Friday, December 23, 2011

भागम-भाग!

शायद पिछले एक महीने पहले तक अपने आप को कहीं न कहीं किसी न किसी जीवन-क्षेत्र में आलसी मानता ही चला आ रहा था मैं। आलस न होता, समय से उचित कर्म को अंजाम पहुंचाता तो ये या फिर वो हासिल कर पाता - ऐसा विचार खाली मन में कभी न कभी आ ही कूदता था।

पिछले महीने घर फोन करने पर ही मालूम हुआ कि पिताजी को एक आँख से देख पाने मे तकलीफ हो रही है। मैंने तो बात हल्के में टाल दी। सोचा कि कोई हल्की फुलकी तकलीफ रही होगी, खुद दिखा लेंगे वरना महीने के अंत में तो जाना ही है तब जाकर डाक्टर को दिखा लाऊँगा। तभी एकाएक बड़े भाई के फोन ने स्थिति की गंभीरता को रेखांकित किया।

मैं यूं तो किसी भी कर्म को करते समय अपनी मनः स्थिति पर काफी निर्भर रहता हूँ लेकिन तब कोई मनः स्थिति आड़े नहीं आई या यूं कहें कि मनः स्थिति भी मुझे सहयोग कर रही थी। अगले दिन कि योजना बना ली। लौटने की टिकट देर रात ही बुक करा ली पर जाने की टिकिट न मिल पायी। जल्दी सुबह ही बस से गृह नगर आगरा को चल दिया। बस में नींद आ गयी और सब कुछ योजनानुसार ही चल रहा था कि तभी बस ने फ़रीदाबाद की सीमा में कहीं एक एक्सीडेंट कर दिया। पुलिस आ पहुंची और सड़क पर भीड़ ने बस को घेर लिया।

तुरंत बस बदलने को निर्णय लेकर मैंने वहाँ से गुजरती बस को हाथ हिलाया। शाम होने से पहले घर पहुंचकर उसी दिन वापिस लौटने के प्रण ने वहाँ हुयी दुर्घटना के बारे में ज्यादा सोचने का मौका न दिया। दूसरी बस के कंडक्टर ने भी मौके का फाइदा उठा पूरा किराया वसूला और मैं दुगना किराया पहुँचकर दोपहर के समय आगरा जा पहुंचा।

उसी दिन जब देर शाम को वापिस लौटने लगे तो ट्रेन लाते हो गयी और दुबारा नयी टिकिट खरीद कर, टीटी से अनुनय-विनय कर हम पंजाब मेल से वापिस दिल्ली आ पहुंचे।

सर गंगाराम अस्पताल मे रेटिना के एक विशेषज्ञ डाक्टर शशि नाथ झा बैठते हैं। अगले दिन ही उनसे भेंट का समय लेकर मैं पिताजी को उनसे दिखलाने जा पहुंचा। इनकी आँख का रेटिना अपनी जगह से हट गया था। अगले दिन ऑपरेशन का समय तय हुआ। पिताजी थोड़े घबराए थे लेकिन मैं न आलस मे था और न ही किसी घबराहट मे। अमूमन ऐसे मौकों पर घबराहट का घेरा मुझे घेर सकता है पर इस बार ऐसा न था।
मैं उनको लेकर तय समय पर अस्पताल गया जहां उनका ऑपरेशन होना था। ऑपरेशन बिना किसी खास समस्या के हो गया।  हालांकि TPA ने काफी परेशान किया पर फिर भी मैं सब कुछ निपटा कर घर पहुंचा।

अगले दिन मुझे दिल्ली हाफ़ मैराथन में भाग लेना था। हिम्मत करके, कई दिन की जमा थकान होने के बावजूद मैं नेहरू स्टेडियम गया जहां मैंने 6 किलोमीटर की दौड़ मे भाग लिया।

इस पूरी भागम-भाग में मुझे अपने सबल पक्ष के दर्शन हुये। न हारने वाला पक्ष। प्रयास करते रहने वाला पक्ष। विजेता! अपने आप अपर विजय! मानसिक थकानों और हारों पर विजय! वहाँ बाहिर तो सब मेरे हितेशी ही थे। मैं जीता।

