Friday, December 23, 2011

भागम-भाग!

शायद पिछले एक महीने पहले तक अपने आप को कहीं न कहीं किसी न किसी जीवन-क्षेत्र में आलसी मानता ही चला आ रहा था मैं। आलस न होता, समय से उचित कर्म को अंजाम पहुंचाता तो ये या फिर वो हासिल कर पाता - ऐसा विचार खाली मन में कभी न कभी आ ही कूदता था।

पिछले महीने घर फोन करने पर ही मालूम हुआ कि पिताजी को एक आँख से देख पाने मे तकलीफ हो रही है। मैंने तो बात हल्के में टाल दी। सोचा कि कोई हल्की फुलकी तकलीफ रही होगी, खुद दिखा लेंगे वरना महीने के अंत में तो जाना ही है तब जाकर डाक्टर को दिखा लाऊँगा। तभी एकाएक बड़े भाई के फोन ने स्थिति की गंभीरता को रेखांकित किया।

मैं यूं तो किसी भी कर्म को करते समय अपनी मनः स्थिति पर काफी निर्भर रहता हूँ लेकिन तब कोई मनः स्थिति आड़े नहीं आई या यूं कहें कि मनः स्थिति भी मुझे सहयोग कर रही थी। अगले दिन कि योजना बना ली। लौटने की टिकट देर रात ही बुक करा ली पर जाने की टिकिट न मिल पायी। जल्दी सुबह ही बस से गृह नगर आगरा को चल दिया। बस में नींद आ गयी और सब कुछ योजनानुसार ही चल रहा था कि तभी बस ने फ़रीदाबाद की सीमा में कहीं एक एक्सीडेंट कर दिया। पुलिस आ पहुंची और सड़क पर भीड़ ने बस को घेर लिया।

तुरंत बस बदलने को निर्णय लेकर मैंने वहाँ से गुजरती बस को हाथ हिलाया। शाम होने से पहले घर पहुंचकर उसी दिन वापिस लौटने के प्रण ने वहाँ हुयी दुर्घटना के बारे में ज्यादा सोचने का मौका न दिया। दूसरी बस के कंडक्टर ने भी मौके का फाइदा उठा पूरा किराया वसूला और मैं दुगना किराया पहुँचकर दोपहर के समय आगरा जा पहुंचा।

उसी दिन जब देर शाम को वापिस लौटने लगे तो ट्रेन लाते हो गयी और दुबारा नयी टिकिट खरीद कर, टीटी से अनुनय-विनय कर हम पंजाब मेल से वापिस दिल्ली आ पहुंचे।

सर गंगाराम अस्पताल मे रेटिना के एक विशेषज्ञ डाक्टर शशि नाथ झा बैठते हैं। अगले दिन ही उनसे भेंट का समय लेकर मैं पिताजी को उनसे दिखलाने जा पहुंचा। इनकी आँख का रेटिना अपनी जगह से हट गया था। अगले दिन ऑपरेशन का समय तय हुआ। पिताजी थोड़े घबराए थे लेकिन मैं न आलस मे था और न ही किसी घबराहट मे। अमूमन ऐसे मौकों पर घबराहट का घेरा मुझे घेर सकता है पर इस बार ऐसा न था।
मैं उनको लेकर तय समय पर अस्पताल गया जहां उनका ऑपरेशन होना था। ऑपरेशन बिना किसी खास समस्या के हो गया।  हालांकि TPA ने काफी परेशान किया पर फिर भी मैं सब कुछ निपटा कर घर पहुंचा।

अगले दिन मुझे दिल्ली हाफ़ मैराथन में भाग लेना था। हिम्मत करके, कई दिन की जमा थकान होने के बावजूद मैं नेहरू स्टेडियम गया जहां मैंने 6 किलोमीटर की दौड़ मे भाग लिया।

इस पूरी भागम-भाग में मुझे अपने सबल पक्ष के दर्शन हुये। न हारने वाला पक्ष। प्रयास करते रहने वाला पक्ष। विजेता! अपने आप अपर विजय! मानसिक थकानों और हारों पर विजय! वहाँ बाहिर तो सब मेरे हितेशी ही थे। मैं जीता।

हालांकि उसी दिन एक फोन भी खो दिया जिसने मुझे मेरे ही क्षीण होते, किन्तु अंतर विद्यमान आसक्ति का भी साक्षात्कार कराया।

तब से अब तक लगभक एक महिना हो चुका है। भागम-भाग बदस्तूर जारी है। ऑफिस में कभी CMMI के मीटिंग्स तो कभी कुछ कभी कुछ। मिनट भर भी खाली नहीं। घर आने पर कसरत, पाठ-पूजा, दोस्तों, घर के सदस्यों से बात-चीत। सोने तक फुर्सत नहीं है। हाँ घर भी तो खारीद रहा हूँ....उसके लिए कितनी भाग दौड़ की है उसका तो जिक्र भी न कर पाया।

पिताजी ठीक हैं। कभी मेरे तो कभी छोटे भाई के साथ अस्पताल जाते है। निरंतर बेहतर महसूस कर रहे है। सब कुछ ठीक रहे तो घर भी जनवरी अंत तक मिल जाएगा और हम NCR मे अपने ही घर के मालिक हो जाएँगे। कर्जे कि परवाह भी कर लेंगे...हर साल बढ़ते किराये से भी तो निजात पाएंगे।

कभी कभी पूछता हूँ खुद से ...आलसी? कौन मैं?

Saturday, December 10, 2011

किसी आदत में बदलाव लाने का रहस्यमयी नियम


यह पोस्ट लियो बाबाऊता के ब्लॉग की एक पोस्ट का हिन्दी अनुवाद है (मूल पोस्ट)
पिछले कुछ वर्षों में मैंने अपनी आदतों में बदलाव लाने के बारे में काफी कुछ सीखा है, इस सीख को हजारों लोगो के साथ मैंने बांटा भी है।

देखा जाये तो कुछ वे आदतें बदलना कहीं ज्यादा कठिन होता है जिनपर लोगों को खुद ही नियंत्रण नहीं होता। वे लोग उन आदतों को बदलना तो चाहते हैं पर उनके अनुसार उनमे उसे बदले जाने की पर्याप्त इच्छाशक्ति का अभाव होता है ( हालांकि मेरा मानना है कि इच्छाशक्ति जैसी किसी चीज़ का अस्तित्व नहीं होता है)।

मेरे लिए जो चीज़ें कभी मेरे अपने नियंत्रण के बाहर लगती थीं वे हैं : धूम्रपान, बाहर का जंक-फूड खाना, सामाजिक उत्सवों के दौरान ज्यादा खा लेना, काम करने में टालमटोल करना, गुस्सा करना, धैर्य का अभाव और निराशाजनक चिंतन करना। 
एक छोटा सा रहस्य जानने के बाद ये बदलाव आसान हो गया:

