Sunday, December 16, 2012

गाँव की यादें...

सुबह हुई,
हाथ की चक्की के पाटों के घिसने की आवाजें,
चिड़ियों के चहचहाने का शोरगुल,
झाड़ू लगाती घर की महिलाएं,
खेत की ओर निकलते पशुओं का झुण्ड -
सब घटित हो रहा था तब, अकारण, यूँ ही,
उस सब में शामिल था मैं, पर किसी का भी कारक न था।

खेलने जाते बच्चे,
किसी का बैट लाना तो किसी का बौल,
मज़ा बना लेते थे उस माहौल में,
हाँ, कंचे भी तो खेलते थे,
सर्दी में नाक लटकाते आते उस फटी पैंट वाले लड़के के पास कितने कंचे थे!

मख्खन लगी रोटी सुबह चाय के साथ खाना,
मामा के घर का लाड,
दोपहर को गेंहूँ के बदले बर्फ खरीदकर खाना,
शाम को मोहन सब्जी वाले के कलींदे का इंतज़ार,
दिन छिपते ही रजाई में दुबक जाना,
गाँव की बहुत सी यादें आज भी ताज़ा हैं।

Thursday, December 13, 2012

आत्म-वार्तालाप...1

पहले शिकायतें थीं,
अब समझौता कर लिया;
बदला कुछ नहीं।

हिदायतें देना एक आदत सी थी;
खुद भी कहाँ मानी हमने अपनी ही बात;
झेला किये नतीज़े, कहाँ जायेंगे।

सादगी से जियें या करलें मन की ही,
दोनों ही ओर भरम बराबर है;
करिए दिमाग से बेदखल, इन जोड़ घटावों को।

Sunday, November 18, 2012

मेरा मोह!

आज मुझे क्यूँ ले जाते हो,
अभी अभी जीना सीखा है;
पहले अगर कभी ले जाते,
हल्का सा भी रंज न करता।

जीवन जीने की गफ़लत ने
इतने दिन था मुझे घुमाया;
आशाओं पे परत दर परत
शंकाओं की धूल आ जमी।

आज कहीं से हल्की हल्की
जी लेने की चाह है उभरी;
इतने दिन था जिया छदम में,
ज्यों जीवन मुझे आज मिला हो।

मेरी बेटी हाथ पकड़कर
मुझसे बातें बहुत है करती;
मुझको ज्ञानपुंज मानकर
जाने क्या क्या बतियाती है।

सरल बाल प्यारी बातों में
रहकर शेष न कुछ चाहत है;
रोकूँ समय प्रवाह किस तरह,
मेरे डर मुझको चेताते।

आज मुझे क्यूँ ले जाते हो,
अभी अभी जीना सीखा है;
पहले अगर कभी ले जाते,
हल्का सा भी रंज न करता।





 

Sunday, November 11, 2012

वाल्ट व्हिटमैन की कविता "Song Of My life" का एक रोचक अंश


कभी मैं सोचूं  कि बस ही जाऊं पशुओं के बीच, सौम्यता और संतोष से भरे,
देर तलक ताकता रहता हूँ उनको यूँ ही।


वे न अपने हालातों का रोना रोते हैं, और न ही अपनी किसी पुरानी बात पर रोते हुए रात ज़ाया करते हैं,

और न ही अपनी ईश-भक्ति के दिखावे पर कोई बहस छेड़कर मुझे परेशान करते हैं ,

न जीवन के प्रति उनमे कोई असंतोष है और न ही चीज़ों को हासिल करते जाने का उन्माद है छाया,

न  कोई पशु किसी अन्य पशु के सम्मुख झुकता है और न ही किसी हज़ार साल पहले जन्मे पशु के सम्मुख,

उनमे कोई ख़ास आदरणीय कहलाये, ऐसा भी नहीं, और न ही कोई उदास पशु मिलेगा इस जग में।

Hindi Translation - Part-32 of "Song of My Life" by Walt Whitman.

Wednesday, November 7, 2012

Self Expression is a function of responsibility - Werner Erhard

“Happiness is a function of accepting what is. Love is a function of communication. Health is a function of participation. Self expression is a function of responsibility.”

http://wernererhardquotes.wordpress.com/

Tuesday, September 18, 2012

Buying my first serious chess book

After a lot of research on Internet, I have zeroed in on this book from Yasser Seirawan - Play Winning Chess.

