Sunday, September 18, 2011

मिलिंदपनहो- मिलिंद - नागसेना संवाद के कुछ और अंश

 “आपको कितनी वर्षा ऋतुओं का अनुभव है, नागसेना?”
(उस समय की प्रथा के अनुसार अपनी दीक्षा ग्रहण के बाद से कुल वर्षा ऋतुओं की संख्या किसी भिक्षु का अनुभव दर्शाती थी)

राजन मुझको सात वर्षा ऋतुओं का अनुभव है
ये कैसे कहेंगे आप कि ये आपके सात हैं; क्या आप स्वयं ये सात हैं अथवा सात कोई संख्या है?”
नागसेना ने कहा,”आपकी छाया मुझे सामने ज़मीन पर दीख रही है। आप राजा हैं या वह छाया राजा है?”
राजा तो मैं ही हूँ, नागसेना, किन्तु छाया का अस्तित्व भी मुझसे ही है।
हे राजन, ठीक उसी प्रकार वर्षों की संख्या सात है, मैं सात नहीं हूँ, किन्तु मुझसे से यह सात का अस्तित्व है और यह उसी प्रकार मेरा है जैसे वह छाया आपकी।
वाह नागसेना, बहुत खूब! यह भी एक कठिन प्रश्न था

राजा मिलिंद बोला,” आदरणीय, क्या हम कुछ और भी विचार विमर्श करें?”
यदि राजन एक विद्वान कि भांति विचार विमर्श करेंगे तो मेरी हाँ है किन्तु यदि एक राजा कि भांति ऐसा करना चाहेंगे तो मेरा उत्तर नकारात्मक है।
विद्वान किस प्रकार विचार विमर्श करते हैं?”
विद्वानों के विचार विमर्श में ज्ञान का आदान प्रदान होता है, बातें पता चलती हैं; किसी एक का ज्ञान अगर कम दिखे भी और यदि उसे ऐसा बताया भी जाए तो भी वह क्रोधित नहीं होता।
और राजा किस प्रकार विचार विमर्श करते हैं?”
जब कोई राजा विचार विमर्श करता है और अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत्त करता है तो अपने से असहमत लोगों को दंड देने को आतुर रहता है।
तब ठीक है, मैं एक विद्वान की भांति ही आपसे विचार विमर्श करूंगा। आदरणीय, आप निर्भय होकर बोलें।
ऐसा ही होगा राजन।
नागसेना, मेरा एक प्रश्न है”, राजा ने कहा।
कृपया पूछें।
मैंने पूछ तो लिया, आदरणीय।
तब मैं भी उसका उत्तर दे चुका हूँ।
क्या उत्तर दिया आपने?”
जो आपने पूछा।

नागसेना की विद्वता से संतुष होकर मिलिंद ने अपने मंत्री देवमंतीय को नागसेना और उनके साथी भिक्षुओं के साथ अपने महल में आमंत्रित करने को कहा और नागसेना”, नागसेना बड़बड़ाता हुआ वहाँ से चला गया।

देवमंतीय, अनंतकाया और मांकुरा तीनों नागसेना को लेने उनकी कुटिया जा पहुंचे। चलते समय अनंतकाया ने नागसेना से प्रश्न किया आदरणीय, जब मैं नागसेना कहता हूँ तो तो वह नागसेना क्या है?”
तुम क्या सोचते हो कि नागसेना क्या है?”
आत्मा, अन्दर की श्वास जो बाहर आती और अन्दर जाती है।
किन्तु वह श्वास बाहर जाकर आए ही न तो क्या मनुष्य जीवित रह पाएगा?”
कदापि नहीं
जब वे तुरही बजाने वाले जब पूरे ज़ोर के साथ श्वास बाहर निकाल देते हैं तो क्या वही श्वास वापिस लौटती है?”
नहीं, आदरणीय
तब वे क्यूँ नहीं मरते।
मैं आपसे बहस न कर पाऊँगा, कृपयस मुझे इसका रहस्य बताएं।
श्वास में कोई आत्मा नहीं होती। श्वास का भीतर या बाहर आना-जाना इस शारीरिक ढांचे की अपनी खूबी है।
उसके बाद नागसेना ने अनंतकाया के साथ अभिधर्म पर विचार विमर्श किया और वह भिक्षु की व्याख्या से संतुष्ट हो गया।
भिक्षुओं के महल में आकर खाना खा लेने के बाद राजा ने एक कम ऊंचाई के आसन पर बैठकर पूछा किस विषय पर वार्तालाप करना चाहेंगे आप?”
धर्म पर।
इस पर राजा ने पूछा, आदरणीय, आपका अपने जीवन में यहाँ से आगे उद्देश्य क्या है और आपने अपना अंतिम लक्ष्य क्या तय किया है?”