अगर आप अपनी आदत के प्रति सचेत हैं तो आप उसे बदल पाएंगे।

अचंभित होकर इस लेख को आगे पढ़ना न रोकें। यह लगता तो बड़ा ही साधारण सा रहस्य है और इसका अनुमान या जानकारी भी, हो सकता है, कुछ पाठकों को रही हो।  चलिये, इस विषय में थोड़ा और गहराई से बातें करते हैं।

जब भी हमें कुछ ऐसा खाने की तीव्र इच्छा उठती है जो हम जानते हैं कि हमारे खाये जाने के लिए उचित नहीं है फिर भी हम अक्सर उसे खा ही लेते हैं। पर क्या ये सब इतना आसान है? यह सच है कि उस समय हमारा मस्तिष्क तर्क द्वारा यह तय करने में लगा होता है कि हमें वो केक क्यूँ खा लेना चाहिए, उसे न खाना इतना कठिन क्यों है, क्यों उसे खाया जाना इतना बुरा तो नहीं है। ये मस्तिष्क जानना चाहता है कि हम क्यों अपने लिए पीड़ा पैदा कर रहे हैं, क्यूँ नहीं जीने देते अपने आप को और क्या हमें अपने आप को इस दावत देने का हक़ नहीं है?

हमें पता भी नहीं चलता और हमारे ही भीतर समान्यतः इतना कुछ चलता रहता है। बड़ी ही शांति से हमारी चेतना के पार्श्व में कहीं यह सब होता तो है। और अविश्वासनीय रूप से शक्तिशाली प्रक्रम है ये। यदि हमे इस सब की उपस्थिती का भान न हो तो ये और भी ज्यादा शक्तिशाली हो जाता है।

ये हमें हर बार हराता जाता है सिर्फ खाने से संबन्धित आदतों में ही नहीं वरन उस सब में जो हम करना चाहते हैं पर छोड़ बैठते हैं, और उसी की ओर बढ़ते जाते हैं।

ऐसी शक्तिशाली प्रवर्ति को कैसे हराएँ जो हमारा अपना ही मस्तिष्क है?

सचेत हो जाना इसकी कुंजी है। एक शुरुआत है।

  1. सचेत रहने से इसकी शुरुआत होती है : शुरुआत करें अपने साथ हो रही इन घटनाओं के साक्षी बनकर। खुद के स्वयं से होने वाले वार्तालापों को सुनना शुरू करें, देखते जाएँ कि आपका खुद का दिमाग क्या गुल खिलाता है। ध्यान से देखते रहें। ये हर समय हो रहा होता है। अगर आप ध्यान या मेडिटेशन करते हैं तो ऐसा करना आसान होगा। मैं जब दौड़ने निकलता हूँ तो iPod नहीं लेकर निकलता, शांति से प्रकृति का आनंद लेता जाता हूँ और दिमाग के खेल का साक्षी बना रहता हूँ।
  2. इस बारे में कुछ न करें:आपका मस्तिष्क आपसे विनती करेगा कि आप वो केक खा लें (सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा ही तो बोला है!) या सिर्फ एक सिगरेट पीने कि गुजारिश या दौड़ना बंद करने कि विनती और या फिर किसी काम को टालने का आगृह। अपने मस्तिष्क की मांगें सुने जरूर किन्तु इन पर इससे आगे कुछ भी न करें। सिर्फ शांति से इन मांगों को सुनते ही चले जाएँ।  
  3. जाने दें : सिगरेट पीने, कुछ खाने, टाल-मटोल या दौड़ना बंद करना ऐसी किसी भी तीव्र इच्छा को जाने दें। तात्कालिक ही है ये। सिर्फ एक या दो मिनट के लिए ही। भरपूर सांस लें और इन सब इच्छाओं को जाने दें।
  4. मस्तिष्क के दिये जा रहे तर्कों को हराएँ:अपने दिमाग द्वारा दिये जा रहे तर्कों को चुनौती दें। जब ये कहे कि एक छोटा हिस्सा खाने मे नुकसान नहीं है! तो इसे याद दिला दें कि ऐसे पिछले कितने ही मौकों पर इसने ऐसा ही कहा था और इसका कहा मानकर आज आप मोटे हो चुके हैं। जब ये कहे कि दौड़ने के इस दर्द से अपने आप को क्यूँ गुज़ारते हो?”, इसे बताएं कि अस्वस्थ रहना कहीं ज्यादा दर्दनाक होगा साथ ही बताएं कि केक न खाना बलिदान नहीं बल्कि एक अच्छी स्वास्थ्यकारी आदत है।

बहुत से मौकों पर हमारी इच्छाशक्ति हमें दगा दे जाती है। ऐसे ही मौकों पर हमारा अपने मस्तिष्क के बारे मे सचेत रहना जरूरी हो जाता है।

यदि सचेत रहें तो ऐच्छिक परिवर्तन लाया जा सकता है। ये एक छोटा सा रहस्य है जिससे जीवन में मनचाहा परिवर्तन लाया जा सकता है। मेरे जीवन में मैं इसके चलते मनचाहे परिवर्तन कर पाया। मैं ध्यान से अपने मस्तिष्क की प्रवृति देखता हूँ, इंतज़ार करता हूँ और अंततः इसे हरा डालता हूँ। आप भी ऐसा कर सकते हैं।

Thursday, October 13, 2011

नव्या, डोरेमोन और मैं!




जब रिमोट नहीं मिलता और तुम डोरेमोन देख रही होती हो,
मैं समझ जाता हूँ तुम्हारी ये हरकत;
कभी तकिये के नीचे तो कभी उस सामने रखे सोफ़े की गद्दी के पीछे जैसे खुद ही जा छिपा था वो।

मुझे याद है, अभी कुछ ही दिन पहले की तो बात है,
अपने अधबने घर की सीढ़ियों पर रखा तसला;
तुमको वो तसला एक डोरा-केक नज़र आया था और मेरे लिए एक रास्ता रोकती अड़चन।

सीख रहा हूँ धीरे-धीरे तुमसे, नज़रिये बदलना,
तुमने ही कहा था कि साइकिलें पार्क में चलती हैं सड़कों पे नहीं;
चोंक कर इस सच्चाई पे हामी भरी थी मैंने।

वैसे तो लगता है कि फासला ज्यादा नहीं मेरी पसंद और नापसंद में,
लेकिन तुमसे लड़कर मूवी चैनल बदल देने में अपना ही मज़ा है;
हाँ तुम भी सीख चुकी हो रोने का वो ढंग, मैं भी अंततः डोरेमोन ही देख रहा होता हूँ।