Some other books suggested for beginners were:

1. Bobby fischer Teaches Chess
2. Garry Casparov's Checkmate
3. Bruce Pandolfini's Ultimate Guide to Chess
4. Yasser Seirawan's Play Winning Chess


 

Link to a list of good chess books

Sunday, June 10, 2012

जीत का राज़

एक बार किसी तालाब के सभी युवा मेंढकों के बीच एक मुकाबला हो रहा था. तालाब के किनारे बांस के झुरमुट थे. सभी मेंढकों को अपने अपने लिए चिन्हित बांस पर चढ़ना था.
जो शीर्ष तक जा पाने वाला था वो ही विजेता घोषित किया जाता.
तालाब के सभी उम्र के मेंढक उस झुरमुट को घेरकर खड़े थे. वे न केवल अपने अपने उम्मीदवार का चीख चीख कर हौसला बढ़ा रहे थे बल्कि बाकियों का हौसला कम करने की लिए तरह तरह की छींटाकशी भी.  
दर्शकों में से किसी को भी उन युवा मेंढकों से उन आसमान छूते बांसों के सिरे तक जा पाने की उम्मीद न थी.
उम्मीदवारों के कानो तक तरह तरह की बातें पहुँच रहीं थीं -"इतने ऊँचे बांस पर अंत तक पहुंचा किसी मेंढक के बस की बात नहीं है", "सब के सब बीच रास्ते से ही नीचे आ गिरेंगे", "बहुत कठिन है ये बाधा" आदि.
मुकाबला शुरू होते  ही प्रत्याशी मेंढकों ने अपने अपने बांसों पर चढ़ने शुरू किया. कोई चढ़ते ही हांफने लगा तो किसी के ज़रा सा ऊपर जाते ही हाथ छूट गए और वो नीचे तालाब में आ गिरा. सिवाय एक के, धीरे धीरे सभी मेंढक बिना शीर्ष तक पहुंचे ही नीचे तालाब में गिर चुके थे. वह एक मेंढक बिना किसी की टिपण्णी की परवाह किया किये चढ़ता ही रहा और अंततः शीर्ष तक जा पहुंचा.
नीचे खड़े सारे मेंढक बड़े खुश हुए और उसकी इस जीत का राज़ जानने के लिए उसके नीचे उतरने की प्रतीक्षा करने लगे.
उसके नीचे आने पर पता लगा कि वह मेंढक बहरा था.

कहाँ की बात कहाँ ...

एक रात की बात है. एक व्यक्ति अपनी राह चला जा रहा था. चलते चलते जब वह एक गली से गुज़रा तो उसने वहीँ सामने लगे खम्भे पर जलती तेज़ रौशनी के नीचे खड़े एक आदमी को देखा जो थोड़ा झुककर, अपने घुटनों पर हाथों को टिकाये कुछ ढूंढ रहा था.
"कुछ खो गया है क्या?", पहले आदमी ने दूसरे से पूछा.
"मेरी कार की चाबियाँ गुम हो गयीं हैं, वही ढूंढ रहा हूँ.", घबराया सा दीख पड़ता वो दूसरा आदमी बोला.
"चलिए मैं भी आपकी मदद कर देता हूँ", पहले आदमी ने कहा.
दोनों लोग थोड़ी देर तक उस रौशनी के नीचे बहुत बारीकी से हर चीज़ को उलट पुलट कर चाबियाँ ढूँढ़ते रहे.
गुम हुयी चाबियों के बारे में कुछ और मालुमात करने के लिए पहले आदमी ने दूसरे से पूछा, "क्या तुम्हें ठीक से याद है कि वे कहाँ गुमीं थीं?"
"वहां कार के पास", गली के किनारे पर थोड़ी दूर अँधेरे में खड़ी अपनी कार की ओर इशारा करते हुए दूसरे ने ज़वाब दिया. 
"तो भाई तुम उन्हें यहाँ क्यूँ खोज रहे हो?", चकित होकर पहले ने पूछा.
"वहां पर्याप्त रौशनी जो नहीं है!"

http://www.tomwason.com/storytime.html

Friday, June 8, 2012

मेडीटेशंस - तृतीय अध्याय (किश्त - 5)

ऐसा आदमी निश्चय ही महंत या ईश्वर का मंत्री ही होगा जो अपने भीतर की दिव्यता बरकरार रखे हुए है, उसे न अपने सुखों से कोई लगाव है और न ही दुखों का फर्क, न किसी नाइंसाफी का असर और न ही किसी दुष्टता का भान ; जैसे किसी सबसे बड़े दिव्य इनाम को पाने की राह का एक पहलवान जो किसी भी उत्साह के चलते अपनी राह भटकने का उसे डर नहीं; स्वयं में पूर्ण न्याय से रंग हुआ; उसे जीवन में जो भी अनुभव किया हैं उन सभी का वो आलिंगन करते हुए; जब तक सामूहिक भले की बात न हो तब तक वह दूसरों के कहने, करने और सोचने की और ध्यान नहीं देता.
अपने काम से पूरी तरह संतुष्ट रहने वाला ये मनुष्य पूरा ध्यान सिर्फ उस पर केन्द्रित करता है जो भी उसे इस विश्व से अपने हिस्से में आवंटित हुआ है. वो अपने काम को पूरी बेहतरी से करता है; अपने हिस्से का काम उसे अच्छा लगता है. किसी और मनुष्य के हिस्से के आवंटन उसके लिए अपने हमराही और सारथि जैसे हैं.
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क्रमशः

Thursday, June 7, 2012

एपिकटेट्स के विचार ...

