Friday, June 1, 2012

मेडीटेशंस - तृतीय अध्याय (किश्त - 1)

यह भाग केरनान्टेम (ऑस्ट्रिया में वियेना के पास का एक प्राचीन नगर) में लिखा गया था.

हमें जान लेना चाहिए कि हमारा जीवन धीरे-धीरे ख़त्म हो रहा है और इसका बचा भाग हर दिन कम ही होता जा रहा है, लेकिन इस पर भी गौर करें कि यदि मनुष्य जीवन और लम्बा हो भी जाए तो भी यह अनिश्चित ही है कि समय के साथ उसकी समझ बूझ और बेहतर होती चली जायेगी और ऐसी बनी रहेगी जिससे मनुष्य और परमात्मा को जानने की कोशिश की जाती रहे.

यदि किसी का उसकी वृद्धावस्था में दिमाग कमजोर होने के कारण समझ का ह्रास हो चुका हो तो भी उसका सांस लेना, भूख लगना, कल्पना करना और इच्छाओं का होना बंद नहीं होता; लेकिन अपने आप का उचित इस्तेमाल कर पाने की शक्ति, अपने कर्तव्यों का उचित प्रकार से निर्वहन कर पाना और सभी वाह्य रूपों में भेद कर पाना, जीवन की अंतिम घड़ी को पहचान पाने की योग्यता - इस सबके लिए अनुशासित तर्कशक्ति काम आती है.
इसलिए हमारे भीतर एक किस्म की जल्दबाजी होनी चाहिए, आने वाली मृत्यु के चलते नहीं वरन इसलिए कि इस विश्व को समझ पाने की हमारी योग्यता हमारी मृत्यु से पहले हमें छोड़ जायेगी.

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क्रमशः

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