Sunday, September 18, 2011

मिलिंदपनहो- मिलिंद - नागसेना संवाद के कुछ और अंश

 “आपको कितनी वर्षा ऋतुओं का अनुभव है, नागसेना?”
(उस समय की प्रथा के अनुसार अपनी दीक्षा ग्रहण के बाद से कुल वर्षा ऋतुओं की संख्या किसी भिक्षु का अनुभव दर्शाती थी)

राजन मुझको सात वर्षा ऋतुओं का अनुभव है
ये कैसे कहेंगे आप कि ये आपके सात हैं; क्या आप स्वयं ये सात हैं अथवा सात कोई संख्या है?”
नागसेना ने कहा,”आपकी छाया मुझे सामने ज़मीन पर दीख रही है। आप राजा हैं या वह छाया राजा है?”
राजा तो मैं ही हूँ, नागसेना, किन्तु छाया का अस्तित्व भी मुझसे ही है।
हे राजन, ठीक उसी प्रकार वर्षों की संख्या सात है, मैं सात नहीं हूँ, किन्तु मुझसे से यह सात का अस्तित्व है और यह उसी प्रकार मेरा है जैसे वह छाया आपकी।
वाह नागसेना, बहुत खूब! यह भी एक कठिन प्रश्न था

राजा मिलिंद बोला,” आदरणीय, क्या हम कुछ और भी विचार विमर्श करें?”
यदि राजन एक विद्वान कि भांति विचार विमर्श करेंगे तो मेरी हाँ है किन्तु यदि एक राजा कि भांति ऐसा करना चाहेंगे तो मेरा उत्तर नकारात्मक है।
विद्वान किस प्रकार विचार विमर्श करते हैं?”
विद्वानों के विचार विमर्श में ज्ञान का आदान प्रदान होता है, बातें पता चलती हैं; किसी एक का ज्ञान अगर कम दिखे भी और यदि उसे ऐसा बताया भी जाए तो भी वह क्रोधित नहीं होता।
और राजा किस प्रकार विचार विमर्श करते हैं?”
जब कोई राजा विचार विमर्श करता है और अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत्त करता है तो अपने से असहमत लोगों को दंड देने को आतुर रहता है।
तब ठीक है, मैं एक विद्वान की भांति ही आपसे विचार विमर्श करूंगा। आदरणीय, आप निर्भय होकर बोलें।
ऐसा ही होगा राजन।
नागसेना, मेरा एक प्रश्न है”, राजा ने कहा।
कृपया पूछें।
मैंने पूछ तो लिया, आदरणीय।
तब मैं भी उसका उत्तर दे चुका हूँ।
क्या उत्तर दिया आपने?”
जो आपने पूछा।

नागसेना की विद्वता से संतुष होकर मिलिंद ने अपने मंत्री देवमंतीय को नागसेना और उनके साथी भिक्षुओं के साथ अपने महल में आमंत्रित करने को कहा और नागसेना”, नागसेना बड़बड़ाता हुआ वहाँ से चला गया।

देवमंतीय, अनंतकाया और मांकुरा तीनों नागसेना को लेने उनकी कुटिया जा पहुंचे। चलते समय अनंतकाया ने नागसेना से प्रश्न किया आदरणीय, जब मैं नागसेना कहता हूँ तो तो वह नागसेना क्या है?”
तुम क्या सोचते हो कि नागसेना क्या है?”
आत्मा, अन्दर की श्वास जो बाहर आती और अन्दर जाती है।
किन्तु वह श्वास बाहर जाकर आए ही न तो क्या मनुष्य जीवित रह पाएगा?”
कदापि नहीं
जब वे तुरही बजाने वाले जब पूरे ज़ोर के साथ श्वास बाहर निकाल देते हैं तो क्या वही श्वास वापिस लौटती है?”
नहीं, आदरणीय
तब वे क्यूँ नहीं मरते।
मैं आपसे बहस न कर पाऊँगा, कृपयस मुझे इसका रहस्य बताएं।
श्वास में कोई आत्मा नहीं होती। श्वास का भीतर या बाहर आना-जाना इस शारीरिक ढांचे की अपनी खूबी है।
उसके बाद नागसेना ने अनंतकाया के साथ अभिधर्म पर विचार विमर्श किया और वह भिक्षु की व्याख्या से संतुष्ट हो गया।
भिक्षुओं के महल में आकर खाना खा लेने के बाद राजा ने एक कम ऊंचाई के आसन पर बैठकर पूछा किस विषय पर वार्तालाप करना चाहेंगे आप?”
धर्म पर।
इस पर राजा ने पूछा, आदरणीय, आपका अपने जीवन में यहाँ से आगे उद्देश्य क्या है और आपने अपना अंतिम लक्ष्य क्या तय किया है?”

