Tuesday, June 28, 2011

The Karate Kid

Though the "wax on-wax off" is replaced with a jacket game in the new version of The Karate Kid but the virtue of a calm learner's mind and noble objective behind the learning is still the baseline of what this movie talks about. Mr. Miyagi in the older version was more convincing than our favorite Jacky Chan in this new version. Both the movies focus on the inner game while talking about Karate or Kung Fu which reminds me of a classic book on the subject - "The Inner Game of Tennis".

However the interesting part about this movie is  - how the Chinese audience  would have reacted to it? The protagonist Jaden Smith trains in mainland China with a Chinese guru (Jacky Chan) and eventually defeats a Chinese opponent. The political equation of the world is experiencing an over assertive China for at least a couple of years now. Such a movie could have hurt the sentiments of an egoist Chinese as the movie might be interpreted as American supremacy over  the Chinese. It may give birth to an idea of a Chinese entry to the world of high tech movies also. Here I am not talking about behind the scenes electronics which I am sure must have been a product of China as well but the software content of the movies too.

No matter which version was better, The Karate Kid is a movie worth watching as it gives some idea of "Optimal Experience" or "Flux" (this blog is named after such an experiential state) while performing day-to-day actions. At one point, Jacky Chan even mentions in the movie - "Every thing is Kung Fu"; it means to me that performing every action from within the optimal experience.

Saturday, June 18, 2011

मेडीटेशंस - द्वितीय अध्याय (किश्त - ४)

  ये जीवन किसी भी क्षण छोड़कर चले जाओगे तुम: कुछ भी करते, बोलते या सोचते समय ऐसा अपने मन मस्तिष्क में रखो. अगर ईश्वर का अस्तित्व है तो दुनिया से रुखसत होने में कैसा डर: वो तुमको कोई नुक्सान नहीं पहुंचाएगा. अगर ईश्वर का अस्तित्व नहीं है अथवा ईश्वर को इंसानों से की कोई परवाह नहीं है तो फिर ऐसे जीवन का भी कोई मतलब नहीं जिसमें ईश्वर न हो या उसकी कृपा दृष्टी न हो.  अर्थात ईश्वर हो या न हो - यह जीवन खोने से डरने की कोई जरूरत नहीं है.

हालांकि मेरा मानना है कि ईश्वर का अस्तित्व है और वे मानवजाति की परवाह भी करते हैं : साथ ही उन्होंने इंसानों को वो शक्ति भी दी है जिससे वो नकसान उठाने से खुद को बचा सके.  

जो कुछ भी नकसानदायक है उस सबसे बचने की शक्ति दी है उसने.  अब जब कोई चीज़ इंसान को ख़राब न कर पाए तो भला उसकी जिन्दगी को कैसे ख़राब करेगी वो.

संपूर्ण की प्रकृति (Nature of the Whole) ऐसी गलती जाने, अनजाने में या सामर्थ्य की कमी से कभी ऐसा न करेगी की सही और गलत का भेद ही खो दे.  जीवन, मृत्यु, प्रसिद्धी या एकाकी जीवन, दुःख या सुख, धन दुआलत या गरीबी - सही और गलत दोनों प्रकार के लोगों के पास आते हैं लेकिन अपने आप में इनमे से कोई भी स्वयं सही या गलत की परिधि से बाहर हैं.

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क्रमशः

Friday, June 17, 2011

Wednesday, June 15, 2011

अन्ना हजारे - एक "अनएलेक्टएड टाईरेंट"