हालांकि उसी दिन एक फोन भी खो दिया जिसने मुझे मेरे ही क्षीण होते, किन्तु अंतर विद्यमान आसक्ति का भी साक्षात्कार कराया।

तब से अब तक लगभक एक महिना हो चुका है। भागम-भाग बदस्तूर जारी है। ऑफिस में कभी CMMI के मीटिंग्स तो कभी कुछ कभी कुछ। मिनट भर भी खाली नहीं। घर आने पर कसरत, पाठ-पूजा, दोस्तों, घर के सदस्यों से बात-चीत। सोने तक फुर्सत नहीं है। हाँ घर भी तो खारीद रहा हूँ....उसके लिए कितनी भाग दौड़ की है उसका तो जिक्र भी न कर पाया।

पिताजी ठीक हैं। कभी मेरे तो कभी छोटे भाई के साथ अस्पताल जाते है। निरंतर बेहतर महसूस कर रहे है। सब कुछ ठीक रहे तो घर भी जनवरी अंत तक मिल जाएगा और हम NCR मे अपने ही घर के मालिक हो जाएँगे। कर्जे कि परवाह भी कर लेंगे...हर साल बढ़ते किराये से भी तो निजात पाएंगे।

कभी कभी पूछता हूँ खुद से ...आलसी? कौन मैं?

Saturday, December 10, 2011

किसी आदत में बदलाव लाने का रहस्यमयी नियम


यह पोस्ट लियो बाबाऊता के ब्लॉग की एक पोस्ट का हिन्दी अनुवाद है (मूल पोस्ट)
पिछले कुछ वर्षों में मैंने अपनी आदतों में बदलाव लाने के बारे में काफी कुछ सीखा है, इस सीख को हजारों लोगो के साथ मैंने बांटा भी है।

देखा जाये तो कुछ वे आदतें बदलना कहीं ज्यादा कठिन होता है जिनपर लोगों को खुद ही नियंत्रण नहीं होता। वे लोग उन आदतों को बदलना तो चाहते हैं पर उनके अनुसार उनमे उसे बदले जाने की पर्याप्त इच्छाशक्ति का अभाव होता है ( हालांकि मेरा मानना है कि इच्छाशक्ति जैसी किसी चीज़ का अस्तित्व नहीं होता है)।

मेरे लिए जो चीज़ें कभी मेरे अपने नियंत्रण के बाहर लगती थीं वे हैं : धूम्रपान, बाहर का जंक-फूड खाना, सामाजिक उत्सवों के दौरान ज्यादा खा लेना, काम करने में टालमटोल करना, गुस्सा करना, धैर्य का अभाव और निराशाजनक चिंतन करना। 
एक छोटा सा रहस्य जानने के बाद ये बदलाव आसान हो गया:

अगर आप अपनी आदत के प्रति सचेत हैं तो आप उसे बदल पाएंगे।

अचंभित होकर इस लेख को आगे पढ़ना न रोकें। यह लगता तो बड़ा ही साधारण सा रहस्य है और इसका अनुमान या जानकारी भी, हो सकता है, कुछ पाठकों को रही हो।  चलिये, इस विषय में थोड़ा और गहराई से बातें करते हैं।

जब भी हमें कुछ ऐसा खाने की तीव्र इच्छा उठती है जो हम जानते हैं कि हमारे खाये जाने के लिए उचित नहीं है फिर भी हम अक्सर उसे खा ही लेते हैं। पर क्या ये सब इतना आसान है? यह सच है कि उस समय हमारा मस्तिष्क तर्क द्वारा यह तय करने में लगा होता है कि हमें वो केक क्यूँ खा लेना चाहिए, उसे न खाना इतना कठिन क्यों है, क्यों उसे खाया जाना इतना बुरा तो नहीं है। ये मस्तिष्क जानना चाहता है कि हम क्यों अपने लिए पीड़ा पैदा कर रहे हैं, क्यूँ नहीं जीने देते अपने आप को और क्या हमें अपने आप को इस दावत देने का हक़ नहीं है?

