Saturday, July 23, 2011

चंडीगढ़ और शिमला की सैर (यात्रा वृतांत - ४)

शिमला स्टेशन के प्लेटफोर्म पर ही यात्रियों के बैठने हेतु एक वेटिंग रूम है जिसकी दीवार पर पास के दर्शनीय स्थल और उनकी स्टेशन से दूरी लिखी है. हमने स्टेशन से बाहर निकलते समय कुछ देर वहां रूककर इस सूची से  हमारे द्वारा अगले दिन की दोपहर तक देखे जा सकने वाले स्थलों का अनुमान लगा लिया. मेरे हाथ पर बंधी घडी दोपहर का १ बजा रही थी किन्तु स्टेशन की धुंध देखकर समय का अंदाजा लगाना संभव न था. हमें अगले दिन शाम तक कालका वापिस लौटना था इसीलिए समय की उपलब्धता के आधार पर हमने पहले होटल पहुँचने और विश्राम करने के बाद इन ५ स्थलों को घुमने का निश्चय किया - Indian Institute of Advanced Study (IIAS), मॉल रोड़, रिज़,
लक्कड़ बाज़ार  और कुफरी.

हम स्टेशन से पास ही राम बाज़ार में रुके. कमरे की मुख्य खिड़की से शिमला की घाटियाँ और थमे थमे से बदल नज़र आते थे.

थोड़ी देर में हम होटल से बाहर निकलकर Indian Institute of Advanced Study (IIAS) देखने चल पड़े. पैसे की बचत करने के लिए हमने कुछ सुविधाओं का त्याग करने का निश्चय किया और राम बाज़ार के नीचे स्थित बस स्टैंड से बालूगंज की बस पकड़ ली. बालूगंज नाम सुनकर में थोड़ा चकित हुआ क्योंकि इसी नाम का एक मोहल्ला मेरे गृह नगर आगरा में भी है. शिमला का बालूगंज दरअसल Boileauganj है जो बिगड़कर बालूगंज कहलाया जाने लगा होगा. बालूगंज से पैदल ऊपर पहाड़ी पर जाया जा सकता है जहाँ यह इंस्टिट्यूट स्थित है. चढ़ते चढ़ते थकान हो चली लेकिन इंस्टिट्यूट का कहीं कोई नामोनिशान न था. हमें भी संदेह हुआ कि कहीं गलत दिशा में तो नहीं आ गए; कहीं अभी तक की सारी मेहनत बेकार न चली जाये तो हमने वहां से गुजरते एक सज्जन से रास्ता पूछा और पता चला कि अभी और चढ़ाई चढ़नी है. अंततः कभी चलते, कभी रुकते हम वहां पहुंचे  जहाँ से इंस्टिट्यूट दिखाई पड़ रहा था - ब्रिटिश राज की निश्चित ही एक भव्य ईमारत.
यहाँ २० रूपये प्रति व्यक्ति टिकेट है और कैमरा के लिए १० रूपये लगते हैं;  हाँ,  बच्चों का कोई टिकेट नहीं. अच्छी बात यह भी है कि टिकेट लेने के बाद सभी लोग एक दल में एकत्रित हो जाते हैं जिसे एक गाइड भवन का टूर कराता है. यह भवन स्वाधीनता के पूर्व भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी शिमला में भारत के वायसराय का निवास स्थान रहा था और यह सन १८८८ में बनकर तैयार हुआ था. ब्रिटिश वास्तुशैली की यह इमारत, उस युग की उत्तर भारत में बनी कुछ सर्वश्रेष्ठ इमारतों में से है. आजादी के बाद इसे राष्ट्रपति निवास कहा गया. वर्ष १९६४ में देश के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री सर्वपल्ली राधाकृष्णन के प्रयासों से एस भवन का नामकरण Indian Institute of Advanced Study (IIAS) हुआ.

वापिस लौटकर हम राम बाज़ार आये और वहां से सीढियां चढ़कर मॉल रोड आ पहुंचे.