दुख: का अंत हो और कोई नया दुख: न उत्पन्न हो ऐसा हमारा उद्देश्य है और इसकी पकड़ पूर्णतः समाप्त हो जाये ऐसा हमारा लक्ष्य है।
क्या इसी प्रकार के भले कारणों से ही ये सब लोग आपके दल में सम्मिलित होते हैं?”
नहीं, कुछ राजाओं के दंड से बचकर भागे हुये होते हैं तो कुछ लुटेरों से सुरक्शित रहने के लिए, कुछ कर्जे से तो कुछ अपनी आजीविका चलाने के लिए। लेकिन जो भी सही कारणों से आते हैं वे अपने दुखों से पूरी तरह मुक्ति पाने आते हैं।
राजा ने कहा,” क्या कोई ऐसा भी होता है जो मृत्यु के बाद पुनर्जन्म न लेता हो?”
हाँ, जिसमे कोई किसी प्रकार की कोई कमी नहीं होती वह मृत्यु के बाद पुनर्जन्म नहीं लेता; जिसमे कोई कमी होती है वह मृत्यु के बाद पुनर्जन्म लेता है।
क्या आपका पुनर्जन्म होगा?”
यदि मैं किसी आसक्ति के साथ मरा, तो हाँ; अन्यथा नहीं।
क्या कोई सोच-विचार करने की क्षमता के चलते पुनर्जन्म से बच सकता है?
 पुनर्जन्म से बचने के पीछे सोच-विचार, बुद्धिमत्ता, आत्म-विश्वास, गुण, सजगता, ऊर्जा और आत्म-केंद्रण आवश्यक हैं।
क्या सोच-विचार और बुद्धिमत्ता एक ही बात है?”
नहीं। जैसे पशुओं में सोच-विचार का गुण होता है किन्तु बुद्धिमत्ता नहीं।
तो फिर सोच-विचार और बुद्धिमत्ता में क्या भेद है?”
जहां पकड़ना सोच-विचार की प्रकृति है वहीं अलग करना बुद्धिमत्ता की।
कोई उदाहरण दीजिये।
जौ की फसल उगाने वाले जौ कैसे इकट्ठा करते हैं?”
वे उल्टे हाथ से जौ का एक छोटा गट्ठर पकड़ते हैं और दायें हाथ में एक हंसिया लेकर जौ काटकर अलग करते जाते हैं।
हे राजन, इसी प्रकार एकांतप्रिय संत जन सोच-विचार द्वारा मन को पकड़ते हैं और बुद्धिमत्ता द्वारा उसकी कमियाँ काटकर अलग कर देते हैं।
नागसेना, गुण की क्या प्रकृति है?”
राजन, गुण की प्रकृति सहारा देना होती है; यह सभी अच्छाइयों का आधार है: पांचों नियन्त्रक संकायों (आत्म-विश्वास, ऊर्जा, सजगता, आत्म-केंद्रण और बुद्धिमत्ता), पांचों नैतिक शक्तियों ((आत्म-विश्वास, ऊर्जा, सजगता, आत्म-केंद्रण और बुद्धिमत्ता), ज्ञानोदय (Enlightenment) के सातों घटकों (सजगता, खोजशीलता, ऊर्जा, आनंद, प्रशांति, आत्म-केंद्रण और आत्म नियंत्रण), सद मार्ग के आठों भागों (सम्यक दृष्टि, सम्यक विचार, सम्यक वाणी, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक प्रयास, सम्यक सजगता और सम्यक आत्म केंद्रण), सजगता के चारों आधारों (शरीर, भावना, विचार और मानसिक विषय-वस्तुओं की सजगता), चारों सम्यक प्रयासों (अपूर्ण स्थितियों से बचाव और निवारण साथ ही पूर्ण स्थितियों का विकास एवं पालन), सफलता के चारों आधारों (उत्सुकता, ऊर्जा, हठीलापन एवं बुद्धिमत्ता), चारों तल्लीनतायें (एक-सूत्रियता की चार स्थितियाँ), आठों विमुक्तियाँ (गहन आत्म केंद्रण द्वारा मन की विमुक्ति की आठ स्थितियाँ), आत्म केंद्रण के चारों प्रकार (प्रेम, करुणा, आनंद और आत्म नियंत्रण पर ध्यान लगाना), आठों उपलब्धियां ( चार सगुण एक-सूत्रता, चार निर्गुण एक-सूत्रता)। इन सभी का गुण ही सहारा देता है। जो भी इन सभी अच्छाइयों का आधार गुण को बनाता है तो वे अच्छाइयाँ कम नहीं होतीं।