किसी को खुश बनाये रहने के प्रयास हमें अपने प्रभाव के दायरे (SPHERE OF INFLUENCE) से बाहर निकाल ले जाते हैं.
ऐसा करने पर हम अपने जीवन के उद्देश्य पर से नियंत्रण खो बैठते हैं.
अपने आप को समझदारी (Wisdom) का अनुगामी और सत्य का साधक मानकर संतोष करिए. जो ज़रूरी है और आवश्यक भी, उसी को बार बार अपनाएँ.
दूसरों की नज़र में समझदार बनने का प्रयास न करें. यदि समझदारी से जीना है तो अपनी शर्तों और अपनी दृष्टि अनुरूप ही जियें.

मेडीटेशंस - तृतीय अध्याय (किश्त - 4)

दूसरों के बारे में सोचकर जीवन के बचे भाग को बर्बाद मत करो जब तक कि वे विचार किसी सामूहिक बेहतरी के लिए न किये जा रहे हों. किसी महत्वपूर्ण काम कर सकने का समय क्यूँ ऐसे ही गवांये? अमुक व्यक्ति क्या कर रहा है, क्या सोच रहा है, क्या साजिश कर रहा है - इस प्रकार के विचार अगर हम पाले रहें तो अपनी सोच समझ को खुद ही न देख पायेंगे.
अपनी सोच समझ में से जो भी तथ्यहीन या लक्ष्यहीन विचार हैं उनसे बचो, खासतौर पर वे विचार जो शक्की या दुर्भावना से भरे हों. अपने दिमाग को ऐसे विचारों को सोचने के लिए शिक्षित करें जैसे इस तात्कालिक प्रश्न का उत्तर - " ज़रा बताओ कि अभी तुम्हारे दिमाग में क्या चल रहा है ? " और तुरंत ही इसका बिना लाग-लपेट के जो भी उत्तर बन पड़े वही दें. तुम्हारे उत्तर तुम्हारे ही विचारों के स्पष्ट और भले होने का सीधा प्रमाण होंगें ; एक ऐसे मनुष्य के विचार जिसे इन सबसे कोई सरोकार नहीं होता है - सुख के काल्पनिक अनुभव, विलासिता, शत्रुता, दुर्भावना, शक या कोई ऐसी बात जिसके होने की स्वीकारोक्ति शर्मिंदा कर दे.

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क्रमशः

Monday, June 4, 2012

मेडीटेशंस - तृतीय अध्याय (किश्त - 3)

हिप्पोक्रेटस ने बहुत से लोगों की बीमारियों का इलाज़ किया और अंत में स्वयं किसी बीमारी से ही मरा. कील्डियन ज्योतिषियों (16 सदी इसवी पूर्व के बेबीलोन के ज्योतिषी) ने बहुतों के मरने की भविष्यवाणियाँ कीं लेकिन बाद में अपनी किस्मत में लिखी मौत के आगोश में समा गए. सिकंदर, पोम्पे, जुलिअस सीज़र ने तमाम शहरों को बार-बार नेस्तनाबूद किया और बहुत सी लड़ाईयों में हजारों-लाखों लोगों और घोड़ों को मौत के घाट उतारा लेकिन अंत में अपना समय आने पर उनको भी इस संसार से रुखसत होना पड़ा. हेराक्लिट्स ने पहले ही कहा था की विश्व विध्वंसक आग से समाप्त होगा, लेकिन वह स्वयं शरीर में पानी भरने के रोग से मरा और तब गोबर की पुल्टिस उसके तन पर लगी हुयी थीं.दरिंदों ने डेमोक्रीतुस को मारा, किन्ही और दरिंदों ने सुकरात को. इस सबसे क्या सीख मिलती है? पहले कुछ करने का प्रण करो, फिर समुद्री यात्रा पर निकलो, बंदरगाह जा पहुँचो, फिर किनारे पर चढ़ चलो (मृत्यु). यदि यह दूसरा जीवन है तो हर जगह ईश्वर है, उधर भी है. और अगर इसे असंवेदनशीलता कहें, तो तुम्हें दर्द या आनंद का आभास होना बंद हो ही चुका होगा, तुम शरीर के गुलाम न रह गए होगे, जो एक ख़राब स्वामी किन्तु बेहतरीन सेवक जैसा है. एक मन और दिव्यता है तो दूसरा धूल और लहू से गुंथी मिटटी.

