Thursday, June 7, 2012

मेडीटेशंस - तृतीय अध्याय (किश्त - 4)

दूसरों के बारे में सोचकर जीवन के बचे भाग को बर्बाद मत करो जब तक कि वे विचार किसी सामूहिक बेहतरी के लिए न किये जा रहे हों. किसी महत्वपूर्ण काम कर सकने का समय क्यूँ ऐसे ही गवांये? अमुक व्यक्ति क्या कर रहा है, क्या सोच रहा है, क्या साजिश कर रहा है - इस प्रकार के विचार अगर हम पाले रहें तो अपनी सोच समझ को खुद ही न देख पायेंगे.
अपनी सोच समझ में से जो भी तथ्यहीन या लक्ष्यहीन विचार हैं उनसे बचो, खासतौर पर वे विचार जो शक्की या दुर्भावना से भरे हों. अपने दिमाग को ऐसे विचारों को सोचने के लिए शिक्षित करें जैसे इस तात्कालिक प्रश्न का उत्तर - " ज़रा बताओ कि अभी तुम्हारे दिमाग में क्या चल रहा है ? " और तुरंत ही इसका बिना लाग-लपेट के जो भी उत्तर बन पड़े वही दें. तुम्हारे उत्तर तुम्हारे ही विचारों के स्पष्ट और भले होने का सीधा प्रमाण होंगें ; एक ऐसे मनुष्य के विचार जिसे इन सबसे कोई सरोकार नहीं होता है - सुख के काल्पनिक अनुभव, विलासिता, शत्रुता, दुर्भावना, शक या कोई ऐसी बात जिसके होने की स्वीकारोक्ति शर्मिंदा कर दे.

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क्रमशः

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