Friday, October 25, 2013

A poem for little "Insiyah" on her first birthday!

नन्ही सी हैं ये उँगलियाँ, नन्ही सी जान है तू ;
तू गुम है अपने खेल में, हाँ! मेरी जान है तू।

जीने की कश्मकश में, भूला था मैं जिसे कब;
अहसास जिन्दा होने का, हाँ! होता है मुझे अब।

बचपन में अपने मुझको, चाहत थी सयानेपन की;
अब आके मैंने जाना, बचपन ही बेहतर था।

कभी ऐसा भी लगे है, छोटा सा हूँ अभी मैं;
जीना शुरू किया है, बस साल भर से मैने।

जो वक्त गुजरता है, वापिस नहीं है आता;
तुझे गोद में जो ले लूँ, तो ये भी ठहरता है।

शुक्रिया तेरा "इन्सिया", घर मेरे जो तू आयी;
जीने का अब मज़ा है, जो साथ तू ले आयी।

पहले का जो था जीना, भूले हैं हम अभी तो;
रिश्ता हमारा तूने, गाढ़ा ही बस किया है।

लेकर तुझे चलें तो, देखें हैं सब हमें भी;
नई किस्म की ख़ुशी का आनंद हमने पाया।

फरिश्तों के पास जो है, वो सब मिले तुझे भी;
बचपन की खासियत भी तू साथ ही सहेजे।

जीने की राह पर जब, आगे तू बढ़ती जाए;
जो कुछ भी हो मुनासिब, हासिल वो सब तू करले।

है शुक्रिया तेरा "इन्सिया", खुशियाँ जो सब तू लायी;
तू गुम है अपने खेल में; जीना ही अब मज़ा है।

Thursday, June 27, 2013

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Thursday, May 16, 2013

Albert Camus - The Outsider

Few good links on Albert Camus:

http://www.guardian.co.uk/commentisfree/2006/apr/12/books.comment

http://www.macobo.com/essays/epdf/CAMUS,%20Albert%20-%20The%20Stranger.pdf


Tuesday, January 1, 2013

"यशवंत राव" - अरुण कोलटकर की एक इसी नाम की अंग्रेजी कविता का हिंदी अनुवाद

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भगवान ढूँढ़ते हो?
मैं जानता हूँ एक भगवान को।

नाम यशवंत राव है उसका
अच्छे भगवानों में से एक।

कभी जेजुरी जाएँ तो 
मिल आना उससे।

हालाँकि वो दोयम दर्जे का भगवान् है
मुख्य मन्दिर के बाहर है रहता।
उस बाहरी दीवार के भी परे।
जैसे कोई कारीगर या फिर कोई कोढ़ी।

जानता हूँ कुछ ऐसे भी भगवानों को भी
सुन्दरतम चेहरे
या पूर्णतः दोषरहित। 
भगवान् जो तुम्हारा स्वर्ण चाहें।
भगवान् जो तुम्हारी आत्मा तक जाएँ।
भगवान् जो तुम्हें गर्म कोयलों पे चलवायें। 
भगवान् जो तुम्हारी पत्नी की बच्चों की मनोकामना पूर्ण करें।
या तुम्हारे दुश्मनों पे चाकू से प्रहार करें।
भगवान् जो तुम्हे जीने के तरीके बताएं,
पैसा दुगना करने के राज़ बताएं,
या ज़मीन-जायदाद तिगुनी करने के गुर।
भगवान्, जो मुश्किल से अपनी मुस्कान दबाते नज़र आते हैं 
जब तुम मील भर सरकते हुए उससे मिलने पहुँचते हो।
भगवान् , जो तुमको डूबा के मारेंगे
अगर तुमने उन्हें एक मुकुट न दिया।
मेरे हिसाब से, यद्यपि ये सभी प्रशंसा के पात्र हैं,
या तो बहुत सुडोल से
या फिर बहुत ही नाटकीय।


यशवंत राव
किसी लावे के टुकड़े जैसा,
जैसे चमकता पोस्ट बॉक्स,
प्रोटोप्लास्म का सा जिस्म
या लावे का बड़ा सा गोला
किसी दीवार से सटा हो
एक हाथ नहीं, न ही एक पैर
सर भी तो सिर्फ एक ही नहीं है इसका।

यशवंत राव,
एक भगवान जिससे तुमको मिलना होगा।
यदि तुम्हारा कोई अंग भंग हो
यशवंत राव तुम्हारे लिए हाथ बढ़ा देगा
और उठाकर खड़ा कर देगा तुम्हे, तुम्हारे ही पैरों पे।

यशवंत राव कुछ विलक्षण सा नहीं करेगा।
ये संसार तुम्हारे नाम नहीं लिख देगा वो
और न ही तुम्हे अगले अंतरिक्ष यान में स्वर्ग जाने हेतु कोई सीट दिला देगा।
हाँ यदि हड्डियाँ टूटी हों
तो जोड़ देगा।
तुम्हे अपने ही शरीर में सम्पूर्ण होने का अहसास करा देगा वो
साथ ही ऐसी आशा भी कि तुम्हारी आतंरिक शक्ति ही तुम्हारा ख्याल कर पाए।
किसी हड्डी विशेषज्ञ के जैसा है।
तुम्हे ढंग से समझ पाता है वो
क्यूंकि उसके न सर है, न हाथ और न ही पैर।

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