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क्रमशः

इस पुस्तक के कुछ और इंग्लिश अनुवादों में से एक का लिंक

Saturday, June 2, 2012

मेडीटेशंस - तृतीय अध्याय (किश्त - 2)

जो कुछ भी प्रकृति के प्रक्रमों का चलते घटित हो जाता है उसमें भी कुछ अच्छाई होती है; रोटी का बनाया जाना ही ले लें - जब सेंके जाते समय वह फूलकर इधर उधर से कट फट जाती है तब उसे बनाने वाले रसोइये की कमी के रूप में भी देखा जा सकता है लेकिन वहीं उस रोटी का इस प्रकार से चटक जाना भूख को और बढ़ा देता है। इसी प्रकार से अंजीर नामक फल अपने पूर्ण रूप में आकार फट जाता है, पेड़ पर लगे लगे पकने वाले जैतून के फल सड़ जाने से ठीक पहले विशेष सुंदर दिखाई पड़ते है; इसी प्रकार जमीन पर पड़े अंगूर, शेर की गुथी भवें, जंगली सूअर के मुंह से निकलता झाग और ऐसी ही अन्य बहुत सी चीज़ें अपने आप मे इतनी सुंदर तो नहीं दिखेंगी परंतु प्रकृति की घटनाओं के परिणामवश होने के चलते ये भी सुंदर लग पड़ती हैं।

इसी प्रकार कोई मनुष्य जिसे प्रकृति के तौर तरीकों का भान है उसे प्रकृति के इन घटनाक्रमों में भी आनंद का अनुभव होता है। ऐसे मनुष्य को जंगली जानवरों के गुर्राने में भी वही मज़ा आता है जो उसे किसी चित्रकार या मूर्तिकार के द्वारा बनाई गयी कलाकृतियों को देखने में आता है। उसे वृद्ध जन में भी वही ताजगी और सौंदर्य दिखलाई पड़ता है। ऐसे मनुष्य की समझ से बहुत से लोगों को वाकफियत न होगी (ऐसे लोग बहुत कम होंगे) - सिर्फ वे लोग जिनहोने प्रकृति और उसके तरीकों को पहचाना है।

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क्रमशः

Friday, June 1, 2012

मेडीटेशंस - तृतीय अध्याय (किश्त - 1)

यह भाग केरनान्टेम (ऑस्ट्रिया में वियेना के पास का एक प्राचीन नगर) में लिखा गया था.

हमें जान लेना चाहिए कि हमारा जीवन धीरे-धीरे ख़त्म हो रहा है और इसका बचा भाग हर दिन कम ही होता जा रहा है, लेकिन इस पर भी गौर करें कि यदि मनुष्य जीवन और लम्बा हो भी जाए तो भी यह अनिश्चित ही है कि समय के साथ उसकी समझ बूझ और बेहतर होती चली जायेगी और ऐसी बनी रहेगी जिससे मनुष्य और परमात्मा को जानने की कोशिश की जाती रहे.

यदि किसी का उसकी वृद्धावस्था में दिमाग कमजोर होने के कारण समझ का ह्रास हो चुका हो तो भी उसका सांस लेना, भूख लगना, कल्पना करना और इच्छाओं का होना बंद नहीं होता; लेकिन अपने आप का उचित इस्तेमाल कर पाने की शक्ति, अपने कर्तव्यों का उचित प्रकार से निर्वहन कर पाना और सभी वाह्य रूपों में भेद कर पाना, जीवन की अंतिम घड़ी को पहचान पाने की योग्यता - इस सबके लिए अनुशासित तर्कशक्ति काम आती है.
इसलिए हमारे भीतर एक किस्म की जल्दबाजी होनी चाहिए, आने वाली मृत्यु के चलते नहीं वरन इसलिए कि इस विश्व को समझ पाने की हमारी योग्यता हमारी मृत्यु से पहले हमें छोड़ जायेगी.

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क्रमशः

Thursday, May 31, 2012

तितली

"आज तो हम चोकोलेट और चूइंग गम लेकर ही घर लौटेंगे", तितली ने कहा. अब उसे प्यार से तितली ही पुकार लेता हूँ. एक नहीं, दो नहीं...हजारों नाम रख दिए हैं हमने उसके. उसे भी कहाँ परवाह है, चाहे जिस नाम से पुकार लो. तीन साल की है तितली. जब भी कुछ लाने के लिए घर से निकलो तो साथ हो लेती है. योजना बना कर कदम से कदम मिलाती हुई दुकान तक जाएगी और जो भी चीज़ आँख को भाई वही उसकी खरीदे जाने की फेहरिस्त में जुड़ता जाता है.  देखता हूँ की खरीदे जाने की गतिविधि का ही आनंद उसको आता है; उस चीज़ की मल्कियत का उसको उतना लगाव नहीं है. शायद "Shopping is fun" का अंदाजा उसके दुकान में घुसते ही दीखता है. उन्हीं चीज़ों का अपने घर पर होना भी वास्ता नहीं रखता है. बस सामने हैं तो खरीद डालते हैं, खरीदारी का आनंद तो देंगीं.   यह तो थोड़ा गंभीर होता जा रहा है...चलिए आसान, मज़ेदार बातें करते हैं उसके बारे में...