आज कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी कह उठे की अन्ना हजारे एक "अनएलेक्टएड टाईरेंट" हैं. शब्दार्थ ढूंढें तो "अनएलेक्टएड टाईरेंट" का मतलब हुआ - "बगैर चुनाव लड़े सत्ता कब्ज़ाने वाला". कांग्रेस के बड़े बड़े नेताओं और मंत्रियों के रिकॉर्ड पर नज़र डाले तो पता लगेगा कि बहुत से महानुभाव "अनएलेक्टएड टाईरेंट" ही सत्ता पर काबिज़ हैं. श्री मनमोहन सिंह से पहले सारे प्रधान मंत्री लोक सभा के सदस्य होते थे लेकिन श्री सिंह जो कि निःसंदेह एक योग्य अर्थशास्त्री रहे हैं, ने यह परंपरा बदल दी है. वे जनता द्वारा सीधे नहीं चुने गए हैं.  "अनएलेक्टएड टाईरेंट" की ये पदवी उन पर भी फिट होती है.  जनतंत्र का मजाक देखिये कि वे राज्य सभा में आसाम से आते हैं. अब भला उनका आसाम में कैसे डोमिसाइल हो गया. लेकिन हमें उनसे कोई शिकायत नहीं. पर अन्ना का इस बिना पर तिरस्कार अच्छा नहीं. यह भी सही है कि बहुत से योग्य व्यक्ति जो देश कि व्यवस्था में बहुत महती योगदान दे सकते हैं उनमें से अधिकतर जनता के द्वारा चुनकर सत्ता में नहीं आ सकते.  संयुक्त राज्य अमेरिका, जो की दुनिया की सबसे बेहतरीन जनतांत्रिक व्यवस्थाओं में से एक है, वहां ऐसे योग्य व्यक्तियों को सीधे राष्ट्रपति द्वारा जन हित के पदों पर नियुक्त करने का प्रावधान है.  अपने यहाँ भी सरकार नंदन निलेकनी, सेम पित्रोदा, मोंटेक सिंह अहलुवालिया जैसे काबिल लोगों की प्रतिभा का लाभ उठा चुकी है. तो फिर अन्ना की सेना से परहेज़ क्यों?

निष्पक्ष रूप से भी देखेंगे तो पाएंगे कि अन्ना हजारे के द्वारा किये गए कार्य, मनीष तिवारी के कार्यों की अपेक्षा  कहीं ज्यादा जन हित साधते हैं.

अब मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित अन्ना कोई चुनाव न ही लड़ें तो अच्छा.  चोर उचक्कों के बीच उन्हें देखना मन को न भायेगा!

Monday, June 13, 2011

गुस्ताव - एक कहानी (भाग - ५)

 थोड़ी ही देर में झपकी आना शुरू हो गयी. कुछ देर कुर्सी पर ही सोने के बाद वो उठा और रसोई से पानी पीकर पलंग पर जा सोया. नींद में जो एक अवचेतन मन होता है वो जैसे जाग उठा...

क्रिकेट का मैच चल रहा है. ६ खिलाडी पहले ही आउट होकर जा चुके हैं. पूरे २०० रन अभी और चाहिए जीतने के लिए. स्टेडियम के सारे दर्शक इस टीम से आस छोड़ चुके हैं. बेटिंग गुस्ताव कर रहा है. दे दनादन, शॉट पर शॉट - दूसरे बेट्समेन का तो नंबर ही नहीं आने दे रहा है यह. पासा जैसे पलट ही गया हो. स्टेडियम में चारों ओर गुस्ताव का ही हल्ला है. अंततः टीम को जीतकर ही लौटा वो.

कई ओर ऐसे ही नायक रूप से परिपूर्ण स्वप्न कब से कब तक चले पता नहीं. सुबह हो चुकी थी.


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क्रमशः

Friday, June 10, 2011

मेडीटेशंस - द्वितीय अध्याय (किश्त - ३)

हमेशा ये बातें याद रखो:

विश्व की प्रकृति क्या है ; तुम्हारी अपनी प्रकृति क्या है; दोनों का आपसी रिश्ता क्या है;  एक कितना विशाल तो दूसरा उसके सामने कितना बौना है; ऐसा कोई नहीं है जो तुमको उस प्रकृति के तारतम्य में रहते हुए कुछ बोलने और करने से रोक सके, जिसका कि तुम एक हिस्सा हो.

थेओफ्रस्तस ने जब दर्शनशास्त्र को एक आम इंसान के ज्ञान के अनुसार आसन रखकर पापों को तुलनात्मक क्रम में रखा तो उसने बताया कि लालसा से किये गए अपराध, क्रोध में किये गए अपराधों से कहीं अधिक गंभीर होते हैं.  क्रोधी व्यक्ति स्पष्ट रूप से किसी दर्द और अनियंत्रित उद्वेग में अपनी तर्क बुद्धि खो बैठता है जबकि लालसा से अपराध करने वाला अपने आनंद के अधीन हो जाता है और ऐसा व्यवहार कहीं न कहीं कम पौरुष का प्रदर्शक है.