हमें पता भी नहीं चलता और हमारे ही भीतर समान्यतः इतना कुछ चलता रहता है। बड़ी ही शांति से हमारी चेतना के पार्श्व में कहीं यह सब होता तो है। और अविश्वासनीय रूप से शक्तिशाली प्रक्रम है ये। यदि हमे इस सब की उपस्थिती का भान न हो तो ये और भी ज्यादा शक्तिशाली हो जाता है।

ये हमें हर बार हराता जाता है सिर्फ खाने से संबन्धित आदतों में ही नहीं वरन उस सब में जो हम करना चाहते हैं पर छोड़ बैठते हैं, और उसी की ओर बढ़ते जाते हैं।

ऐसी शक्तिशाली प्रवर्ति को कैसे हराएँ जो हमारा अपना ही मस्तिष्क है?

सचेत हो जाना इसकी कुंजी है। एक शुरुआत है।

  1. सचेत रहने से इसकी शुरुआत होती है : शुरुआत करें अपने साथ हो रही इन घटनाओं के साक्षी बनकर। खुद के स्वयं से होने वाले वार्तालापों को सुनना शुरू करें, देखते जाएँ कि आपका खुद का दिमाग क्या गुल खिलाता है। ध्यान से देखते रहें। ये हर समय हो रहा होता है। अगर आप ध्यान या मेडिटेशन करते हैं तो ऐसा करना आसान होगा। मैं जब दौड़ने निकलता हूँ तो iPod नहीं लेकर निकलता, शांति से प्रकृति का आनंद लेता जाता हूँ और दिमाग के खेल का साक्षी बना रहता हूँ।
  2. इस बारे में कुछ न करें:आपका मस्तिष्क आपसे विनती करेगा कि आप वो केक खा लें (सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा ही तो बोला है!) या सिर्फ एक सिगरेट पीने कि गुजारिश या दौड़ना बंद करने कि विनती और या फिर किसी काम को टालने का आगृह। अपने मस्तिष्क की मांगें सुने जरूर किन्तु इन पर इससे आगे कुछ भी न करें। सिर्फ शांति से इन मांगों को सुनते ही चले जाएँ।  
  3. जाने दें : सिगरेट पीने, कुछ खाने, टाल-मटोल या दौड़ना बंद करना ऐसी किसी भी तीव्र इच्छा को जाने दें। तात्कालिक ही है ये। सिर्फ एक या दो मिनट के लिए ही। भरपूर सांस लें और इन सब इच्छाओं को जाने दें।
  4. मस्तिष्क के दिये जा रहे तर्कों को हराएँ:अपने दिमाग द्वारा दिये जा रहे तर्कों को चुनौती दें। जब ये कहे कि एक छोटा हिस्सा खाने मे नुकसान नहीं है! तो इसे याद दिला दें कि ऐसे पिछले कितने ही मौकों पर इसने ऐसा ही कहा था और इसका कहा मानकर आज आप मोटे हो चुके हैं। जब ये कहे कि दौड़ने के इस दर्द से अपने आप को क्यूँ गुज़ारते हो?”, इसे बताएं कि अस्वस्थ रहना कहीं ज्यादा दर्दनाक होगा साथ ही बताएं कि केक न खाना बलिदान नहीं बल्कि एक अच्छी स्वास्थ्यकारी आदत है।

बहुत से मौकों पर हमारी इच्छाशक्ति हमें दगा दे जाती है। ऐसे ही मौकों पर हमारा अपने मस्तिष्क के बारे मे सचेत रहना जरूरी हो जाता है।

यदि सचेत रहें तो ऐच्छिक परिवर्तन लाया जा सकता है। ये एक छोटा सा रहस्य है जिससे जीवन में मनचाहा परिवर्तन लाया जा सकता है। मेरे जीवन में मैं इसके चलते मनचाहे परिवर्तन कर पाया। मैं ध्यान से अपने मस्तिष्क की प्रवृति देखता हूँ, इंतज़ार करता हूँ और अंततः इसे हरा डालता हूँ। आप भी ऐसा कर सकते हैं।