बहुत सी मजेदार बातें करती है वोह. अभी थोड़े ही दिन पहले रोल प्ले करना शुरू कर दिया था उसने. "आप तितली हो और मैं आपका पापा", वोह बोली थी. "बेटा चल सो जा, बेटा दरवाज़ा खोल, बेटा पानी दे दे", उससे सुन कर बड़ा मजा आया. अपने माँ-पिता की याद आ गयी थी.  आज शाम को गाना गुनगुना रही थी, "आज से पहले, आज से ज्यादा ख़ुशी आज तक नहीं मिली". मुस्कुरा दिया था  मैं. मैंने ही सिखाया था. बच्चे जल्दी सीख जाते हैं. पूर्वाग्रह से सामान्यतः अपरिचित.

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अभी अधूरा है ...पुराना लेख है...तितली अब साढ़े पांच साल की है. उसकी बातें और आदतें ज्यादा नहीं बदली हैं...हाँ कई बार निरुत्तर कर देती है.

मेडीटेशंस - द्वितीय अध्याय (किश्त - ८)

मानव जीवन मे समय एक बिन्दु या क्षण की भांति है, उसका अस्तित्व एक प्रवाह में है, उसकी इंद्रियाँ भ्रमित करती हैं, शरीर सड़नशील, दिमाग एक चक्र में रत, उसका भाग्य अनिश्चित और प्रसिद्धि असपष्ट।

अल्प शब्दों में कहें तो - शरीर किसी धारा की भांति है तो आत्मा सपने या वाष्प की भांति, जीवन एक युद्ध है और कुछ ऐसा है जैसे यहाँ किसी अंजान जगह के सफर करते हुये चले आए हों; स्थायी प्रसिद्धि तो विस्मृति है।

तो इंसान का साथ कौन देगा? एकमात्र उत्तर है - दर्शनशास्त्र. 
यही हमारे भीतर की दैवीयता को बरकरार रखता है, हमें अपने आप को नुक्सान पहुंचाने से बचाता है,
सुख दुःख को जीतने में मदद करता है. लक्ष्यहीनता से बचाता है,  सचाई और आंतरिक पूर्णता लाता है, दूसरों के कार्यों द्वारा अपने ऊपर फर्क पड़ने से बचाता है.  जो हो रहा है और जो प्रदत्त है, उसको स्वीकार करना, वह कहीं से भी आया हो, और अंत में सहर्ष उस मृत्यु के लिए प्रतीक्षारत रहना जो उन तत्वों का फिर प्रकृति में लौट जाना ही है जिनसे मिलके ये शरीर बना है. जब इन तत्वों को एक दूसरे में बदलते रहने में कोई हानि नहीं है तो किसी मनुष्य को भला क्यूँ इन परिवर्तनों और तत्वों के वापिस विलीन हो जाने में किसी भी प्रकार का डर होना चाहिए? ये सब प्रकृति के नियमों के अनुरूप ही है और जो भी प्रकृति के नियमों के अनुरूप होता है उसमे कोई गलत बात नहीं है.

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द्वीतीय अध्याय समाप्त
(क्रमशः) 

Saturday, May 19, 2012

मेडीटेशंस - द्वितीय अध्याय (किश्त - ७)

किसी मनुष्य की आत्मा यदि किसी दुनियावी फोड़े की तरह बर्ताव करने वाली होगी, तो अपना ही नुकसान करेगी। अब अपने साथ घटित किसी बात पर खीझने से तो आप उस प्रकृति विरुद्ध ही जाएंगे जो अन्य सभी प्रकार की प्रकृतियों का सम्मिलित रूप है।

फिर आप ये भी पाएंगे कि परायापन उत्पन्न करने वाली या किसी को नुकसान पहुंचाने की मंशा आत्मा किसी क्रोधी आदमी की ही रही होती है।

ऐसी आत्मा जो बहुत खुशी या दर्द से भरी हो , वह भी स्वयं पर हिंसा ही कर रही होती है।

बहानेबाज़ी और असत्य भी कुछ ऐसी ही हिंसा है।

किसी प्रयास में लक्षयहीन होने, अज्ञानी की भांति काम करना ही कुछ ऐसा ही है - होना तो ये चाहिए कि छोटे से छोटे कार्य का भी लक्षय सिद्ध जाये।

