रा कुछ ऐसी ही रही।
टोक्यो के लिए एयर इंडिया की नयी नयी शुरू हुयी उड़ान सीधे 7:30 घंटे में इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से नरीता हवाई अड्डे पहुंचा देती है। दिल्ली में हवाई अड्डे पर सारी औपचारिकताएं पूरी करके मैं एयर इंडिया के जापान जाने वाले ड्रीमलाइनर में जा बैठा। उड़ान सँख्या AI-306 ने रात 9:15 पर उड़ान भरी और सुबह लगभग 8:00 बजे मैं नरीता एअरपोर्ट पर था।
एअरपोर्ट से बाहर आकर मैंने एअरपोर्ट-लिमोजीन नाम की बस सेवा का टिकट लिया और चल पड़ा मेरी मंज़िल योकोहामा की ओर. 3500 येन का ये बस टिकट थोड़ा महंगा तो लगा, लेकिन सुना जो था कि जापान एक महंगा देश है। एअरपोर्ट से योकोहामा तक की दूरी तकरीबन 100 किलोमीटर है जो बस लगभग 1:30 घंटे में पूरी करती है।

रास्ते भर मैं नींद में भरा होने के बावजूद आँखे खुली रख इर्द-गिर्द के नज़ारों का आनंद लेता रहा। कहीं भांति भांति की  कारें तो कहीं दनदनाती हार्ले डेविडसन मोटरसाइकिलें, तो कहीं साधारण साइकिलों पर पीछे बंधी प्लास्टिक सीटों में अपने बच्चों को बिठाकर घूमते उनके जापानी अभिभावक। सब कुछ चमचमाता, नया नया सा। मैं जैसे किसी नशे से अभी अभी जागा, हतप्रभ सा ये सब रास्ते भर देखता रहा और मेरी बस योकोहामा आ पहुंची।

Y-CAT स्टेशन पर उतारकर मैंने सब-वे तक (subway) (वहाँ कि भूमिगत लोकल ट्रैन) पहुँचने का रास्ता ढूंढ़ना शुरू किया जो मुझे इसेजकीचोजामाची (Isezakichojamachi) स्टेशन ले जाने वाली थी. अपने सामान को लेकर इस सब-वे को ढूंढ़ने में होने वाली असुविधा के चलते कई बार मन हुआ कि होटल तक टैक्सी कर लूँ लेकिन जापानी टैक्सियों के महंगे किरायों के बारे में इतना सुना था कि हिम्मत न हुयी। आखिरकार सब-वे भी मिल ही गया और मैं थका मांदा इसेजकीचोजामाची स्टेशन पर पहुंचा। वहाँ पहुंचकर नया संघर्ष शुरू - होटल का दिशा भ्रम। 

जापान में भी हर व्यक्ति को अंग्रेजी ज्ञान तो नहीं है लेकिन मदद करने के मामले में वे बहुत विनम्र हैं।  पूछते पाछते आखिरकार मैं Flexstay Inn Yokohama आ पहुंचा। चौड़ी सड़कें और पैदल चलने के सिग्नलों से मेरा वास्ता दिल्ली में पड़ा तो है लेकिन यहाँ का अनुभव कहीं बेहतर था।

अपने कमरे का मुआयना करके मैंने अपना सामान रखा और थोडा आराम करके वापिस रिसेप्शन लौटा जहाँ रिसेप्शन क्लर्क युसुकी मिनामी (Yusuki Minami) ने मेरे लिए कामाकुरा जाने के विवरण का प्रिंटआउट तैयार रखा हुआ था (जापानी आथित्य का एक और उदाहरण).

होटल के पास ही कन्नाई (Kannai) स्टेशन था जहाँ से मुझे ओफुना (Ofuna) स्टेशन तक जाना था; ओफुना से ट्रैन बदलकर कामाकुरा (Kamakura) स्टेशन; और कामाकुरा से इनोशीमा इलेक्ट्रिक ट्रैन (Enoshima Electric Train) पकड़कर हासे (Hase) स्टेशन। हासे स्टेशन के पास ही कामाकुरा के प्रसिद्ध अमिताभ बुद्ध की प्रतिमा है। शाम के कुछ घंटे इस विश्व प्रसिद्ध स्थल पर बिताकर मैं ट्रेनों और स्टेशनों के उसी क्रम में वापिस लौटा।

बात आती है कि इस दिन मैंने खाया क्या ? पहले दिन मैंने ग्रीन टी फ्लेवर की आइस क्रीम का आनंद उठाया और होटल के पास वाले KFC में डिनर लेकर सोने चला गया।