दुख: का अंत हो और कोई नया दुख: न उत्पन्न हो ऐसा हमारा उद्देश्य है और इसकी पकड़ पूर्णतः समाप्त हो जाये ऐसा हमारा लक्ष्य है।
क्या इसी प्रकार के भले कारणों से ही ये सब लोग आपके दल में सम्मिलित होते हैं?”
नहीं, कुछ राजाओं के दंड से बचकर भागे हुये होते हैं तो कुछ लुटेरों से सुरक्शित रहने के लिए, कुछ कर्जे से तो कुछ अपनी आजीविका चलाने के लिए। लेकिन जो भी सही कारणों से आते हैं वे अपने दुखों से पूरी तरह मुक्ति पाने आते हैं।
राजा ने कहा,” क्या कोई ऐसा भी होता है जो मृत्यु के बाद पुनर्जन्म न लेता हो?”
हाँ, जिसमे कोई किसी प्रकार की कोई कमी नहीं होती वह मृत्यु के बाद पुनर्जन्म नहीं लेता; जिसमे कोई कमी होती है वह मृत्यु के बाद पुनर्जन्म लेता है।
क्या आपका पुनर्जन्म होगा?”
यदि मैं किसी आसक्ति के साथ मरा, तो हाँ; अन्यथा नहीं।
क्या कोई सोच-विचार करने की क्षमता के चलते पुनर्जन्म से बच सकता है?
 पुनर्जन्म से बचने के पीछे सोच-विचार, बुद्धिमत्ता, आत्म-विश्वास, गुण, सजगता, ऊर्जा और आत्म-केंद्रण आवश्यक हैं।
क्या सोच-विचार और बुद्धिमत्ता एक ही बात है?”
नहीं। जैसे पशुओं में सोच-विचार का गुण होता है किन्तु बुद्धिमत्ता नहीं।
तो फिर सोच-विचार और बुद्धिमत्ता में क्या भेद है?”
जहां पकड़ना सोच-विचार की प्रकृति है वहीं अलग करना बुद्धिमत्ता की।
कोई उदाहरण दीजिये।
जौ की फसल उगाने वाले जौ कैसे इकट्ठा करते हैं?”
वे उल्टे हाथ से जौ का एक छोटा गट्ठर पकड़ते हैं और दायें हाथ में एक हंसिया लेकर जौ काटकर अलग करते जाते हैं।
हे राजन, इसी प्रकार एकांतप्रिय संत जन सोच-विचार द्वारा मन को पकड़ते हैं और बुद्धिमत्ता द्वारा उसकी कमियाँ काटकर अलग कर देते हैं।
नागसेना, गुण की क्या प्रकृति है?”
राजन, गुण की प्रकृति सहारा देना होती है; यह सभी अच्छाइयों का आधार है: पांचों नियन्त्रक संकायों (आत्म-विश्वास, ऊर्जा, सजगता, आत्म-केंद्रण और बुद्धिमत्ता), पांचों नैतिक शक्तियों ((आत्म-विश्वास, ऊर्जा, सजगता, आत्म-केंद्रण और बुद्धिमत्ता), ज्ञानोदय (Enlightenment) के सातों घटकों (सजगता, खोजशीलता, ऊर्जा, आनंद, प्रशांति, आत्म-केंद्रण और आत्म नियंत्रण), सद मार्ग के आठों भागों (सम्यक दृष्टि, सम्यक विचार, सम्यक वाणी, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक प्रयास, सम्यक सजगता और सम्यक आत्म केंद्रण), सजगता के चारों आधारों (शरीर, भावना, विचार और मानसिक विषय-वस्तुओं की सजगता), चारों सम्यक प्रयासों (अपूर्ण स्थितियों से बचाव और निवारण साथ ही पूर्ण स्थितियों का विकास एवं पालन), सफलता के चारों आधारों (उत्सुकता, ऊर्जा, हठीलापन एवं बुद्धिमत्ता), चारों तल्लीनतायें (एक-सूत्रियता की चार स्थितियाँ), आठों विमुक्तियाँ (गहन आत्म केंद्रण द्वारा मन की विमुक्ति की आठ स्थितियाँ), आत्म केंद्रण के चारों प्रकार (प्रेम, करुणा, आनंद और आत्म नियंत्रण पर ध्यान लगाना), आठों उपलब्धियां ( चार सगुण एक-सूत्रता, चार निर्गुण एक-सूत्रता)। इन सभी का गुण ही सहारा देता है। जो भी इन सभी अच्छाइयों का आधार गुण को बनाता है तो वे अच्छाइयाँ कम नहीं होतीं।

इसका उदाहरण दीजिये।
राजन, जैसे सभी पशु पक्षियों का जीवन धरती द्वारा पोषित होता है उसी प्रकार एकांतप्रिय संत जन गुण के सहारे बाकी अच्छाइयों को विकसित करते हैं।
गौतम बुद्ध ने कहा था कि :
जब कोई गुणवान व्यक्ति आत्म केंद्रण और समझ का विकास करता है तो उनकी मदद से वह जुझारू और बुद्धिमान भिक्षु हर मुश्किल का समाधान ढूंढ लेता है।

अर्हंत की महारत

अर्हंत की महारत 
(यह संवाद नागसेना और राजा मिलिन्द के मध्य हुये संवादों के संकलन मिलिंदपंहो से लिया गया है। )

राजा मिलिन्द ने नागसेना से पूछा, एक अर्हंत को शारीरिक अनुभूतियाँ ही होती हैं,  मानसिक अनुभूतियाँ नहीं। ऐसा कैसे संभव है। तो क्या एक अर्हंत अपने शरीर की माँगों  के आगे असहाय है। क्या उसको अपने शरीर पर कोई नियंत्रण नहीं? एक चिड़िया तक अपने घोंसले की शासिका होती है।

नागसेना ने उत्तर दिया, राजन, शरीर में ये दस प्रकार की प्राकृतिक गतिविधियां होती हैं जिन पर किसी अर्हंत का वश नहीं होता : शीत, ताप, भूख, प्यास, मल त्याग, मूत्र त्याग, थकान, वृद्धावस्था, रोग व मृत्यु।
जिस प्रकार पृथ्वी पर वास करने वाले सभी जीव इस पर निर्भर तो हैं किन्तु इसकी प्राकृतिक गतिविधियों के नियंत्रक नहीं हैं, ठीक इसी प्रकार अर्हंत अपने शरीर पर निर्भर तो हैं पर उनका अपने शरीर की प्राकृतिक गतिविधियों पर नियंत्रण नहीं है।

फिर एक सामान्य जन को शारीरिक और मानसिक, दोनों ही प्रकार की अनुभूतियाँ क्यों होती हैं?” मिलिन्द ने पूछा।

उनके मानसिक प्रशिक्षण के अभाव के कारण।
जिस प्रकार कमजोर रस्सी से बंधा एक भूखा बैल उसे तोड़कर आसानी से मुक्त हो जाता है, ठीक उसी प्रकार एक सामान्य जन का मन वेदना से उद्वेलित हो उठता है और मानसिक दर्द की अनुभूति करता है।
वहीं एक अर्हंत का मन भली-भांति प्रशिक्षित होता है। जब उसका शरीर दर्द की अनुभूति करता है, तब वह अपने मन को अनित्य (Impermanence) पर केन्द्रित कर लेता है। ऐसा करने से उसका मन उद्वेलित नहीं होता और उसे कोई मानसिक वेदना नहीं होती; ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार से तेज़ हवाओं के आगे एक विशाल वृक्ष की शाखाएँ भले ही झूल उठती हों परंतु उसका तना विचलित नहीं होता।

मिलिंदपनहो- मिलिंद - नागसेना संवाद

मिलिंदपनहो एक प्राचीन बौद्ध ग्रंथ है जो मूलतः पाली भाषा में लिखा गया था। इसमे राजा मिलिंद और भिक्षु नागसेना के मध्य हुये संवाद का विवरण दर्ज़ है।

मिलिंद बैक्ट्रिया (वर्तमान अफ़ग़ानिस्तान) का यवन (यूनानी) शासक था जिसने लगभग 155 से 130 ईसा पूर्व तक बैक्ट्रिया पर शासन किया। नागसेना एक बौद्ध भिक्षु था। दोनों के मध्य घटित यह संवाद गौतम बुद्ध के परिनिर्वाण के लगभग चार सौ साल बाद का है।

इस संवाद के बारे में:

कहा जाता है कि अनुभवी और न्यायप्रिय राजा मिलिंद तर्कशास्त्र में प्रवीण था। अपने धर्म संबंधी संदेहों को दूर करने हेतु उसने बहुत से प्रसिद्ध धार्मिक अध्यापकों से विचार विमर्श किया किन्तु उनके उत्तरों से वह संतुष्ट न हुआ।
अपने मंत्री देवमंतीय के कहने पर राजा मिलिंद ने नागसेना से मशवरा करना तय किया और अपने साथ पाँच सौ बैक्टीरियायी यवनों का दल लेकर अपने रथ पर सवार हो नागसेना से मिलने उसकी कुटिया की ओर चल पड़ा।

मिलिंद - नागसेना संवाद:

राजा मिलिंद भिक्षु नागसेना से मिलने आगे बढ़ा और उनका अभिवादन किया, तत्पश्चात वह आगे बढ़कर पास ही एक आसन पर बैठ गया। उसके बाद मिलिंद ने नागसेना से प्रश्न किया
आदरणीय भिक्षु आपका अस्तित्व कैसे जाना जाता है और आपका नाम क्या है?”
राजन, मुझे नागसेना नाम से जाना जाता है किन्तु यह मात्र एक पदवी जैसा ही है, किसी व्यक्ति विशेष से इसका कोई वास्ता नहीं।
तब मिलिन्द ने वहाँ उपस्थित सभी बैक्ट्रिया के यवनों और बौद्ध भिक्षुओं के सम्मुख यह बात रखी भिक्षु नागसेना कहते हैं कि उनके नाम किसी व्यक्ति को इंगित नहीं करता, क्या आप सभी इनकी बात से सहमत हैं?” उसके बाद नागसेना की ओर मुड़कर उसने कहा आदरणीय नागसेना, अगर यह सत्य है तो फिर आप उसे क्या कहेंगे जो आपको चोगा (पोशाक), भोजन या शरण देता है। उसे क्या कहेंगे जो सत्य की राह पर चलता है? जो व्यक्ति हत्या करता है, चोरी करता है, व्यभिचार करता है, झूठ बोलता है या मद्यपान करता है? अगर आपका कथन सत्य है तो फिर सही गलत का भेद नहीं दिखता और न ही अच्छे और बुरे कर्म का कोई कर्ता होगा और न ही कर्म का कोई फल। हे महाशय, यदि कोई आपको मार भी डाले तो भी कोई कोई हत्यारा कहाँ हुआ, अगर आपके साथी भिक्षुओं की भी बात करें तो आपके यहाँ न कोई गुरु होगा और न ही शिष्य। आप कहते हैं कि आपको नागसेना कहा जाता है; तो ये नागसेना वास्तव में है कौन? क्या आपके बाल नागसेना हैं ?”
राजन, मैंने ऐसा नहीं कहा”, नागसेना ने उत्तर दिया।
या नाखून, दाँत, त्वचा या कोई अन्य अंग?”
बिलकुल नहीं।
शरीर, भावना, दृष्टिकोण, समझ, चेतना में से कोई एक अथवा इन सभी का योग?” या इन सभी के परे कुछ और है जो नागसेना है?”
इनमे से कुछ भी नहीं”, नागसेना ने उत्तर दिया।
तब तो जैसे मैंने पूछा, कुछ भी नागसेना नहीं। नागसेना मात्र एक खोखला शब्द है। फिर ये कौन है जो हमारे सम्मुख कौन खड़ा है?
आदरणीय, आप असत्य कहते हैं।
राजन, आप राज परिवार से हैं और आप अवश्य ही सभी साधनों से सम्पन्न रहे होंगे। आप यहाँ कैसे पधारे हैं, पैदल या रथ के द्वारा?”
रथ के द्वारा
राजन रथ की व्याख्या करें क्या वह धुरी है? या फिर पहिये, अथवा छकड़ा अथवा लगाम अथवा वो जुआ (रथ का वो हिस्सा जो पशु की गर्दन पर रखा जाता है) ही रथ है। क्या इन सबका योग रथ है या इन सब से इतर कुछ और?”
इनमें से कुछ भी तो नहीं।

तब यह रथ एक खोखला शब्द ही है। आपने झूठ ही तो बोला जब आपने कहा कि आप रथ पर सवार होकर यहाँ आए हैं। आप राजा हैं, आपको किस डर से असत्य बोलना पड़ गया।

तब नागसेना ने वहाँ उपस्थित सभी बैक्ट्रिया के यवनों और बौद्ध भिक्षुओं के सम्मुख यह बात रखी राजा मिलिंद कहते हैं कि वे यहाँ रथ पर सवार होकर आए हैं परंतु यह पूछे जाने पर कि वह रथ वास्तव में है क्या, वे उसे बतलाने में असमर्थ हैं। क्या आप सभी इनकी बात से सहमत हैं?”
तब वहाँ उपस्थित पाँच सौ बैक्ट्रिया के यवनों ने चिल्लाकर नागसेना की बात का समर्थन किया और राजा से कहा की अगर उनके पास कोई तर्क बचा है तो वे उसे बताएं।

आदरणीय भिक्षु, मैंने सत्य ही बोला है। चूंकि बताई गई सभी वस्तुएं इसका हिस्सा हैं अतः इसे रथ शब्द के अंतर्गत ही जाना जाएगा।

आपने सही कहा राजन, आप इसका तात्पर्य जान गए हैं। बत्तीस प्रकार के विभिन्न जैविक भागों से बने शरीर और अपने अस्तित्व के पाँच घटकों (सदा परिवर्तनशील शरीर, भावना, दृष्टिकोण, संस्कार और चेतना) के चलते ही मैं नागसेना शब्द के अंतर्गत आता हूँ।

रथ के संदर्भ में, विभिन्न हिस्सों का अपना अलग अलग अस्तित्व है और वे रथ शब्द से पुकारे जाते हैं इसी प्रकार मनुष्य के संदर्भ में, विभिन्न घटकों की अपनी मौजूदगी के चलते हमारा अपना अस्तित्व होता है। गौतम बुद्ध की उपस्थिती में बहिन वाज़िरा ने भी ऐसा ही कहा था।

अति सुंदर, नागसेना। आपने बहुत सरलता से मेरे कठिन प्रश्न को हल कर दिया। बुद्ध भी आज अगर स्वयं यहाँ होते तो आपके उत्तर का अनुमोदन करते।

 (ऊपर प्रदर्शित तस्वीर इस लिंक से ली गयी है - http://25.pariyatti.org/2011/04/lists-of-25.html)

Tuesday, August 16, 2011

ज्ञानोदय - २

कभी कभी मन खिन्न हो तो जाता है,
मेरे अपनों के विरुद्ध ही मुझे धकेलना उसको आता है;
सारी दुनिया बुरी सी तब लगे।