तार्किक प्राणियों को तर्क का मार्ग अपनाना चाहिए और साथ ही उन्हें इस ब्रह्मांड के नियमो के अनुसार चलना चाहिए।

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क्रमशः


Thursday, May 17, 2012

मेडीटेशंस - द्वितीय अध्याय (किश्त - ६)

यह बड़े खेद की बात है कि कोई सब कुछ छोड़ कर यह जानने के चक्कर में लगा रहता है कि उसके पड़ोसियों के मन मे क्या चल रहा है - पिंडर नामक कवि के शब्दों में कहें तो वह व्यक्ति "धरती तले झाँकने में लगा रहता है"।

उसे इस बात का एहसास नहीं होता कि उसके अंदर भी दिव्यता है जिसको ईमानदारी से पोषित किया जाना चाहिए। यह पोषण, उस देवताओं और मनुष्यों की दिव्यता को जोश की अधिकता, जिद्दीपन एवं असंतोष से बचाकर रखना ही तो है। देवताओं के गुण अपनी उत्कृष्टता के कारण सम्मान पाते हैं तथा मनुष्यों के मध्य प्यार, और आपसी भाईचारा अहम है किन्तु मनुष्यों की कुछ बातें अफसोस करने लायक भी हैं जैसे उनका अच्छे व बुरे के बीच भेद न कर पाना - जैसे कि कोई काले और सफ़ेद के बीच ही भेद न कर पाये।



तुम  तीन हज़ार साल जियो या उससे भी दस गुना ज्यादा पर याद रखो कि कोई जो जीवन जी रहे हो उसी को खोना पड़ता है या यूं कहिए कि जिस जीवन को कभी खो बैठने वाले हो उसी को अभी जी रहे हो। सबसे लंबा जीवन हो या सबसे छोटा - अंतिम हश्र तो वही है। वर्तमान क्षण सबके लिए एक सा है; सो जो गुजर रहा है वह भी सभी के लिए समान है; सो जो कुल नुकसान है वो मात्र समय को कुछ भाग है। कोई भी अपना भूत या भविष्य नहीं खोता है - कोई कभी ऐसा कुछ खो सकता है क्या, जो कभी उसका रहा ही न हो?

  ये दो बातें याद रखो -
पहली, कि सभी चीज़ें सदा से एक से ही हैं, बार बार उसी चक्र से गुजरती हुयी। कोई फर्क नहीं पड़ता जब उसी चीज़ को सौ, दो सौ या अनंत बार देखा जाये।
दूसरी, कि लंबे समय तक जीने वाला और अल्पायु वाला, दोनों ही एक जैसे अंत को प्राप्त होते हैं। एक वर्तमान क्षण ही है जिससे कोई वंचित रह सकता है, तो अब यह जिसका था ही नहीं तो उसे उसके खो देने को तो बात ही नहीं उठती है।

"जैसे विचार होंगे वैसा ही संसार अभिव्यक्त होगा" - ऐसा मोनिमस ने कहा था। बिलकुल साफ बात है। अगर इसे सच मान लें तो यह "साफ" बात तभी लगेगी जब तुम इसका सार समझ पाओगे।


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क्रमश:

Tuesday, May 15, 2012

मेडीटेशंस - द्वितीय अध्याय (किश्त - ५)

सभी चीज़ें कितनी शीघ्रता से खत्म हो जाती हैं, हमारे शरीर इस भौतिक विश्व का हिस्सा बन जाते हैं, हमारी यादें समय में कहीं गुम हो जाती हैं। हमारी इंद्रियों के विषय - सुखद, दुख में डुबा डालने वाले,  आत्म शलाघा से तृप्त; सार रहित, तुच्छ, भंगुर एवं शर्मनाक हैं ये - हमारे मन-मस्तिष्क को इन का भान होना चाहिए।

जिन लोगों के विचार और राय प्रतिष्ठा पाते हैं, दिमाग उन्हें तवज्जो देता है। मृत्यु क्या है? कोई सिर्फ मृत्यु पर ही विचार करे और अपनी विश्लेषण कर सकने की योग्यता के इस्तेमाल से मृत्यु को उसके अन्य मतलबों से अलग करके देखे तो पाएगा कि वह प्रकृति का एक कार्य ही तो है - अब यदि कोई व्यक्ति प्रकृति के ही कार्य से डरने लगे तो क्या यह व्यवहार बचकाना न कहलाएगा। मृत्यु मात्र प्रकृति का अपना एक कार्य ही नहीं बल्कि उसके स्वयं के लिए लाभकारी भी है।

इंसान उस ईश्वर को कैसे महसूस कर पाता है, अपने सर्वस्व के किस हिस्से से, और इस सबका स्वभाव क्या है।

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क्रमशः






Monday, February 13, 2012

राम प्रसाद् और बाज़ारी तिकड़में!