सुबह, काम का पहला दिन, सारा रिसर्च और प्लानिंग धरी की धरी रह गयी।  स्टेशन पहुंचकर वहाँ से अपने ऑफिस पहुँचने का रास्ता ढूंढने में अच्छी खासी कसरत हो गयी मेरी। एक महिला ने बड़ी मदद की और योकोहामा स्टेशन से Sogo स्टोर्स की ओर जाकर निस्सान ग्लोबल सेंटर तक मेरे साथ चलकर मुझे रास्ता दिखाया। वहाँ से ऑफिस पहुंचा आसान था।

ऑफिस पहुंचकर जल्दी ही लंच किया। मैंने गौर किया कि जापान में घड़ी के हिसाब से लंच जल्दी ही कर लिया जाता है। कुछ पतली पतली मच्छलियों के तंतु से पड़े थे उस इटालियन डिश में, जो उस दिन मैंने खाई।  काम निपटाकर ऑफिस के सभी साथियों के साथ मैं उनकी योजनानुसार सुशी (Sushi) रेस्टोरेंट चल पड़े।  उस शाम को मैंने अपने उन जापानी साथियों के साथ सुशी और साके का लुत्फ़ उठाया। मेरे हिसाब से, एक भारतीय स्वाद की तुलना में जापानी सुशी का स्वाद बिलकुल अलग तरह का है - अच्छे और बुरे से कहीं अलग।

 काम के हिसाब से अगला दिन, पिछले दिन की पुनरावृत्ति ही रहा।  ऑफिस के अधिकतर लोग टोक्यो या अन्य दूर कि जगहों से आते थे।  शाम को ऑफिस के ही एक जापानी साथी के साथ, जो योकोहामा में ऑफिस के पास ही रहता था, मैं मिनातो मिराइ(Minato Mirai) नाम की जगह घूमने निकला जो ऑफिस के पास ही थी। टोक्यो बे किनारे मिनातो मिराई एक आधुनिक उप-नगर है।  तमाम शॉपिंग मॉल, ऑफिस, रेस्टोरेंट और अन्य मनोरंजन की व्यवस्थाओं वाला ये शहर रात की रौशनी में गज़ब का नज़र आता है।  इसी उपनगर में जापान की तीसरी सबसे ऊंची इमारत लैंडमार्क टावर (Landmark Tower) है।  इन जगहों पर घूमते, फ़ोटो खींचते, मैं और मेरा साथी एक ब्रिक स्टोन से बनी एक इमारत के सामने आ पहुंचे जो पहले कभी एक स्टोर हाउस रही थी; आज इस इमारत में बहुत से रेस्टोरेंट हैं।  वहीँ एक रेस्टोरेंट में हमने डिनर किया।  खाना एक पोर्क डिश थी जिसका स्वाद काम चलाऊ ही था। वहाँ से निकल हमने कुछ वसाबी (Wasabi) (एक प्रकार की जापानी चटनी) खरीदी और अपने अपने ठिकाने लौट गए।

तीसरा दिन भी ऑफिस में वैसे ही गुज़रा और शाम को मैं अकेला ही मिनातो मिराई घूमने निकल पड़ा। पहले मैंने लैंडमार्क टावर के 69 वें फ्लोर से योकोहामा को निहारा जिसके लिए मैंने 1000 येन चुकाए। इसके बाद घूमते घूमते मैंने पिछले दिन वाले रास्ते को अकेले ही तय किया और आखिर में जा पहुंचा यामाशिता पार्क (Yamashita Park)। वहाँ कुछ समय गुज़ार कर मैं होटल वापिस लौट गया।  इस दिन डिनर में था मैक डॉनल्ड्स का बर्गर और चिकन नगेट्स।

चौथे दिन ऑफिस के लोग देर से आने वाले थे और तय हुआ कि दोपहर बाद मिलेंगे; इस का फायदा उठाकर मैं पैदल घूमता घामता यामाशिता पार्क पहुंचा और वहाँ से पास ही सोका ग़ाक्काई (Soka Gakkai) नामक बौद्ध आर्गेनाइजेशन का ऑफिस है।  भारत में भी सोका ग़ाक्काई बहुत प्रसिद्ध है और मैं भी काफी समय से सोका ग़ाक्काई के पारवारिक उत्सवों में जाता रहा हूँ।  यामाशिता पार्क के सामने बने इस ऑफिस में जाकर मैंने तोदा मेमोरियल हाल देखा और वहाँ से पैदल पैदल ऑफिस चला आया।  मीटिंग्स ख़त्म करके मैंने ऑफिस के पास ही योकोहामा स्टेशन के पास के बाज़ार में समय बिताया और वहीँ एक रेस्टोरेंट में अनजान से भोजन किया जो पनीर जैसा दिख रहा था।  हाँ, उसका नाम अंग्रेजी में पता करने के लिए मैं उसका फ़ोटो लेना नहीं भूला। अगले दिन पता चला कि वोह सोयाबीन का पनीर यानि टोफू था. ये दिन भी ख़त्म और मैं होटल में वापिस।

