Tuesday, August 16, 2011

ज्ञानोदय - २

कभी कभी मन खिन्न हो तो जाता है,
मेरे अपनों के विरुद्ध ही मुझे धकेलना उसको आता है;
सारी दुनिया बुरी सी तब लगे।

तभी कहीं ये समझ में कौंध जाता है,
सब कुछ तो वैसा ही है जैसा वो वहाँ, मुझसे बाहर है;
वहाँ सामने - मेरा और उसका वज़ूद, साथ कदमताल करते से।

सबकी अपनी पीड़ा होती, सबका अपना सच होता है,
हालांकि सब शुभचिंतक हैं, घटनाओं के अनुगामी हैं;
जो ज्ञाता हो वो ही समझे, और फिर कुछ अच्छा सोचे।

अपना दृष्टिकोण बदलना मेरे लिए कहीं आसान है,
तुरंत जैसे किसी नयी रोशनी में सब नज़र आए;
रोचक सी दुनिया, प्यारे से अपने, मैं भी दिलखुश।  

ज्ञानोदय - १

मन जो कभी खिन्न हो जाये, अपनों के भी विरुद्ध चले,
सारा जग मतलब खोता सा, स्व: अस्तित्व विकल होवे।  

सारे सोच विचार व चिंतन दुर्योधन को मात करें,
रिश्तों का मीठापन उड़कर शाखा पर विश्राम करे।

तभी समझ की बयार कहीं से हितकारी प्रहार करे,
मेरा-उसका वज़ूद सामने कदम ताल करते पावें।

सबकी अपनी पीड़ा होती, सबका अपना सच होता है,
हालांकि सब शुभचिंतक हैं, घटनाओं के अनुगामी हैं।

जो ज्ञाता हो वो ही समझे, और फिर कुछ अच्छा सोचे,
घटनाओं की कमी नहीं है, जिनमें अच्छी यादें थीं।

दृष्टिकोण बदलकर देखो, न कि प्रमाण बुरे का खोजो,
नयी रोशनी तुरंत प्रकट हो, रोचक सब कुछ पुनः करे।

रिश्ते तो रिश्ते होते हैं, मिठास हमें लानी होती है,
तुम दिलखुश तो ये है आसाँ, वरन अपेक्षा निर्भरता है।