यहाँ मैं एक आम आदमी को राम प्रसाद नाम से पुकार रहा हूँ।

आज जिधर भी देखें, तेज़ तर्रार होना एक बड़ा भारी गुण हो चला है। सरलता से काम चलने वाला नहीं ऐसा जान पड़ता है। राम प्रसाद तो लुट ही जाएंगे। असली राम प्रसाद यानि अपने अमोल पालेकर की फिल्मों मे मनोरंजन के साथ साथ सरल जीवन का जो उदाहरण दिखता था वो आज के बाज़ारी युग मे सार्थक नहीं लगता है।

चीजों के दाम चीजों से ज्यादा आप कितना दे पाएंगे से तय होते हैं। अच्छे दिखेंगे तो चीज़ें महंगी मिलेंगी बाउजी, सो थोड़ा दाढ़ी बढ़ा लें और उलझे बाल न ही सवारें तो बेहतर होगा। हाँ कुछ ज्यादा  न हो जाये नहीं तो दुकान से दुत्कार दिये जाने का खतरा भी है।

हमसे पिछली पीढ़ी की साक्षरता हमसे कम भले ही रही हो, हमसे कहीं ज्यादा अक़्लमंदी से जीवनयापन उन्होने किया और कर रहे हैं। ये भी जान लीजिये की उनकी अक्लमंदी इस चालू स्मार्टनेस से निपटने का भरोसेमंद तरीका है। चार दुकान भाव लेकर सामान लेना, सामान लें या न लें पर अगर बाज़ार से निकल रहे हैं तो कीमत का अंदाज़ा लेते चलें, सवाल जवाब करने मैं कोई कंजूसी न करना, आँखें तरेरनी पड़ें तो कोई कोताही न करें, और ऐसी ही न जाने कितनी "बेस्ट प्रैक्टिस" हमारे अग्रज इस्तेमाल करते रहे हैं।

बाज़ार नियंत्रित अर्थव्यवस्था मे गुण तो अवश्य होंगे पर मैं तो उन दोषों की बात कर रहा हूँ जो मुझ पर सीधे सीधे फर्क डालते हैं। अब देखिये कि 15 साल पहले "गुड नाइट" जैसे मच्छर भगाने वाले यंत्रों का उतना प्रचलन नहीं था। या तो मच्छरदानी लगाईये या फिर फिनिट छिड़ककर घर से कुछ घंटों के लिए बाहर निकल जाइए। मच्छरों से छुटकारा आज कि तुलना मे कहीं ज्यादा प्रभावी था। आज ऐसा नहीं है। समान बनाने वाली कंपनी अब आपको लंबे समय तक फांस लेने कि ताक मे रहती हैं।

Extraordinary Measures नामक हॉलीवुड फिल्म देखिये। इस फिल्म मे बड़े ही अच्छे ढंग से एक दवाई कंपनी का काम करने का ढंग दिखाया गया है। अच्छा बुरा तो क्या कहें पर हाँ ये काम करता है। यह तो तय है की मानवीय जज़्बात का स्वभाव अक्सर काफी निजी होने के चलते मुश्किल मे फंसे व्यक्ति के गिर्द के लोग उसकी व्यथा को पैसे की भाषा के सहारे ही समझ पाते हैं।

एक आम बात थी कि लोग एक बार चीज़ खरीदकर उसका बरसों इस्तेमाल करते थे। अब कंपनियाँ इतनी जल्दी जल्दी नए फीचर्स और मॉडेल्स ले कर आती हैं कि उस समान के बरसों न चल सकने की खामी ये कंपनियाँ उपभोक्ता की नया पाने की लालसा से ढ़क देती हैं। राम प्रसाद फिर ठगे जाते हैं जबकि ये कंपनियाँ अमीरी के नित नए कीर्तिमान बनती जाती हैं।  एप्पिल कंपनी को ही देखिये, अपने ही बढ़ते पैसे से परेशान है और उसके नए बॉस की समस्या ये है की उस पैसे का निवेश कहाँ करे और लोग हैं की अपने कड़े उतारकर भी समान लेने कतारों मैं खड़े रहते हैं। हिंदुस्तान मे तो अभी तक यह नहीं सुना है पर विदेशों मे ये शायद कोई आश्चर्य नहीं है।

पहले से कहीं ज्यादा आज ये बात प्रासंगिक है कि हम जानें और तय करें कि क्या लेना है और क्या नहीं। साथ ही जो ले रहे हैं उसमे लंबे समय तक फाँसकर रखने की कितनी मंशा जुड़ी है।

राम प्रसाद नहीं बल्कि लक्ष्मण प्रसाद बनकर काम चलेगा। समझे ...



