Monday, January 3, 2011

मेरा नए साल का आगाज़ कुछ ऐसे हुआ...

२१ दिसम्बर को ही तय कर लिया था कि ३१ तारीख को अपने गृह नगर चला जाऊँगा. नव्या का जन्म दिन भी ३१ दिसम्बर का ही है - नव्या नाम उसको इसी लिए दिया गया है; नए के आगमन का सूचक एक नाम. उसके लिए नाम तो "ज़ूनी" भी सोचा था हमने. कहीं से पता लगा था कि "ज़ूनी" एक फ़ारसी शब्द है जिसका मतलब है "पुरानी". अगर ३१ दिसम्बर को जन्म दिन पड़ता हो "ज़ूनी" नाम भी सार्थक सिद्ध किया जा सकता है. आजकल अनोखे नाम रखने का चलन है, नाम अगर "ज़ूनी" रखें तो हम भी इसी चलन के साथ बने रहेंगे; लेकिन फिर सोचा कि "ज़ूनी" नाम तो इसके स्कूल में इसके साथी बिगड़कर बोलेंगे - "जूनी" - अब बर्तन धोने वाला कपडे का टुकड़ा भी तो "जूनी" ही कहलाता है. सो हमारी बेटी का नाम "नव्या" रखा जाना तय हुआ.

हाँ तो बात थी कि नव्या का जन्म दिन मनेगा ३१ को जब सब लोग एक साथ आगरा में इकट्ठे होंगे. लेकिन एक ई-मेल ने मेरी योजना को बदलवा डाला. मैंने अभी हाल ही में एक टेलिकॉम कंपनी ज्वाइन की है. यहाँ ३१ दिसम्बर की रात को ऑफिस आना होता है. अरे भई, कमाई का दिन है! सभी लोग नए साल के आगमन पर आपस में  एक-दूसरे को शुभ-कामनाएं देंगे और फ़ोन कंपनियां इसी रात, अपनी दिन पर दिन गिर रही कमाई साधेंगी. टेलेफोन नेटवर्क जाम न हों इसलिए पहले से ही खास इन्तेजाम कर लिए जाते हैं कि अंत समय सब कुछ ठीक चले.

अब आगरा तो न जा पाया, पर नव्या को मैंने फ़ोन से ही बधाई दी. रात को ऑफिस जा पहुंचा. सब कुछ ठीक ठाक ही गुजरा. कोई बड़ी दिक्कत पेश नहीं आई और रात १ बजे तक सब अपना काम पूरा कर चुके थे. अब बारी थी खाने पीने की. ऑफिस की ओर से बड़े-बड़े पिज़्ज़ा मंगवाए गए थे. लोग तो लोग ही ठहरे, चाहे ऑफिस में हों या कहीं और - सब बिना बारी "डी डी ए" आवास लूटने की भांति खाने पर टूट पड़े. जिसे जो मिला उसने वो सब भर पेट खाया. दूसरे ने खाया या नहीं इसकी परवाह किसी ने नहीं की. मैं साक्षी हूँ - इंसान वाकई पशु को मात देता दिख रहा था. कुछ पिज़्ज़ा पाने से रह गए तो उन्होंने केक से बदला उतारा. मैं भी सही गलत की उधेड़-बुन में फंसा लुटता पिज़्ज़ा देख रहा था. बॉस का भाषण अभी ख़तम न हुआ था. खाने की सरकारी घोषणा अभी न हुयी थी. फिर भी लोग न माने. सही का साथ दूँ तो फ्री का महंगा पिज्जा हाथ से जाए...गलत का साथ देना गवारा नहीं. तभी किसी का हाथ पीठ पर पड़ा. साथी ही था. "चल खाएं नहीं तो ये मिलने वाला नहीं", वो बोला. बुद्ध का मध्य मार्ग शायद यही था. रोम में रहते हुए भी रोमन न बनना मेरी मूर्खता होगी. मैं भी आखिरी गाड़ी से जैसे निकल पड़ा. सवाल सिर्फ - "मेरी पशुता उसकी पशुता से कम है या ज्यादा का रह गया था". उस आप-धापी में एक तिकोना मेरे भी हाथ लग गया. "उद्यमेन ही सिध्यन्ति..." की सार्थकता का अहसास हो चला था मुझको. फिर तो मैं केक की लाइन में धक्का मारकर आगे पहुंचा और वहां से कई बार "आवंटन" पाया.  कई बार केक खा चुकने के बाद पेट और नीयत दोनों भर चुके थे. कुछ अपूर्णता जरूर थी - देर से पशुता-जागरण के कारण पिज़्ज़ा के सिर्फ एक ही प्रकार का रसास्वादन कर पाया. इसी उधेड़-बुन में लगा लगा मैं बाहर निकल आया.

मेरा २०११ शुरू हो चुका था - उस रात.
केक की बात न करो, हाँ पिज़्ज़ा कम खाया.