इसका उदाहरण दीजिये।
राजन, जैसे सभी पशु पक्षियों का जीवन धरती द्वारा पोषित होता है उसी प्रकार एकांतप्रिय संत जन गुण के सहारे बाकी अच्छाइयों को विकसित करते हैं।
गौतम बुद्ध ने कहा था कि :
जब कोई गुणवान व्यक्ति आत्म केंद्रण और समझ का विकास करता है तो उनकी मदद से वह जुझारू और बुद्धिमान भिक्षु हर मुश्किल का समाधान ढूंढ लेता है।

अर्हंत की महारत

अर्हंत की महारत 
(यह संवाद नागसेना और राजा मिलिन्द के मध्य हुये संवादों के संकलन मिलिंदपंहो से लिया गया है। )

राजा मिलिन्द ने नागसेना से पूछा, एक अर्हंत को शारीरिक अनुभूतियाँ ही होती हैं,  मानसिक अनुभूतियाँ नहीं। ऐसा कैसे संभव है। तो क्या एक अर्हंत अपने शरीर की माँगों  के आगे असहाय है। क्या उसको अपने शरीर पर कोई नियंत्रण नहीं? एक चिड़िया तक अपने घोंसले की शासिका होती है।

नागसेना ने उत्तर दिया, राजन, शरीर में ये दस प्रकार की प्राकृतिक गतिविधियां होती हैं जिन पर किसी अर्हंत का वश नहीं होता : शीत, ताप, भूख, प्यास, मल त्याग, मूत्र त्याग, थकान, वृद्धावस्था, रोग व मृत्यु।
जिस प्रकार पृथ्वी पर वास करने वाले सभी जीव इस पर निर्भर तो हैं किन्तु इसकी प्राकृतिक गतिविधियों के नियंत्रक नहीं हैं, ठीक इसी प्रकार अर्हंत अपने शरीर पर निर्भर तो हैं पर उनका अपने शरीर की प्राकृतिक गतिविधियों पर नियंत्रण नहीं है।

फिर एक सामान्य जन को शारीरिक और मानसिक, दोनों ही प्रकार की अनुभूतियाँ क्यों होती हैं?” मिलिन्द ने पूछा।