Sunday, February 12, 2012

My kid, my assumptions and limitless possibilities!

While returning from Shipra Mall, Navya asks me - "Papa, What is the price of this soft toy that we have just purchased?"
"You guess", I said.
I was expecting her to say Rs 1 or Rs 10 or some other number she is familiar with and was just waiting to burst into a laughter once she gives such an answer. A smile was already there on my face in anticipation.

"It is a very good soft toy. All good things are expensive so  it must be a very expensive toy", she replied.

I had not expected it from her as she is just a five year old kid. Though I know that I have always known her from what I expect her to know. She, at times, makes me rethink. I have reminded myself of not keeping her confined within my assumptions and expectations.

Now she is a possibility beyond all assumptions, expectations and evidences.

Friday, January 20, 2012

प्रायोगिक गद्य



प्रकृति के नियमो को टटोलता ब्रह्मा, जवाहर लाल नेहरू पार्क के एक बड़े से बरगद के पेड़ के नीचे किसी सेठ साहूकार द्वारा दान मे दी गयी बेंच पर बैठा था।  ये सीट भी उस सेठ साहूकार ने अपने परिवार की किसी महिला के नाम पर दान मे दी थी और किसी विज्ञापन की तरह ये बखूबी उस बेंच पर बड़े अक्षरों मे लिखा था।

मुंह को ब्रह्मा स्लो मोशन मे ऊपर लेकर गया और बरगद की डाल-डाल का मुआइना करते हुये गर्दन यहाँ से वहाँ घुमाने लगा। ब्रह्मा से सिर्फ चार डाल ऊपर बैठी चिड़िया को उसका नीचे से यूं ताकना रास न आया और वो फुर्र से उड़ गयी। शायद उस उड़ने की क्रिया की प्रतिक्रिया में उसी डाल से दो पुरानी पत्तियों ने विदा ली और चक्राकार मार्ग से नीचे को आने लगीं। ब्रह्मा को उनका इस तरह गिरना बड़ा अच्छा लगा। सब कुछ भूल उनही को टकटकी लगाकर देखता रहा जब तक एक ओंस की बड़ी सी बूंद ऊपर से उसकी नाक पर टपककर, रगड़ खाती उसके पैरों के ठीक बीच से होती ज़मीन पर न जा गिरी।

घड़ी न पहनी थी सो समय का पता न चला पर कुछ समय बाद जब वहाँ से उठकर चला तो सूरज काफी चढ़ आया था. सर्दी के मौसम में अगर धूप तेज़ निकली हो तो क्या कहने, बड़ी आशामयी होती है ऐसी धूप - ऐसा आभास देती है जैसे किसी मुसीबत का डटकर सामना कर रहें हो।
घर लौटकर अखबार देखा तो वही मुद्रा स्फीति, भ्रष्टाचार और भांति भांति की निराशाजनक हर तरफ छायी थीं.

पार्क मे बिताया गया समय यकीनन ब्रह्मा का दिन का सबसे सुकून भरा समय होता है किन्तु बाद के पल जब इधर उधर की वास्तविकताओं से दो-चार होना पड़ता है तो सारा सुकून जैसे रफूचक्कर।

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आकस्मिक विचार !

यूं तो कहता है अपने आप को अच्छा;
हो उसीके साथ बुरा, ये तलब है तुझको।

याद नहीं आते करम अपने तुझे;
कोई तो होगा जो तेरे बारे मे सोचे है यही।

ज़माना देख लिया है जितना बदा था तूने;
कभी कहीं से नयापन दिख ही जाता है।

न वे दिन लौटेंगे, और न वे लोग ही;
फ़क़त याद में ही सब के सब बसर करते हैं। 

"कानागवा की लहर" नामक यह तस्वीर विकिपीडिया से।

Thursday, January 12, 2012

घर


कुछ दीवारें, किसी बस्ती में, मेरा पता बताती - यही घर है?
कहीं ये मुझको सीमित करती, कहीं ये मुझको परिभाषित।

यहाँ देखता भांति-भांति के अनुभव घर निर्माण करें,
धनोपार्जन, अच्छा दिखना, जीवन यापन, अहम की तुष्टि, अन्य बहुत कुछ।

कीड़ा होता या पशु-पक्षी, इस अनुभव से बच जाता
मात्र सुरक्षा दृष्टि से वाज़िब दीवारों को घर कहता।

रहने वालों की भीड़ रहे तो घर का होना रहे कारगर,
एकाकीपन में तो घर भी कारागार सा बन जावे।

कुछ दीवारें, किसी बस्ती में, मेरा पता बताती - हाँ, यही तो घर है!