आगे भी एक मंजे हुए दर्शनशास्त्री की भांति, थेओफ्रस्तस कहता है कि जो अपराध आनंद के अधीन होकर किया गया हो उसकी भर्त्सना दर्द के अधीन किये गए अपराध से कहीं ज्यादा की जाती है.

सामान्यतः देखा जाये तो भी एक तरफ घायल, उकसावे के दर्द से गुस्साया हुआ व्यक्ति है तो दूसरी तरफ स्वयं ही गलत करने के आवेग का स्रोत्र है जो लालसा के वश में अपराध करता है.

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क्रमशः

Thursday, June 9, 2011

गुस्ताव - एक कहानी (भाग - ४)

रोशन के साथ स्टेडियम आना और उसके कई चक्कर लगा चुकने तक कोने की सीढ़ियों पे बैठ कर चिंतन करते रहना गुस्ताव का शौक है और शायद आदतन ढल चुकी मजबूरी भी.

अँधेरा घिरने पर दोनों विदा लेकर अपने अपने घरों की और बढ़ चले. घर की और बढ़ना गुस्ताव को पसंद नहीं. साइकिल और धीरे हो जाती है,  अपने ही आप.

धीरे धीरे साइकिल कान्टोंमेंट के अँधेरे से होकर आगे बढ़ रही थी कि तभी गुस्ताव का  मन  किया कि क्यूँ न सिगरेट पी कर देखी जाए.  इधर विचार आया तो साथ में उधर से डर भी. हिम्मत कर के सिगरेट खरीद ही ली और साथ में एक माचिस. अब पहली बार सिगरेट पीयेंगे जनाब. अगर दुकान पर जलाई और पहली बार में न जली तो लोग पहचान जायेंगे कि देखो पहली बार सिगरेट पी रहा है.  इसी लिए दूर जाकर अँधेरे में साइकिल रोकी और सिगरेट जलाने के लिए माचिस निकाल ली. ३-४ तीलियाँ बर्बाद करने के बाद ही सिगरेट ने सुलगना शुरू किया.  पहले ही कश में काफी कड़वाहट थी. "पूरा मुंह सडा दिया दुष्टा ने",वो बुदबुदाया.   दो कश और लगाये पर मज़े की अनुभूति के आभाव में  तिरस्कारपूर्वक उसे सड़क किनारे की नाली में पटका और धर जा पहुंचा. घर पहुँचते ही उस माचिस को बाकी की माचिसों में मिला दिया और पढने बैठ गया. 
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क्रमशः

SEI CMMI-SVC

Got to know about CMMI for Services, today. CMMI-SVC stands for Capability Maturity Model Integration for Services. Being a model, it focuses on "what" needs to be done for making the Organizational processes mature and capable. The "how" part is taken care of by the Organization using other methods to deliver on the "What".

Still exploring the need for it when ISO20K is around.

CMMI for Services - Documentation

Friday, June 3, 2011

Nutrition Strategy from here onwards

Mastery involves learning a new domain of words to distinguish things on another level. It has been a sort of mastery in nutrition for me. I have turned calorie concious now. So burning any excess calories by the end of the day and maintaining at 81-82 kgs is the current agenda.

Slowly reducing the body fat and increasing the lean mass and thus staying at the same weight is what I desire now.
How to do it...here is my plan:
1. Reduce fat by keeping a negative calorie diet on weekdays
2. Excess calorie diet on the weekends for at least 36 hours
3. Burning Excess calories everyday, even on the weekends when it is a high calorie diet - 10 KM walk on both days
4. Suplimenting through L-Glutamine to minimize catabolism
5. Increasing fat matabolism by increasing intake of MUFA/Good Fat e.g. Nuts, Olive Oil etc

It may take another month before it falls under 15% total body fat limits.