Friday, October 25, 2013

A poem for little "Insiyah" on her first birthday!

नन्ही सी हैं ये उँगलियाँ, नन्ही सी जान है तू ;
तू गुम है अपने खेल में, हाँ! मेरी जान है तू।

जीने की कश्मकश में, भूला था मैं जिसे कब;
अहसास जिन्दा होने का, हाँ! होता है मुझे अब।

बचपन में अपने मुझको, चाहत थी सयानेपन की;
अब आके मैंने जाना, बचपन ही बेहतर था।

कभी ऐसा भी लगे है, छोटा सा हूँ अभी मैं;
जीना शुरू किया है, बस साल भर से मैने।

जो वक्त गुजरता है, वापिस नहीं है आता;
तुझे गोद में जो ले लूँ, तो ये भी ठहरता है।

शुक्रिया तेरा "इन्सिया", घर मेरे जो तू आयी;
जीने का अब मज़ा है, जो साथ तू ले आयी।

पहले का जो था जीना, भूले हैं हम अभी तो;
रिश्ता हमारा तूने, गाढ़ा ही बस किया है।

लेकर तुझे चलें तो, देखें हैं सब हमें भी;
नई किस्म की ख़ुशी का आनंद हमने पाया।

फरिश्तों के पास जो है, वो सब मिले तुझे भी;
बचपन की खासियत भी तू साथ ही सहेजे।

जीने की राह पर जब, आगे तू बढ़ती जाए;
जो कुछ भी हो मुनासिब, हासिल वो सब तू करले।

है शुक्रिया तेरा "इन्सिया", खुशियाँ जो सब तू लायी;
तू गुम है अपने खेल में; जीना ही अब मज़ा है।