उनके मानसिक प्रशिक्षण के अभाव के कारण।
जिस प्रकार कमजोर रस्सी से बंधा एक भूखा बैल उसे तोड़कर आसानी से मुक्त हो जाता है, ठीक उसी प्रकार एक सामान्य जन का मन वेदना से उद्वेलित हो उठता है और मानसिक दर्द की अनुभूति करता है।
वहीं एक अर्हंत का मन भली-भांति प्रशिक्षित होता है। जब उसका शरीर दर्द की अनुभूति करता है, तब वह अपने मन को अनित्य (Impermanence) पर केन्द्रित कर लेता है। ऐसा करने से उसका मन उद्वेलित नहीं होता और उसे कोई मानसिक वेदना नहीं होती; ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार से तेज़ हवाओं के आगे एक विशाल वृक्ष की शाखाएँ भले ही झूल उठती हों परंतु उसका तना विचलित नहीं होता।

मिलिंदपनहो- मिलिंद - नागसेना संवाद

मिलिंदपनहो एक प्राचीन बौद्ध ग्रंथ है जो मूलतः पाली भाषा में लिखा गया था। इसमे राजा मिलिंद और भिक्षु नागसेना के मध्य हुये संवाद का विवरण दर्ज़ है।

मिलिंद बैक्ट्रिया (वर्तमान अफ़ग़ानिस्तान) का यवन (यूनानी) शासक था जिसने लगभग 155 से 130 ईसा पूर्व तक बैक्ट्रिया पर शासन किया। नागसेना एक बौद्ध भिक्षु था। दोनों के मध्य घटित यह संवाद गौतम बुद्ध के परिनिर्वाण के लगभग चार सौ साल बाद का है।

इस संवाद के बारे में:

कहा जाता है कि अनुभवी और न्यायप्रिय राजा मिलिंद तर्कशास्त्र में प्रवीण था। अपने धर्म संबंधी संदेहों को दूर करने हेतु उसने बहुत से प्रसिद्ध धार्मिक अध्यापकों से विचार विमर्श किया किन्तु उनके उत्तरों से वह संतुष्ट न हुआ।
अपने मंत्री देवमंतीय के कहने पर राजा मिलिंद ने नागसेना से मशवरा करना तय किया और अपने साथ पाँच सौ बैक्टीरियायी यवनों का दल लेकर अपने रथ पर सवार हो नागसेना से मिलने उसकी कुटिया की ओर चल पड़ा।

मिलिंद - नागसेना संवाद:

राजा मिलिंद भिक्षु नागसेना से मिलने आगे बढ़ा और उनका अभिवादन किया, तत्पश्चात वह आगे बढ़कर पास ही एक आसन पर बैठ गया। उसके बाद मिलिंद ने नागसेना से प्रश्न किया
आदरणीय भिक्षु आपका अस्तित्व कैसे जाना जाता है और आपका नाम क्या है?”
राजन, मुझे नागसेना नाम से जाना जाता है किन्तु यह मात्र एक पदवी जैसा ही है, किसी व्यक्ति विशेष से इसका कोई वास्ता नहीं।
तब मिलिन्द ने वहाँ उपस्थित सभी बैक्ट्रिया के यवनों और बौद्ध भिक्षुओं के सम्मुख यह बात रखी भिक्षु नागसेना कहते हैं कि उनके नाम किसी व्यक्ति को इंगित नहीं करता, क्या आप सभी इनकी बात से सहमत हैं?” उसके बाद नागसेना की ओर मुड़कर उसने कहा आदरणीय नागसेना, अगर यह सत्य है तो फिर आप उसे क्या कहेंगे जो आपको चोगा (पोशाक), भोजन या शरण देता है। उसे क्या कहेंगे जो सत्य की राह पर चलता है? जो व्यक्ति हत्या करता है, चोरी करता है, व्यभिचार करता है, झूठ बोलता है या मद्यपान करता है? अगर आपका कथन सत्य है तो फिर सही गलत का भेद नहीं दिखता और न ही अच्छे और बुरे कर्म का कोई कर्ता होगा और न ही कर्म का कोई फल। हे महाशय, यदि कोई आपको मार भी डाले तो भी कोई कोई हत्यारा कहाँ हुआ, अगर आपके साथी भिक्षुओं की भी बात करें तो आपके यहाँ न कोई गुरु होगा और न ही शिष्य। आप कहते हैं कि आपको नागसेना कहा जाता है; तो ये नागसेना वास्तव में है कौन? क्या आपके बाल नागसेना हैं ?”
राजन, मैंने ऐसा नहीं कहा”, नागसेना ने उत्तर दिया।
या नाखून, दाँत, त्वचा या कोई अन्य अंग?”
बिलकुल नहीं।
शरीर, भावना, दृष्टिकोण, समझ, चेतना में से कोई एक अथवा इन सभी का योग?” या इन सभी के परे कुछ और है जो नागसेना है?”
इनमे से कुछ भी नहीं”, नागसेना ने उत्तर दिया।
तब तो जैसे मैंने पूछा, कुछ भी नागसेना नहीं। नागसेना मात्र एक खोखला शब्द है। फिर ये कौन है जो हमारे सम्मुख कौन खड़ा है?
आदरणीय, आप असत्य कहते हैं।
राजन, आप राज परिवार से हैं और आप अवश्य ही सभी साधनों से सम्पन्न रहे होंगे। आप यहाँ कैसे पधारे हैं, पैदल या रथ के द्वारा?”
रथ के द्वारा
राजन रथ की व्याख्या करें क्या वह धुरी है? या फिर पहिये, अथवा छकड़ा अथवा लगाम अथवा वो जुआ (रथ का वो हिस्सा जो पशु की गर्दन पर रखा जाता है) ही रथ है। क्या इन सबका योग रथ है या इन सब से इतर कुछ और?”
इनमें से कुछ भी तो नहीं।