तभी कहीं ये समझ में कौंध जाता है,
सब कुछ तो वैसा ही है जैसा वो वहाँ, मुझसे बाहर है;
वहाँ सामने - मेरा और उसका वज़ूद, साथ कदमताल करते से।

सबकी अपनी पीड़ा होती, सबका अपना सच होता है,
हालांकि सब शुभचिंतक हैं, घटनाओं के अनुगामी हैं;
जो ज्ञाता हो वो ही समझे, और फिर कुछ अच्छा सोचे।

अपना दृष्टिकोण बदलना मेरे लिए कहीं आसान है,
तुरंत जैसे किसी नयी रोशनी में सब नज़र आए;
रोचक सी दुनिया, प्यारे से अपने, मैं भी दिलखुश।  

ज्ञानोदय - १

मन जो कभी खिन्न हो जाये, अपनों के भी विरुद्ध चले,
सारा जग मतलब खोता सा, स्व: अस्तित्व विकल होवे।  

सारे सोच विचार व चिंतन दुर्योधन को मात करें,
रिश्तों का मीठापन उड़कर शाखा पर विश्राम करे।

तभी समझ की बयार कहीं से हितकारी प्रहार करे,
मेरा-उसका वज़ूद सामने कदम ताल करते पावें।

सबकी अपनी पीड़ा होती, सबका अपना सच होता है,
हालांकि सब शुभचिंतक हैं, घटनाओं के अनुगामी हैं।

जो ज्ञाता हो वो ही समझे, और फिर कुछ अच्छा सोचे,
घटनाओं की कमी नहीं है, जिनमें अच्छी यादें थीं।

दृष्टिकोण बदलकर देखो, न कि प्रमाण बुरे का खोजो,
नयी रोशनी तुरंत प्रकट हो, रोचक सब कुछ पुनः करे।

रिश्ते तो रिश्ते होते हैं, मिठास हमें लानी होती है,
तुम दिलखुश तो ये है आसाँ, वरन अपेक्षा निर्भरता है।

Saturday, July 23, 2011

चंडीगढ़ और शिमला की सैर (यात्रा वृतांत - ४)

शिमला स्टेशन के प्लेटफोर्म पर ही यात्रियों के बैठने हेतु एक वेटिंग रूम है जिसकी दीवार पर पास के दर्शनीय स्थल और उनकी स्टेशन से दूरी लिखी है. हमने स्टेशन से बाहर निकलते समय कुछ देर वहां रूककर इस सूची से  हमारे द्वारा अगले दिन की दोपहर तक देखे जा सकने वाले स्थलों का अनुमान लगा लिया. मेरे हाथ पर बंधी घडी दोपहर का १ बजा रही थी किन्तु स्टेशन की धुंध देखकर समय का अंदाजा लगाना संभव न था. हमें अगले दिन शाम तक कालका वापिस लौटना था इसीलिए समय की उपलब्धता के आधार पर हमने पहले होटल पहुँचने और विश्राम करने के बाद इन ५ स्थलों को घुमने का निश्चय किया - Indian Institute of Advanced Study (IIAS), मॉल रोड़, रिज़,
लक्कड़ बाज़ार  और कुफरी.

हम स्टेशन से पास ही राम बाज़ार में रुके. कमरे की मुख्य खिड़की से शिमला की घाटियाँ और थमे थमे से बदल नज़र आते थे.

थोड़ी देर में हम होटल से बाहर निकलकर Indian Institute of Advanced Study (IIAS) देखने चल पड़े. पैसे की बचत करने के लिए हमने कुछ सुविधाओं का त्याग करने का निश्चय किया और राम बाज़ार के नीचे स्थित बस स्टैंड से बालूगंज की बस पकड़ ली. बालूगंज नाम सुनकर में थोड़ा चकित हुआ क्योंकि इसी नाम का एक मोहल्ला मेरे गृह नगर आगरा में भी है. शिमला का बालूगंज दरअसल Boileauganj है जो बिगड़कर बालूगंज कहलाया जाने लगा होगा. बालूगंज से पैदल ऊपर पहाड़ी पर जाया जा सकता है जहाँ यह इंस्टिट्यूट स्थित है. चढ़ते चढ़ते थकान हो चली लेकिन इंस्टिट्यूट का कहीं कोई नामोनिशान न था. हमें भी संदेह हुआ कि कहीं गलत दिशा में तो नहीं आ गए; कहीं अभी तक की सारी मेहनत बेकार न चली जाये तो हमने वहां से गुजरते एक सज्जन से रास्ता पूछा और पता चला कि अभी और चढ़ाई चढ़नी है. अंततः कभी चलते, कभी रुकते हम वहां पहुंचे  जहाँ से इंस्टिट्यूट दिखाई पड़ रहा था - ब्रिटिश राज की निश्चित ही एक भव्य ईमारत.
यहाँ २० रूपये प्रति व्यक्ति टिकेट है और कैमरा के लिए १० रूपये लगते हैं;  हाँ,  बच्चों का कोई टिकेट नहीं. अच्छी बात यह भी है कि टिकेट लेने के बाद सभी लोग एक दल में एकत्रित हो जाते हैं जिसे एक गाइड भवन का टूर कराता है. यह भवन स्वाधीनता के पूर्व भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी शिमला में भारत के वायसराय का निवास स्थान रहा था और यह सन १८८८ में बनकर तैयार हुआ था. ब्रिटिश वास्तुशैली की यह इमारत, उस युग की उत्तर भारत में बनी कुछ सर्वश्रेष्ठ इमारतों में से है. आजादी के बाद इसे राष्ट्रपति निवास कहा गया. वर्ष १९६४ में देश के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री सर्वपल्ली राधाकृष्णन के प्रयासों से एस भवन का नामकरण Indian Institute of Advanced Study (IIAS) हुआ.

वापिस लौटकर हम राम बाज़ार आये और वहां से सीढियां चढ़कर मॉल रोड आ पहुंचे.

क्रमशः

Thursday, July 21, 2011

मेरा विकिपीडिया के लिए हिंदी अनुवादित पहला लेख

अपना पहला हिंदी विकिपीडिया पेज मैंने आज लिखा है. कुछ हासिल कर लिया हो जैसे. पूरा पूरा अनुभव कर पा रहा हूँ इसका और साथ ही इसे गहराने का प्रयास कर रहा हूँ मैं जिससे इस अनुभव की पुनरावृति मानसिक रूप से ही बिना साक्षात् प्रमाण के भी कर सकूँ.
  
लेख यहाँ पढ़ें! 