क्रमशः

Thursday, July 21, 2011

मेरा विकिपीडिया के लिए हिंदी अनुवादित पहला लेख

अपना पहला हिंदी विकिपीडिया पेज मैंने आज लिखा है. कुछ हासिल कर लिया हो जैसे. पूरा पूरा अनुभव कर पा रहा हूँ इसका और साथ ही इसे गहराने का प्रयास कर रहा हूँ मैं जिससे इस अनुभव की पुनरावृति मानसिक रूप से ही बिना साक्षात् प्रमाण के भी कर सकूँ.
  
लेख यहाँ पढ़ें! 

Wednesday, July 20, 2011

चंडीगढ़ और शिमला की सैर (यात्रा वृतांत - ३)

ट्रेन सुबह ६:३० पर शिमला के लिए रवाना हुई. हमारी सीट शिमला की ओर बढ़ती ट्रेन में दायीं ओर थी; इस यात्रा में दायीं ओर बैठना इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि हमें बताया गया था की दायीं ओर ही ज्यादा दर्शनीय घाटियाँ दिखलाई पड़ती हैं.

परवानू से पहाड़ की चढ़ाई शुरू हो जाती है. चित्ररंजन का बना वो डीज़ल इंजन जैसे पूरी शक्ति लगा कर ट्रेन को खींच रहा था. किसी हाँफते धावक की श्वास की तरह धुएं का गुबार उगलता इंजन कालका के ट्रैक के किनारों पर दोनों ओर बने घरों के कतारों के बीच से होता उस चढ़ाई पर ट्रेन को ले चला. जैसे ही ट्रेन किसी चंद्रकार पथ पर घूमती, ट्रेन भी चंद्रकार हो लेती. इंजन से लेकर आखिरी डब्बे तक एक साथ दिखाई पड़ते. हमें भी नव्या की भांति यह अनुभव नया ही लगता.

अनेकों छोटी बड़ी सुरंगों ओर पुलों से गुजरती ट्रेन कभी ऐसे ही कहीं भी रुक जाती तो कभी रस्ते में छोटे से स्टेशन पर. जहाँ भी वो रूकती लगभग सभी लोग ट्रेन से निकलकर नीचे आ जाते ओर सबके कैमरे दनादन तस्वीरें खींचने में जुट जाते. मुझे कभी कभी यह विचार भी आता है कि डिजिटल कैमरा का युग आने के बाद हम सब लोग ज्यादा ही तस्वीरें खींचते हैं और तस्वीरों के जरिये बाद में यादों में लौटना उसी समय एक और बेहतर अनुभव के निर्माण की तुलना में कहीं ज्यादा ही महत्वपूर्ण हो जाता है.

रास्ते में जब जब ट्रेन सुरंग से निकलती, ट्रेन के सभी लोग बहुत शोर करते. एक बार तो किसी ने शायद शरारत में ऐसी चीख निकाली कि लगा जैसे किसी के साथ कोई दुर्घटना घटी हो.

कहीं दूर नीचे लटकते चलते बादल तो कहीं आकाश छूते पेड़ों की चोटियों पर टंगे से, मंथर गति की बारिश की फुहारें, कहीं कहीं पुलों के नीचे से तेज़ आवाजें करता बहता पानी - सब कुछ नया ही तो था. एकाएक ऐसी सुरंग आई की ख़तम होने का नामे ही न लेती थी, आखिरकार जब ख़त्म हुयी तो हम बड़ोग स्टेशन पर आ पहुंचे.

