Friday, January 20, 2012

प्रायोगिक गद्य



प्रकृति के नियमो को टटोलता ब्रह्मा, जवाहर लाल नेहरू पार्क के एक बड़े से बरगद के पेड़ के नीचे किसी सेठ साहूकार द्वारा दान मे दी गयी बेंच पर बैठा था।  ये सीट भी उस सेठ साहूकार ने अपने परिवार की किसी महिला के नाम पर दान मे दी थी और किसी विज्ञापन की तरह ये बखूबी उस बेंच पर बड़े अक्षरों मे लिखा था।

मुंह को ब्रह्मा स्लो मोशन मे ऊपर लेकर गया और बरगद की डाल-डाल का मुआइना करते हुये गर्दन यहाँ से वहाँ घुमाने लगा। ब्रह्मा से सिर्फ चार डाल ऊपर बैठी चिड़िया को उसका नीचे से यूं ताकना रास न आया और वो फुर्र से उड़ गयी। शायद उस उड़ने की क्रिया की प्रतिक्रिया में उसी डाल से दो पुरानी पत्तियों ने विदा ली और चक्राकार मार्ग से नीचे को आने लगीं। ब्रह्मा को उनका इस तरह गिरना बड़ा अच्छा लगा। सब कुछ भूल उनही को टकटकी लगाकर देखता रहा जब तक एक ओंस की बड़ी सी बूंद ऊपर से उसकी नाक पर टपककर, रगड़ खाती उसके पैरों के ठीक बीच से होती ज़मीन पर न जा गिरी।

घड़ी न पहनी थी सो समय का पता न चला पर कुछ समय बाद जब वहाँ से उठकर चला तो सूरज काफी चढ़ आया था. सर्दी के मौसम में अगर धूप तेज़ निकली हो तो क्या कहने, बड़ी आशामयी होती है ऐसी धूप - ऐसा आभास देती है जैसे किसी मुसीबत का डटकर सामना कर रहें हो।
घर लौटकर अखबार देखा तो वही मुद्रा स्फीति, भ्रष्टाचार और भांति भांति की निराशाजनक हर तरफ छायी थीं.

पार्क मे बिताया गया समय यकीनन ब्रह्मा का दिन का सबसे सुकून भरा समय होता है किन्तु बाद के पल जब इधर उधर की वास्तविकताओं से दो-चार होना पड़ता है तो सारा सुकून जैसे रफूचक्कर।

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आकस्मिक विचार !

यूं तो कहता है अपने आप को अच्छा;
हो उसीके साथ बुरा, ये तलब है तुझको।

याद नहीं आते करम अपने तुझे;
कोई तो होगा जो तेरे बारे मे सोचे है यही।

ज़माना देख लिया है जितना बदा था तूने;
कभी कहीं से नयापन दिख ही जाता है।

न वे दिन लौटेंगे, और न वे लोग ही;
फ़क़त याद में ही सब के सब बसर करते हैं। 

"कानागवा की लहर" नामक यह तस्वीर विकिपीडिया से।

Thursday, January 12, 2012

घर


कुछ दीवारें, किसी बस्ती में, मेरा पता बताती - यही घर है?
कहीं ये मुझको सीमित करती, कहीं ये मुझको परिभाषित।

यहाँ देखता भांति-भांति के अनुभव घर निर्माण करें,
धनोपार्जन, अच्छा दिखना, जीवन यापन, अहम की तुष्टि, अन्य बहुत कुछ।

कीड़ा होता या पशु-पक्षी, इस अनुभव से बच जाता
मात्र सुरक्षा दृष्टि से वाज़िब दीवारों को घर कहता।

रहने वालों की भीड़ रहे तो घर का होना रहे कारगर,
एकाकीपन में तो घर भी कारागार सा बन जावे।

कुछ दीवारें, किसी बस्ती में, मेरा पता बताती - हाँ, यही तो घर है!