Wednesday, July 20, 2011

चंडीगढ़ और शिमला की सैर (यात्रा वृतांत - ३)

ट्रेन सुबह ६:३० पर शिमला के लिए रवाना हुई. हमारी सीट शिमला की ओर बढ़ती ट्रेन में दायीं ओर थी; इस यात्रा में दायीं ओर बैठना इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि हमें बताया गया था की दायीं ओर ही ज्यादा दर्शनीय घाटियाँ दिखलाई पड़ती हैं.

परवानू से पहाड़ की चढ़ाई शुरू हो जाती है. चित्ररंजन का बना वो डीज़ल इंजन जैसे पूरी शक्ति लगा कर ट्रेन को खींच रहा था. किसी हाँफते धावक की श्वास की तरह धुएं का गुबार उगलता इंजन कालका के ट्रैक के किनारों पर दोनों ओर बने घरों के कतारों के बीच से होता उस चढ़ाई पर ट्रेन को ले चला. जैसे ही ट्रेन किसी चंद्रकार पथ पर घूमती, ट्रेन भी चंद्रकार हो लेती. इंजन से लेकर आखिरी डब्बे तक एक साथ दिखाई पड़ते. हमें भी नव्या की भांति यह अनुभव नया ही लगता.

अनेकों छोटी बड़ी सुरंगों ओर पुलों से गुजरती ट्रेन कभी ऐसे ही कहीं भी रुक जाती तो कभी रस्ते में छोटे से स्टेशन पर. जहाँ भी वो रूकती लगभग सभी लोग ट्रेन से निकलकर नीचे आ जाते ओर सबके कैमरे दनादन तस्वीरें खींचने में जुट जाते. मुझे कभी कभी यह विचार भी आता है कि डिजिटल कैमरा का युग आने के बाद हम सब लोग ज्यादा ही तस्वीरें खींचते हैं और तस्वीरों के जरिये बाद में यादों में लौटना उसी समय एक और बेहतर अनुभव के निर्माण की तुलना में कहीं ज्यादा ही महत्वपूर्ण हो जाता है.

रास्ते में जब जब ट्रेन सुरंग से निकलती, ट्रेन के सभी लोग बहुत शोर करते. एक बार तो किसी ने शायद शरारत में ऐसी चीख निकाली कि लगा जैसे किसी के साथ कोई दुर्घटना घटी हो.

कहीं दूर नीचे लटकते चलते बादल तो कहीं आकाश छूते पेड़ों की चोटियों पर टंगे से, मंथर गति की बारिश की फुहारें, कहीं कहीं पुलों के नीचे से तेज़ आवाजें करता बहता पानी - सब कुछ नया ही तो था. एकाएक ऐसी सुरंग आई की ख़तम होने का नामे ही न लेती थी, आखिरकार जब ख़त्म हुयी तो हम बड़ोग स्टेशन पर आ पहुंचे.

बड़ोग समुद्र तल से १५६० मीटर की ऊंचाई पर है. बड़ोग यूँ तो एक सुन्दर जगह है लेकिन इसके नाम के साथ एक दुखद घटना भी जुडी है. कहते हैं कि एक अँगरेज़ इंजिनियर जिनका उपनाम बड़ोग था, उन पर इस जगह पर बनने वाली ट्रेन मार्ग की सुरंग बनाने का जिम्मा आया. वर्ष १९०३ की बात है, बड़ोग साहब ने परियोजना को जल्दी अंजाम तक पहुँचाने के लिए पहाड़ी को दोनों ओर से खुदवाना शुरू किया. बनते बनते यह स्थिति आ पहुंची की दोनों ओर से खुदे सिरे मिल न पाए. परिणामस्वरुप सरकार ने १ रूपये का सांकेतिक जुर्माना बड़ोग साहब पर चस्पा कर दिया, सरकारी खजाने के धन की बर्बादी का मामला जो था. शर्मसार बड़ोग ने सुबह सैर पर जाते समय खुद को गोली मार ली. उनके साथ चलते उनके कुत्ते ने भागकर बाकि लोगों तक इसका संकेत पहुँचाया तो, पर बड़ोग साहब को बचाया न जा सका. स्वाधीन भारत में कलमाड़ी जैसे लोग उनका अनुसरण करना चाहें तो कौन रोकता है. बड़ोग स्टेशन की वर्तमान सुरंग बाद में हैरिंगटन नामक इंजिनियर ने पूरी करायी.

प्रकृति से कभी हाथ मिलाती तो कभी उसका चक्कर लगाती, मस्ताती सी यह ट्रेन लगभग ६ घंटे में शिमला पहुँच गयी. जुलाई की दिल्ली की गर्मी में शिमला के मौसम का अंदाज़ा लगाना कठिन था. वहां तो हमें स्टेशन पर ही जाकेट निकलने पड़े.

क्रमशः

Monday, July 18, 2011

चंडीगढ़ और शिमला की सैर (यात्रा वृतांत - २)

रॉक-गार्डेन देखने के बाद हम वहां से निकलकर पैदल पैदल सुखना झील की ओर चल पड़े. रास्ते में जगह जगह सड़क किनारे टोकरी रखकर कुछ लोग चमकदार और ताजा दिख रही जामुन बेच रहे थे. हमने ज्यादा ध्यान न दिया लेकिन नव्या जैसे अड़ ही गयी थी. हमें भी जामुन खाए शायद काफी समय हो गया था तो तत्काल थोड़ी जामुन ले लीं. जामुन का रसीला स्वाद सारे बचपन का अनुभव फिर वापिस ले आया. बहुत स्वादिष्ट लगीं वे सुखना के किनारे बिकती जामुन.


सुखना झील का दृश्य बड़ा ही मोहक है. दूर सामने हिमाचल के पहाड़ों की कतार है तो इस तरफ किनारे की पटरी पर मुख्यतः पंजाब प्रान्त के सुन्दर और देश के बाकी हिस्सों की अपेक्षा ज्यादा स्वस्थ दिखते लोगों की चहल-कदमी. बहुत से लोग नौकायन में मशगूल थे. किनारे पर कुछ लोग हाथ से चित्र उकेरने वालों के सामने जडवत बैठे अपनी तस्वीर बनवा रहे थे. डिजिटल कैमरा के युग में यह प्रयोग करने का अपना अलग ही मज़ा होता होगा.

सुखना झील के पास ही, सड़क के उस पार एक प्री-पेड रिक्शा का काउंटर है जहाँ पहले से तय कीमत पर ऑटो-रिक्शा लिए जा सकते हैं. हमने वहां से एक प्री-पेड रिक्शा लेकर पंचकुला के लिए प्रस्थान किया जहाँ हमें उस मित्र के सगाई समारोह में भाग लेना था.