बड़ोग समुद्र तल से १५६० मीटर की ऊंचाई पर है. बड़ोग यूँ तो एक सुन्दर जगह है लेकिन इसके नाम के साथ एक दुखद घटना भी जुडी है. कहते हैं कि एक अँगरेज़ इंजिनियर जिनका उपनाम बड़ोग था, उन पर इस जगह पर बनने वाली ट्रेन मार्ग की सुरंग बनाने का जिम्मा आया. वर्ष १९०३ की बात है, बड़ोग साहब ने परियोजना को जल्दी अंजाम तक पहुँचाने के लिए पहाड़ी को दोनों ओर से खुदवाना शुरू किया. बनते बनते यह स्थिति आ पहुंची की दोनों ओर से खुदे सिरे मिल न पाए. परिणामस्वरुप सरकार ने १ रूपये का सांकेतिक जुर्माना बड़ोग साहब पर चस्पा कर दिया, सरकारी खजाने के धन की बर्बादी का मामला जो था. शर्मसार बड़ोग ने सुबह सैर पर जाते समय खुद को गोली मार ली. उनके साथ चलते उनके कुत्ते ने भागकर बाकि लोगों तक इसका संकेत पहुँचाया तो, पर बड़ोग साहब को बचाया न जा सका. स्वाधीन भारत में कलमाड़ी जैसे लोग उनका अनुसरण करना चाहें तो कौन रोकता है. बड़ोग स्टेशन की वर्तमान सुरंग बाद में हैरिंगटन नामक इंजिनियर ने पूरी करायी.

प्रकृति से कभी हाथ मिलाती तो कभी उसका चक्कर लगाती, मस्ताती सी यह ट्रेन लगभग ६ घंटे में शिमला पहुँच गयी. जुलाई की दिल्ली की गर्मी में शिमला के मौसम का अंदाज़ा लगाना कठिन था. वहां तो हमें स्टेशन पर ही जाकेट निकलने पड़े.

क्रमशः

Monday, July 18, 2011

चंडीगढ़ और शिमला की सैर (यात्रा वृतांत - २)

रॉक-गार्डेन देखने के बाद हम वहां से निकलकर पैदल पैदल सुखना झील की ओर चल पड़े. रास्ते में जगह जगह सड़क किनारे टोकरी रखकर कुछ लोग चमकदार और ताजा दिख रही जामुन बेच रहे थे. हमने ज्यादा ध्यान न दिया लेकिन नव्या जैसे अड़ ही गयी थी. हमें भी जामुन खाए शायद काफी समय हो गया था तो तत्काल थोड़ी जामुन ले लीं. जामुन का रसीला स्वाद सारे बचपन का अनुभव फिर वापिस ले आया. बहुत स्वादिष्ट लगीं वे सुखना के किनारे बिकती जामुन.


सुखना झील का दृश्य बड़ा ही मोहक है. दूर सामने हिमाचल के पहाड़ों की कतार है तो इस तरफ किनारे की पटरी पर मुख्यतः पंजाब प्रान्त के सुन्दर और देश के बाकी हिस्सों की अपेक्षा ज्यादा स्वस्थ दिखते लोगों की चहल-कदमी. बहुत से लोग नौकायन में मशगूल थे. किनारे पर कुछ लोग हाथ से चित्र उकेरने वालों के सामने जडवत बैठे अपनी तस्वीर बनवा रहे थे. डिजिटल कैमरा के युग में यह प्रयोग करने का अपना अलग ही मज़ा होता होगा.

सुखना झील के पास ही, सड़क के उस पार एक प्री-पेड रिक्शा का काउंटर है जहाँ पहले से तय कीमत पर ऑटो-रिक्शा लिए जा सकते हैं. हमने वहां से एक प्री-पेड रिक्शा लेकर पंचकुला के लिए प्रस्थान किया जहाँ हमें उस मित्र के सगाई समारोह में भाग लेना था.

चंडीगढ़ के किसी उपनगर जैसा है पंचकुला लेकिन जहाँ चंडीगढ़ एक केंद्र शासित प्रदेश है वहीँ पंचकुला हरयाणा राज्य का एक भाग है. एक सुन्दर, व्यवस्थित और साफ़ सुथरा शहर - पंचकुला.

सगाई में कई और मित्रों से भेंट हुई . सगाई में लड़की के परिवार वालों ने मौज मस्ती और खाने पीने का अच्छा बंदोबस्त किया हुआ था. लड़की एक सिख परिवार से है और सिखों की गर्मजोश मेहमान नवाजी जग जाहिर है. धूम-धाम के साथ, बहुत सारे रिश्तेदारों की उपस्थिति में सगाई संपन्न हुयी. अपने मित्र को बधाईयाँ देकर और रस्मी तस्वीरों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के बाद हम उसी रात आगे की यात्रा पर कालका के लिए रवाना हुए.

