Thursday, May 31, 2012

तितली

"आज तो हम चोकोलेट और चूइंग गम लेकर ही घर लौटेंगे", तितली ने कहा. अब उसे प्यार से तितली ही पुकार लेता हूँ. एक नहीं, दो नहीं...हजारों नाम रख दिए हैं हमने उसके. उसे भी कहाँ परवाह है, चाहे जिस नाम से पुकार लो. तीन साल की है तितली. जब भी कुछ लाने के लिए घर से निकलो तो साथ हो लेती है. योजना बना कर कदम से कदम मिलाती हुई दुकान तक जाएगी और जो भी चीज़ आँख को भाई वही उसकी खरीदे जाने की फेहरिस्त में जुड़ता जाता है.  देखता हूँ की खरीदे जाने की गतिविधि का ही आनंद उसको आता है; उस चीज़ की मल्कियत का उसको उतना लगाव नहीं है. शायद "Shopping is fun" का अंदाजा उसके दुकान में घुसते ही दीखता है. उन्हीं चीज़ों का अपने घर पर होना भी वास्ता नहीं रखता है. बस सामने हैं तो खरीद डालते हैं, खरीदारी का आनंद तो देंगीं.   यह तो थोड़ा गंभीर होता जा रहा है...चलिए आसान, मज़ेदार बातें करते हैं उसके बारे में...

बहुत सी मजेदार बातें करती है वोह. अभी थोड़े ही दिन पहले रोल प्ले करना शुरू कर दिया था उसने. "आप तितली हो और मैं आपका पापा", वोह बोली थी. "बेटा चल सो जा, बेटा दरवाज़ा खोल, बेटा पानी दे दे", उससे सुन कर बड़ा मजा आया. अपने माँ-पिता की याद आ गयी थी.  आज शाम को गाना गुनगुना रही थी, "आज से पहले, आज से ज्यादा ख़ुशी आज तक नहीं मिली". मुस्कुरा दिया था  मैं. मैंने ही सिखाया था. बच्चे जल्दी सीख जाते हैं. पूर्वाग्रह से सामान्यतः अपरिचित.

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अभी अधूरा है ...पुराना लेख है...तितली अब साढ़े पांच साल की है. उसकी बातें और आदतें ज्यादा नहीं बदली हैं...हाँ कई बार निरुत्तर कर देती है.

मेडीटेशंस - द्वितीय अध्याय (किश्त - ८)

मानव जीवन मे समय एक बिन्दु या क्षण की भांति है, उसका अस्तित्व एक प्रवाह में है, उसकी इंद्रियाँ भ्रमित करती हैं, शरीर सड़नशील, दिमाग एक चक्र में रत, उसका भाग्य अनिश्चित और प्रसिद्धि असपष्ट।

अल्प शब्दों में कहें तो - शरीर किसी धारा की भांति है तो आत्मा सपने या वाष्प की भांति, जीवन एक युद्ध है और कुछ ऐसा है जैसे यहाँ किसी अंजान जगह के सफर करते हुये चले आए हों; स्थायी प्रसिद्धि तो विस्मृति है।

तो इंसान का साथ कौन देगा? एकमात्र उत्तर है - दर्शनशास्त्र. 
यही हमारे भीतर की दैवीयता को बरकरार रखता है, हमें अपने आप को नुक्सान पहुंचाने से बचाता है,
सुख दुःख को जीतने में मदद करता है. लक्ष्यहीनता से बचाता है,  सचाई और आंतरिक पूर्णता लाता है, दूसरों के कार्यों द्वारा अपने ऊपर फर्क पड़ने से बचाता है.  जो हो रहा है और जो प्रदत्त है, उसको स्वीकार करना, वह कहीं से भी आया हो, और अंत में सहर्ष उस मृत्यु के लिए प्रतीक्षारत रहना जो उन तत्वों का फिर प्रकृति में लौट जाना ही है जिनसे मिलके ये शरीर बना है. जब इन तत्वों को एक दूसरे में बदलते रहने में कोई हानि नहीं है तो किसी मनुष्य को भला क्यूँ इन परिवर्तनों और तत्वों के वापिस विलीन हो जाने में किसी भी प्रकार का डर होना चाहिए? ये सब प्रकृति के नियमों के अनुरूप ही है और जो भी प्रकृति के नियमों के अनुरूप होता है उसमे कोई गलत बात नहीं है.

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द्वीतीय अध्याय समाप्त
(क्रमशः) 

Saturday, May 19, 2012

मेडीटेशंस - द्वितीय अध्याय (किश्त - ७)

किसी मनुष्य की आत्मा यदि किसी दुनियावी फोड़े की तरह बर्ताव करने वाली होगी, तो अपना ही नुकसान करेगी। अब अपने साथ घटित किसी बात पर खीझने से तो आप उस प्रकृति विरुद्ध ही जाएंगे जो अन्य सभी प्रकार की प्रकृतियों का सम्मिलित रूप है।

फिर आप ये भी पाएंगे कि परायापन उत्पन्न करने वाली या किसी को नुकसान पहुंचाने की मंशा आत्मा किसी क्रोधी आदमी की ही रही होती है।

