Sunday, June 10, 2012

कहाँ की बात कहाँ ...

एक रात की बात है. एक व्यक्ति अपनी राह चला जा रहा था. चलते चलते जब वह एक गली से गुज़रा तो उसने वहीँ सामने लगे खम्भे पर जलती तेज़ रौशनी के नीचे खड़े एक आदमी को देखा जो थोड़ा झुककर, अपने घुटनों पर हाथों को टिकाये कुछ ढूंढ रहा था.
"कुछ खो गया है क्या?", पहले आदमी ने दूसरे से पूछा.
"मेरी कार की चाबियाँ गुम हो गयीं हैं, वही ढूंढ रहा हूँ.", घबराया सा दीख पड़ता वो दूसरा आदमी बोला.
"चलिए मैं भी आपकी मदद कर देता हूँ", पहले आदमी ने कहा.
दोनों लोग थोड़ी देर तक उस रौशनी के नीचे बहुत बारीकी से हर चीज़ को उलट पुलट कर चाबियाँ ढूँढ़ते रहे.
गुम हुयी चाबियों के बारे में कुछ और मालुमात करने के लिए पहले आदमी ने दूसरे से पूछा, "क्या तुम्हें ठीक से याद है कि वे कहाँ गुमीं थीं?"
"वहां कार के पास", गली के किनारे पर थोड़ी दूर अँधेरे में खड़ी अपनी कार की ओर इशारा करते हुए दूसरे ने ज़वाब दिया. 
"तो भाई तुम उन्हें यहाँ क्यूँ खोज रहे हो?", चकित होकर पहले ने पूछा.
"वहां पर्याप्त रौशनी जो नहीं है!"

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