पंचकुला से करीब १५ किलोमीटर दूर है कालका और यह हरयाणा राज्य में ही है. कालका से आगे पहाड़ों की ओर चलें तो हिमाचल की सीमा शुरू हो जाती है.

रात ११ बजते बजते हम कालका जा पहुंचे जहाँ हमें अपने एक घनिष्ट रिश्तेदार के यहाँ रुकना था. अत्यंत स्वादिष्ट खाना और ढेर सारी बातों के बाद नींद कब आ गयी, याद नहीं!

सबह ६:३० पर कालका से नेरो-गेज़ की छोटी ट्रेन में बठकर हम शिमला के लिए रवाना हुए. इस फर्स्ट क्लास डब्बे की टिकेट प्रति व्यक्ति २८०/- रुपया है. चूँकि इस मार्ग पर कई तरह की ट्रेन दिखाई पड़ीं जिनकी सीट व्यवस्था अलग अलग थी तो मेरा अनुमान है की टिकेट की कीमतों में भी एक से ज्यादा आप्शन रहे होंगे.

क्रमशः

Friday, July 15, 2011

चंडीगढ़ और शिमला की सैर (यात्रा वृतांत -१)

"मेरे पास तेरे लिए एक  धमाकेदार खबर है ", मैंने जैसे ही एक मित्र द्वारा फेसबुक पर किसी तीसरे मित्र के लिए लिखी गयी यह टिपण्णी पढ़ी तो उसे तुरंत फ़ोन घुमाया. "ऐसी क्या खबर है रे", मैं बोला. "८ जुलाई को सगाई है मेरी, तुमको भी निमंत्रण अभी दे रहा हूँ; सगाई चंडीगढ़ में होगी", उसने कहा.


उस मित्र का यह निमंत्रण मेरे लिए लुभावना था क्योंकि उसकी सगाई के साथ साथ चंडीगढ़ और उस के पास बसे पहाड़ी पर्यटन स्थल शिमला घूमने का यह एक मौका जो ठहरा. मैंने अनीता और नव्या के साथ सगाई में जाने और उसके बाद घूमने निकल पड़ने की विचार कर लिया पर कोई निश्चित योजना न बनाई.

जैसे-जैसे समय नज़दीक आया वैसे-वैसे न जाने की भावना बलवती होती गयी. पर अनीता जैसे मन बना ही चुकी थी; अंत समय पर उसने मुझे भी इस यात्रा पर निकलने को राज़ी कर लिया. नव्या अभी इन सब हाँ-ना के चक्र से बाहर है और जीवन के क्षण क्षण के आनंद के साथ चलने का जो बाल सुलभ गुण होता है, उसी का लाभ ले रही है. उसकी हाँ तो यकीनन थी ही जिस पर विचार भी नहीं किया गया.

बिना किसी ख़ास तैयारी या रिजर्वेशन के हम लोग सुबह ही घर से ISBT बस स्टेशन के लिए चल दिए. ISBT से कई तरह की बसें चंडीगढ़ जाती हैं जिनमे किराये उनकी सुविधा के अनुरूप हैं - वोल्वो, वातानुकूलित, गैर-वातानुकूलित. हमें वोल्वो बस मिल गयी जिसका किराया तो बाकी बसों से ज्यादा है पर साथ ही वो उनसे ज्यादा आरामदायक भी है. इनका किराया प्रति व्यक्ति 475/- Rs. रहा. चलने के करीब 5 घंटे में हम चंडीगढ़ जा पहुंचे.

दिल्ली से चंडीगढ़ की दूरी कोई 250 किलोमीटर की होगी जो  की  राष्ट्रीय राजमार्ग- 1 ( NH1)  द्वारा जोड़े जाते हैं. रास्ते में पड़ने वाले सारे शहर हरयाणा प्रदेश में पड़ते हैं और दिल्ली और उसके आस-पास के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की भीड़-भाड़ के उलट काफी विरल दिखते हैं.