ऐसी आत्मा जो बहुत खुशी या दर्द से भरी हो , वह भी स्वयं पर हिंसा ही कर रही होती है।

बहानेबाज़ी और असत्य भी कुछ ऐसी ही हिंसा है।

किसी प्रयास में लक्षयहीन होने, अज्ञानी की भांति काम करना ही कुछ ऐसा ही है - होना तो ये चाहिए कि छोटे से छोटे कार्य का भी लक्षय सिद्ध जाये।

तार्किक प्राणियों को तर्क का मार्ग अपनाना चाहिए और साथ ही उन्हें इस ब्रह्मांड के नियमो के अनुसार चलना चाहिए।

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क्रमशः


Thursday, May 17, 2012

मेडीटेशंस - द्वितीय अध्याय (किश्त - ६)

यह बड़े खेद की बात है कि कोई सब कुछ छोड़ कर यह जानने के चक्कर में लगा रहता है कि उसके पड़ोसियों के मन मे क्या चल रहा है - पिंडर नामक कवि के शब्दों में कहें तो वह व्यक्ति "धरती तले झाँकने में लगा रहता है"।

उसे इस बात का एहसास नहीं होता कि उसके अंदर भी दिव्यता है जिसको ईमानदारी से पोषित किया जाना चाहिए। यह पोषण, उस देवताओं और मनुष्यों की दिव्यता को जोश की अधिकता, जिद्दीपन एवं असंतोष से बचाकर रखना ही तो है। देवताओं के गुण अपनी उत्कृष्टता के कारण सम्मान पाते हैं तथा मनुष्यों के मध्य प्यार, और आपसी भाईचारा अहम है किन्तु मनुष्यों की कुछ बातें अफसोस करने लायक भी हैं जैसे उनका अच्छे व बुरे के बीच भेद न कर पाना - जैसे कि कोई काले और सफ़ेद के बीच ही भेद न कर पाये।



तुम  तीन हज़ार साल जियो या उससे भी दस गुना ज्यादा पर याद रखो कि कोई जो जीवन जी रहे हो उसी को खोना पड़ता है या यूं कहिए कि जिस जीवन को कभी खो बैठने वाले हो उसी को अभी जी रहे हो। सबसे लंबा जीवन हो या सबसे छोटा - अंतिम हश्र तो वही है। वर्तमान क्षण सबके लिए एक सा है; सो जो गुजर रहा है वह भी सभी के लिए समान है; सो जो कुल नुकसान है वो मात्र समय को कुछ भाग है। कोई भी अपना भूत या भविष्य नहीं खोता है - कोई कभी ऐसा कुछ खो सकता है क्या, जो कभी उसका रहा ही न हो?

  ये दो बातें याद रखो -
पहली, कि सभी चीज़ें सदा से एक से ही हैं, बार बार उसी चक्र से गुजरती हुयी। कोई फर्क नहीं पड़ता जब उसी चीज़ को सौ, दो सौ या अनंत बार देखा जाये।
दूसरी, कि लंबे समय तक जीने वाला और अल्पायु वाला, दोनों ही एक जैसे अंत को प्राप्त होते हैं। एक वर्तमान क्षण ही है जिससे कोई वंचित रह सकता है, तो अब यह जिसका था ही नहीं तो उसे उसके खो देने को तो बात ही नहीं उठती है।

"जैसे विचार होंगे वैसा ही संसार अभिव्यक्त होगा" - ऐसा मोनिमस ने कहा था। बिलकुल साफ बात है। अगर इसे सच मान लें तो यह "साफ" बात तभी लगेगी जब तुम इसका सार समझ पाओगे।


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क्रमश:

Tuesday, May 15, 2012

मेडीटेशंस - द्वितीय अध्याय (किश्त - ५)

सभी चीज़ें कितनी शीघ्रता से खत्म हो जाती हैं, हमारे शरीर इस भौतिक विश्व का हिस्सा बन जाते हैं, हमारी यादें समय में कहीं गुम हो जाती हैं। हमारी इंद्रियों के विषय - सुखद, दुख में डुबा डालने वाले,  आत्म शलाघा से तृप्त; सार रहित, तुच्छ, भंगुर एवं शर्मनाक हैं ये - हमारे मन-मस्तिष्क को इन का भान होना चाहिए।

जिन लोगों के विचार और राय प्रतिष्ठा पाते हैं, दिमाग उन्हें तवज्जो देता है। मृत्यु क्या है? कोई सिर्फ मृत्यु पर ही विचार करे और अपनी विश्लेषण कर सकने की योग्यता के इस्तेमाल से मृत्यु को उसके अन्य मतलबों से अलग करके देखे तो पाएगा कि वह प्रकृति का एक कार्य ही तो है - अब यदि कोई व्यक्ति प्रकृति के ही कार्य से डरने लगे तो क्या यह व्यवहार बचकाना न कहलाएगा। मृत्यु मात्र प्रकृति का अपना एक कार्य ही नहीं बल्कि उसके स्वयं के लिए लाभकारी भी है।

इंसान उस ईश्वर को कैसे महसूस कर पाता है, अपने सर्वस्व के किस हिस्से से, और इस सबका स्वभाव क्या है।

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क्रमशः