Monday, February 13, 2012

राम प्रसाद् और बाज़ारी तिकड़में!

यहाँ मैं एक आम आदमी को राम प्रसाद नाम से पुकार रहा हूँ।

आज जिधर भी देखें, तेज़ तर्रार होना एक बड़ा भारी गुण हो चला है। सरलता से काम चलने वाला नहीं ऐसा जान पड़ता है। राम प्रसाद तो लुट ही जाएंगे। असली राम प्रसाद यानि अपने अमोल पालेकर की फिल्मों मे मनोरंजन के साथ साथ सरल जीवन का जो उदाहरण दिखता था वो आज के बाज़ारी युग मे सार्थक नहीं लगता है।

चीजों के दाम चीजों से ज्यादा आप कितना दे पाएंगे से तय होते हैं। अच्छे दिखेंगे तो चीज़ें महंगी मिलेंगी बाउजी, सो थोड़ा दाढ़ी बढ़ा लें और उलझे बाल न ही सवारें तो बेहतर होगा। हाँ कुछ ज्यादा  न हो जाये नहीं तो दुकान से दुत्कार दिये जाने का खतरा भी है।

हमसे पिछली पीढ़ी की साक्षरता हमसे कम भले ही रही हो, हमसे कहीं ज्यादा अक़्लमंदी से जीवनयापन उन्होने किया और कर रहे हैं। ये भी जान लीजिये की उनकी अक्लमंदी इस चालू स्मार्टनेस से निपटने का भरोसेमंद तरीका है। चार दुकान भाव लेकर सामान लेना, सामान लें या न लें पर अगर बाज़ार से निकल रहे हैं तो कीमत का अंदाज़ा लेते चलें, सवाल जवाब करने मैं कोई कंजूसी न करना, आँखें तरेरनी पड़ें तो कोई कोताही न करें, और ऐसी ही न जाने कितनी "बेस्ट प्रैक्टिस" हमारे अग्रज इस्तेमाल करते रहे हैं।

बाज़ार नियंत्रित अर्थव्यवस्था मे गुण तो अवश्य होंगे पर मैं तो उन दोषों की बात कर रहा हूँ जो मुझ पर सीधे सीधे फर्क डालते हैं। अब देखिये कि 15 साल पहले "गुड नाइट" जैसे मच्छर भगाने वाले यंत्रों का उतना प्रचलन नहीं था। या तो मच्छरदानी लगाईये या फिर फिनिट छिड़ककर घर से कुछ घंटों के लिए बाहर निकल जाइए। मच्छरों से छुटकारा आज कि तुलना मे कहीं ज्यादा प्रभावी था। आज ऐसा नहीं है। समान बनाने वाली कंपनी अब आपको लंबे समय तक फांस लेने कि ताक मे रहती हैं।

Extraordinary Measures नामक हॉलीवुड फिल्म देखिये। इस फिल्म मे बड़े ही अच्छे ढंग से एक दवाई कंपनी का काम करने का ढंग दिखाया गया है। अच्छा बुरा तो क्या कहें पर हाँ ये काम करता है। यह तो तय है की मानवीय जज़्बात का स्वभाव अक्सर काफी निजी होने के चलते मुश्किल मे फंसे व्यक्ति के गिर्द के लोग उसकी व्यथा को पैसे की भाषा के सहारे ही समझ पाते हैं।

एक आम बात थी कि लोग एक बार चीज़ खरीदकर उसका बरसों इस्तेमाल करते थे। अब कंपनियाँ इतनी जल्दी जल्दी नए फीचर्स और मॉडेल्स ले कर आती हैं कि उस समान के बरसों न चल सकने की खामी ये कंपनियाँ उपभोक्ता की नया पाने की लालसा से ढ़क देती हैं। राम प्रसाद फिर ठगे जाते हैं जबकि ये कंपनियाँ अमीरी के नित नए कीर्तिमान बनती जाती हैं।  एप्पिल कंपनी को ही देखिये, अपने ही बढ़ते पैसे से परेशान है और उसके नए बॉस की समस्या ये है की उस पैसे का निवेश कहाँ करे और लोग हैं की अपने कड़े उतारकर भी समान लेने कतारों मैं खड़े रहते हैं। हिंदुस्तान मे तो अभी तक यह नहीं सुना है पर विदेशों मे ये शायद कोई आश्चर्य नहीं है।

पहले से कहीं ज्यादा आज ये बात प्रासंगिक है कि हम जानें और तय करें कि क्या लेना है और क्या नहीं। साथ ही जो ले रहे हैं उसमे लंबे समय तक फाँसकर रखने की कितनी मंशा जुड़ी है।

राम प्रसाद नहीं बल्कि लक्ष्मण प्रसाद बनकर काम चलेगा। समझे ...



Sunday, February 12, 2012

My kid, my assumptions and limitless possibilities!

While returning from Shipra Mall, Navya asks me - "Papa, What is the price of this soft toy that we have just purchased?"
"You guess", I said.
I was expecting her to say Rs 1 or Rs 10 or some other number she is familiar with and was just waiting to burst into a laughter once she gives such an answer. A smile was already there on my face in anticipation.

"It is a very good soft toy. All good things are expensive so  it must be a very expensive toy", she replied.

I had not expected it from her as she is just a five year old kid. Though I know that I have always known her from what I expect her to know. She, at times, makes me rethink. I have reminded myself of not keeping her confined within my assumptions and expectations.

Now she is a possibility beyond all assumptions, expectations and evidences.