Friday, June 8, 2012

मेडीटेशंस - तृतीय अध्याय (किश्त - 5)

ऐसा आदमी निश्चय ही महंत या ईश्वर का मंत्री ही होगा जो अपने भीतर की दिव्यता बरकरार रखे हुए है, उसे न अपने सुखों से कोई लगाव है और न ही दुखों का फर्क, न किसी नाइंसाफी का असर और न ही किसी दुष्टता का भान ; जैसे किसी सबसे बड़े दिव्य इनाम को पाने की राह का एक पहलवान जो किसी भी उत्साह के चलते अपनी राह भटकने का उसे डर नहीं; स्वयं में पूर्ण न्याय से रंग हुआ; उसे जीवन में जो भी अनुभव किया हैं उन सभी का वो आलिंगन करते हुए; जब तक सामूहिक भले की बात न हो तब तक वह दूसरों के कहने, करने और सोचने की और ध्यान नहीं देता.
अपने काम से पूरी तरह संतुष्ट रहने वाला ये मनुष्य पूरा ध्यान सिर्फ उस पर केन्द्रित करता है जो भी उसे इस विश्व से अपने हिस्से में आवंटित हुआ है. वो अपने काम को पूरी बेहतरी से करता है; अपने हिस्से का काम उसे अच्छा लगता है. किसी और मनुष्य के हिस्से के आवंटन उसके लिए अपने हमराही और सारथि जैसे हैं.
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क्रमशः

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