Sunday, December 16, 2012

गाँव की यादें...

सुबह हुई,
हाथ की चक्की के पाटों के घिसने की आवाजें,
चिड़ियों के चहचहाने का शोरगुल,
झाड़ू लगाती घर की महिलाएं,
खेत की ओर निकलते पशुओं का झुण्ड -
सब घटित हो रहा था तब, अकारण, यूँ ही,
उस सब में शामिल था मैं, पर किसी का भी कारक न था।

खेलने जाते बच्चे,
किसी का बैट लाना तो किसी का बौल,
मज़ा बना लेते थे उस माहौल में,
हाँ, कंचे भी तो खेलते थे,
सर्दी में नाक लटकाते आते उस फटी पैंट वाले लड़के के पास कितने कंचे थे!

मख्खन लगी रोटी सुबह चाय के साथ खाना,
मामा के घर का लाड,
दोपहर को गेंहूँ के बदले बर्फ खरीदकर खाना,
शाम को मोहन सब्जी वाले के कलींदे का इंतज़ार,
दिन छिपते ही रजाई में दुबक जाना,
गाँव की बहुत सी यादें आज भी ताज़ा हैं।

Thursday, December 13, 2012

आत्म-वार्तालाप...1

पहले शिकायतें थीं,
अब समझौता कर लिया;
बदला कुछ नहीं।

हिदायतें देना एक आदत सी थी;
खुद भी कहाँ मानी हमने अपनी ही बात;
झेला किये नतीज़े, कहाँ जायेंगे।

सादगी से जियें या करलें मन की ही,
दोनों ही ओर भरम बराबर है;
करिए दिमाग से बेदखल, इन जोड़ घटावों को।