पांचवां दिन मेरा ऑफिस के लिए आखिरी दिन था। दोपहर तक काम ख़तम करके मैं ऑफिस के साथियों के साथ ही लंच करने गया। इस तैरते रेस्टोरेंट में खाने में हमने टूना मच्छली और ग्रीन टी का स्वाद लिया। साथियों के साथ ऑफिस की ओर हम पैदल ही लौटे। कुछ फोटो खींचने के बाद मैंने साथियों से विदा ली और वहाँ बे में नाव की सवारी करने चल पड़ा।  इसके बाद मैंने यामाशिता पार्क के पास खड़े हिकावा मारु (Hikawa Maru) नाम के एक द्वितीय विश्व युद्ध के समय के जहाज़ को देखा जो आज एक संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया है।  इसके बाद मैं चल पड़ा इनोशीमा के लिए जहाँ मुझे समुद्र तट, माउंट फुजि और तत्सुनुकुची के दर्शन होने वाले थे। योकोहामा से कामाकुरा वाले ही रास्ते पर कामाकुरा से आगे इनोशीमा स्टेशन है; पास ही सोका ग़ाक्काई में अक्सर जिर्क किया जाने वाला एक स्थल तत्सुनुकुची है। तत्सुनुकुची वही जगह है जहाँ निचिरेन दाईशोनिन (Nichiren Daishonin) का सर कलम किया जाने वाला था जो किसी देवीय चमत्कार से अंत समय पर टल गया था। यह जगहें देख कर मैं वापिस योकोहामा स्टेशन लौटा और अपने जापानी साथी के साथ हो लिया जिससे न तमाम बैटन के दौर चले बल्कि लौटने की खरीदारी में भी मुझे मदद मिली। आज का खाना अब तक का सबसे महंगा खाना था - एक बड़े रेस्टोरेंट में बीफ की कोई डिश।
इस साथी के साथ बाज़ार में इधर उधर घूम कर मैं जापानी जीवन को एक जापानी की नज़र से समझने की कोशिश करता रहा। होटल वापिस लौट कर मैंने अगले दिन की योजना बना ली।

अगला दिन खाली था।  टोक्यो जाने के लिए मैंने दोपहर में ट्रेंन पकड़ी और जा पहुंचा टोक्यो स्टेशन। वहाँ से हातो बस (Hato Bus)  सेवा द्वारा 5000 येन में आधे दिन का टोक्यो भ्रमण मज़ेदार रहा। बस में अलग अलग देशो से आये लोग थे। टोक्यो टावर और गिंजा के पास से गुज़रकर हमने इम्पीरियल पैलेस देखा जो जापान के सम्राट का आधिकारिक निवास है।  वहाँ से निकल हमने एक प्रसिद्ध बौद्ध मंदिर सेंसो-जी देखा, एक जापानी डिश यकितोरी खायी और चल पड़े सुमिदा नदी में नौका भ्रमण के लिए।
टोक्यो यात्रा ख़तम कर मैं योकोहामा वापिस लौट आया।

अगले दिन जल्दी ही मैं नारिता एअरपोर्ट के लिए निकल पड़ा। रास्ते भर जापान यात्रा को फ्लैशबैक में सोचता हुआ मैं बस के शीशे से अपने सामने आने वाली हर चीज़ को घूरता सा एअरपोर्ट आ पहुंचा। जहाज से लौटते हुए रास्ते में वहाँ माउंट फुजि और हिंदुस्तान के पास आकर माउंट एवेरेस्ट के दर्शन हुए.

अपने घर पहुँचने में गज़ब की शांति मिलती है चाहे आप जापान से ही क्यूँ न लौटे हों; बस घर वापिस आकर मैंने स्वादिष्ट भारतीय भोजन का स्वाद उठाया जिनसे मैं पिछले कई दिन से वंचित था।