तब यह रथ एक खोखला शब्द ही है। आपने झूठ ही तो बोला जब आपने कहा कि आप रथ पर सवार होकर यहाँ आए हैं। आप राजा हैं, आपको किस डर से असत्य बोलना पड़ गया।

तब नागसेना ने वहाँ उपस्थित सभी बैक्ट्रिया के यवनों और बौद्ध भिक्षुओं के सम्मुख यह बात रखी राजा मिलिंद कहते हैं कि वे यहाँ रथ पर सवार होकर आए हैं परंतु यह पूछे जाने पर कि वह रथ वास्तव में है क्या, वे उसे बतलाने में असमर्थ हैं। क्या आप सभी इनकी बात से सहमत हैं?”
तब वहाँ उपस्थित पाँच सौ बैक्ट्रिया के यवनों ने चिल्लाकर नागसेना की बात का समर्थन किया और राजा से कहा की अगर उनके पास कोई तर्क बचा है तो वे उसे बताएं।

आदरणीय भिक्षु, मैंने सत्य ही बोला है। चूंकि बताई गई सभी वस्तुएं इसका हिस्सा हैं अतः इसे रथ शब्द के अंतर्गत ही जाना जाएगा।

आपने सही कहा राजन, आप इसका तात्पर्य जान गए हैं। बत्तीस प्रकार के विभिन्न जैविक भागों से बने शरीर और अपने अस्तित्व के पाँच घटकों (सदा परिवर्तनशील शरीर, भावना, दृष्टिकोण, संस्कार और चेतना) के चलते ही मैं नागसेना शब्द के अंतर्गत आता हूँ।

रथ के संदर्भ में, विभिन्न हिस्सों का अपना अलग अलग अस्तित्व है और वे रथ शब्द से पुकारे जाते हैं इसी प्रकार मनुष्य के संदर्भ में, विभिन्न घटकों की अपनी मौजूदगी के चलते हमारा अपना अस्तित्व होता है। गौतम बुद्ध की उपस्थिती में बहिन वाज़िरा ने भी ऐसा ही कहा था।

अति सुंदर, नागसेना। आपने बहुत सरलता से मेरे कठिन प्रश्न को हल कर दिया। बुद्ध भी आज अगर स्वयं यहाँ होते तो आपके उत्तर का अनुमोदन करते।

 (ऊपर प्रदर्शित तस्वीर इस लिंक से ली गयी है - http://25.pariyatti.org/2011/04/lists-of-25.html)