यह तो सब मानेंगे कि चंडीगढ़ भारत के कुछ चुनिन्दा व्यवस्थित और सुन्दर शहरों में से एक है; यह सर्वश्रेष्ठ शहर है या नहीं - ये बहस के लिए अवश्य एक अच्छा विषय साबित होगा.

चंडीगढ़ पहुँचते ही हम ऑटो-रिक्शा द्वारा सीधे रॉक-गार्डेन चल पड़े. रॉक-गार्डेन सेक्टर-१ में है और सुखना झील से बमुश्किल १ किलोमीटर की दूरी पर. इसे पदम्-श्री से सम्मानित श्री नेक चंद द्वारा बनाया गया था. कहते हैं उन्होंने  पेड़ों से घिरे इस स्थल पर १९५७ में कलाकृतियाँ बनाना शुरू किया और बाहरी दुनिया से इसे छिपाकर रखा. इस  जगह की जानकारी बाहरी दुनिया को काफी बाद में - १९६९ में जाकर हुयी. शुरुआत में इस निर्माण को अवैध घोषित किया जाने वाला था किन्तु आगे चलकर यह चंडीगढ़ की शान बनने  वाला था.  वाकई एक खूबसूरत जगह है यह रॉक-गार्डेन जहाँ बच्चों को भाने वाली कलाकृतियाँ हैं तो उनको बनाने में लगा सामान देखकर बड़े भी चकित रह जाते हैं. चूड़ीयों से बनी व सजी चिड़ियाँ हैं तो कहीं पुराने बिजली के काम आने वाले सिरेमिक से बनी दीवारें, कहीं बोरों समेत जमा हुआ सीमेंट किन्ही खम्भों का हिस्सा बना हुआ है तो कहीं टॉयलेट के सिरेमिक से जड़ी इंसानी आकृतियाँ तथा और भी बहुत कुछ.  देखना भी कोई महंगा नहीं - बड़ों की टिकेट १५ रूपये तो १२ साल तक के बच्चे सिर्फ ५ रूपये में वहां की सैर का आनंद ले सकते हैं .


क्रमशः

Thursday, July 7, 2011

गुस्ताव - एक कहानी (भाग - ६)

" साइकिल कभी भी डाक-गाडी के पीछे न रखना", गुस्ताव ने पीकू से कहा. पीकू ने तपाक से पूछा,"ऐसा क्यूँ"? "कभी देखा है डाक गाडी का पिछला हिस्सा...बिल्कुल साइकिल के पहिये जितना ही ऊपर होता है वो ज़मीन से. रुकी हुई गाड़ी आगे चलने के पहले हल्का सा पीछे आती है और अगर तुम उसके बिल्कुल पीछे खड़े हो तो तुम्हारी साइकिल के अगले पहिये की खैर नहीं. मेरे साथ हो चुका है रे", घटना के ख़राब अनुभव की पुनरावृत्ति करता गुस्ताव बोला.


दोनों पार्क में सुबह की सैर कर रहे थे. बारिश का सा मौसम था - घनघोर काले बदल, तेज़ ठंडी हवा और चारों ओर हरियाली ही हरियाली. कहीं कोई क्रिकेट खेलने में लगा है तो कोई फ़ुटबाल, कहीं बेडमिन्टन का जोर है तो कहीं कबड्डी का समां. गुस्ताव का मन क्रिकेट खेलने का है पर वहां खेलती किसी टीम से कोई वाकफियत नहीं है. बोले तो किस से बोले. दूर बैठा देखता रहा. अच्छे शोट पर मन ही मन तारीफ कर बैठता. पीकू उससे ७ या ८ साल छोटा था. दोनों एक ही बेंच पर बैठे थे. पीकू ने भी एक नींद खींच ली. गुस्ताव की ज्ञानवर्धक बोझिल बातों से सो जाना ही अच्छा है ऐसा पीकू के मन में चलता ही रहता था. गुस्ताव भी उसके ज्ञानवर्धन का कोई मौका न चूकता था.