Sunday, June 10, 2012

जीत का राज़

एक बार किसी तालाब के सभी युवा मेंढकों के बीच एक मुकाबला हो रहा था. तालाब के किनारे बांस के झुरमुट थे. सभी मेंढकों को अपने अपने लिए चिन्हित बांस पर चढ़ना था.
जो शीर्ष तक जा पाने वाला था वो ही विजेता घोषित किया जाता.
तालाब के सभी उम्र के मेंढक उस झुरमुट को घेरकर खड़े थे. वे न केवल अपने अपने उम्मीदवार का चीख चीख कर हौसला बढ़ा रहे थे बल्कि बाकियों का हौसला कम करने की लिए तरह तरह की छींटाकशी भी.  
दर्शकों में से किसी को भी उन युवा मेंढकों से उन आसमान छूते बांसों के सिरे तक जा पाने की उम्मीद न थी.
उम्मीदवारों के कानो तक तरह तरह की बातें पहुँच रहीं थीं -"इतने ऊँचे बांस पर अंत तक पहुंचा किसी मेंढक के बस की बात नहीं है", "सब के सब बीच रास्ते से ही नीचे आ गिरेंगे", "बहुत कठिन है ये बाधा" आदि.
मुकाबला शुरू होते  ही प्रत्याशी मेंढकों ने अपने अपने बांसों पर चढ़ने शुरू किया. कोई चढ़ते ही हांफने लगा तो किसी के ज़रा सा ऊपर जाते ही हाथ छूट गए और वो नीचे तालाब में आ गिरा. सिवाय एक के, धीरे धीरे सभी मेंढक बिना शीर्ष तक पहुंचे ही नीचे तालाब में गिर चुके थे. वह एक मेंढक बिना किसी की टिपण्णी की परवाह किया किये चढ़ता ही रहा और अंततः शीर्ष तक जा पहुंचा.
नीचे खड़े सारे मेंढक बड़े खुश हुए और उसकी इस जीत का राज़ जानने के लिए उसके नीचे उतरने की प्रतीक्षा करने लगे.
उसके नीचे आने पर पता लगा कि वह मेंढक बहरा था.

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