Saturday, June 2, 2012

मेडीटेशंस - तृतीय अध्याय (किश्त - 2)

जो कुछ भी प्रकृति के प्रक्रमों का चलते घटित हो जाता है उसमें भी कुछ अच्छाई होती है; रोटी का बनाया जाना ही ले लें - जब सेंके जाते समय वह फूलकर इधर उधर से कट फट जाती है तब उसे बनाने वाले रसोइये की कमी के रूप में भी देखा जा सकता है लेकिन वहीं उस रोटी का इस प्रकार से चटक जाना भूख को और बढ़ा देता है। इसी प्रकार से अंजीर नामक फल अपने पूर्ण रूप में आकार फट जाता है, पेड़ पर लगे लगे पकने वाले जैतून के फल सड़ जाने से ठीक पहले विशेष सुंदर दिखाई पड़ते है; इसी प्रकार जमीन पर पड़े अंगूर, शेर की गुथी भवें, जंगली सूअर के मुंह से निकलता झाग और ऐसी ही अन्य बहुत सी चीज़ें अपने आप मे इतनी सुंदर तो नहीं दिखेंगी परंतु प्रकृति की घटनाओं के परिणामवश होने के चलते ये भी सुंदर लग पड़ती हैं।

इसी प्रकार कोई मनुष्य जिसे प्रकृति के तौर तरीकों का भान है उसे प्रकृति के इन घटनाक्रमों में भी आनंद का अनुभव होता है। ऐसे मनुष्य को जंगली जानवरों के गुर्राने में भी वही मज़ा आता है जो उसे किसी चित्रकार या मूर्तिकार के द्वारा बनाई गयी कलाकृतियों को देखने में आता है। उसे वृद्ध जन में भी वही ताजगी और सौंदर्य दिखलाई पड़ता है। ऐसे मनुष्य की समझ से बहुत से लोगों को वाकफियत न होगी (ऐसे लोग बहुत कम होंगे) - सिर्फ वे लोग जिनहोने प्रकृति और उसके तरीकों को पहचाना है।

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क्रमशः

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