चंडीगढ़ के किसी उपनगर जैसा है पंचकुला लेकिन जहाँ चंडीगढ़ एक केंद्र शासित प्रदेश है वहीँ पंचकुला हरयाणा राज्य का एक भाग है. एक सुन्दर, व्यवस्थित और साफ़ सुथरा शहर - पंचकुला.

सगाई में कई और मित्रों से भेंट हुई . सगाई में लड़की के परिवार वालों ने मौज मस्ती और खाने पीने का अच्छा बंदोबस्त किया हुआ था. लड़की एक सिख परिवार से है और सिखों की गर्मजोश मेहमान नवाजी जग जाहिर है. धूम-धाम के साथ, बहुत सारे रिश्तेदारों की उपस्थिति में सगाई संपन्न हुयी. अपने मित्र को बधाईयाँ देकर और रस्मी तस्वीरों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के बाद हम उसी रात आगे की यात्रा पर कालका के लिए रवाना हुए.

पंचकुला से करीब १५ किलोमीटर दूर है कालका और यह हरयाणा राज्य में ही है. कालका से आगे पहाड़ों की ओर चलें तो हिमाचल की सीमा शुरू हो जाती है.

रात ११ बजते बजते हम कालका जा पहुंचे जहाँ हमें अपने एक घनिष्ट रिश्तेदार के यहाँ रुकना था. अत्यंत स्वादिष्ट खाना और ढेर सारी बातों के बाद नींद कब आ गयी, याद नहीं!

सबह ६:३० पर कालका से नेरो-गेज़ की छोटी ट्रेन में बठकर हम शिमला के लिए रवाना हुए. इस फर्स्ट क्लास डब्बे की टिकेट प्रति व्यक्ति २८०/- रुपया है. चूँकि इस मार्ग पर कई तरह की ट्रेन दिखाई पड़ीं जिनकी सीट व्यवस्था अलग अलग थी तो मेरा अनुमान है की टिकेट की कीमतों में भी एक से ज्यादा आप्शन रहे होंगे.

क्रमशः

Friday, July 15, 2011

चंडीगढ़ और शिमला की सैर (यात्रा वृतांत -१)

"मेरे पास तेरे लिए एक  धमाकेदार खबर है ", मैंने जैसे ही एक मित्र द्वारा फेसबुक पर किसी तीसरे मित्र के लिए लिखी गयी यह टिपण्णी पढ़ी तो उसे तुरंत फ़ोन घुमाया. "ऐसी क्या खबर है रे", मैं बोला. "८ जुलाई को सगाई है मेरी, तुमको भी निमंत्रण अभी दे रहा हूँ; सगाई चंडीगढ़ में होगी", उसने कहा.


उस मित्र का यह निमंत्रण मेरे लिए लुभावना था क्योंकि उसकी सगाई के साथ साथ चंडीगढ़ और उस के पास बसे पहाड़ी पर्यटन स्थल शिमला घूमने का यह एक मौका जो ठहरा. मैंने अनीता और नव्या के साथ सगाई में जाने और उसके बाद घूमने निकल पड़ने की विचार कर लिया पर कोई निश्चित योजना न बनाई.

जैसे-जैसे समय नज़दीक आया वैसे-वैसे न जाने की भावना बलवती होती गयी. पर अनीता जैसे मन बना ही चुकी थी; अंत समय पर उसने मुझे भी इस यात्रा पर निकलने को राज़ी कर लिया. नव्या अभी इन सब हाँ-ना के चक्र से बाहर है और जीवन के क्षण क्षण के आनंद के साथ चलने का जो बाल सुलभ गुण होता है, उसी का लाभ ले रही है. उसकी हाँ तो यकीनन थी ही जिस पर विचार भी नहीं किया गया.

बिना किसी ख़ास तैयारी या रिजर्वेशन के हम लोग सुबह ही घर से ISBT बस स्टेशन के लिए चल दिए. ISBT से कई तरह की बसें चंडीगढ़ जाती हैं जिनमे किराये उनकी सुविधा के अनुरूप हैं - वोल्वो, वातानुकूलित, गैर-वातानुकूलित. हमें वोल्वो बस मिल गयी जिसका किराया तो बाकी बसों से ज्यादा है पर साथ ही वो उनसे ज्यादा आरामदायक भी है. इनका किराया प्रति व्यक्ति 475/- Rs. रहा. चलने के करीब 5 घंटे में हम चंडीगढ़ जा पहुंचे.

दिल्ली से चंडीगढ़ की दूरी कोई 250 किलोमीटर की होगी जो  की  राष्ट्रीय राजमार्ग- 1 ( NH1)  द्वारा जोड़े जाते हैं. रास्ते में पड़ने वाले सारे शहर हरयाणा प्रदेश में पड़ते हैं और दिल्ली और उसके आस-पास के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की भीड़-भाड़ के उलट काफी विरल दिखते हैं.

यह तो सब मानेंगे कि चंडीगढ़ भारत के कुछ चुनिन्दा व्यवस्थित और सुन्दर शहरों में से एक है; यह सर्वश्रेष्ठ शहर है या नहीं - ये बहस के लिए अवश्य एक अच्छा विषय साबित होगा.

चंडीगढ़ पहुँचते ही हम ऑटो-रिक्शा द्वारा सीधे रॉक-गार्डेन चल पड़े. रॉक-गार्डेन सेक्टर-१ में है और सुखना झील से बमुश्किल १ किलोमीटर की दूरी पर. इसे पदम्-श्री से सम्मानित श्री नेक चंद द्वारा बनाया गया था. कहते हैं उन्होंने  पेड़ों से घिरे इस स्थल पर १९५७ में कलाकृतियाँ बनाना शुरू किया और बाहरी दुनिया से इसे छिपाकर रखा. इस  जगह की जानकारी बाहरी दुनिया को काफी बाद में - १९६९ में जाकर हुयी. शुरुआत में इस निर्माण को अवैध घोषित किया जाने वाला था किन्तु आगे चलकर यह चंडीगढ़ की शान बनने  वाला था.  वाकई एक खूबसूरत जगह है यह रॉक-गार्डेन जहाँ बच्चों को भाने वाली कलाकृतियाँ हैं तो उनको बनाने में लगा सामान देखकर बड़े भी चकित रह जाते हैं. चूड़ीयों से बनी व सजी चिड़ियाँ हैं तो कहीं पुराने बिजली के काम आने वाले सिरेमिक से बनी दीवारें, कहीं बोरों समेत जमा हुआ सीमेंट किन्ही खम्भों का हिस्सा बना हुआ है तो कहीं टॉयलेट के सिरेमिक से जड़ी इंसानी आकृतियाँ तथा और भी बहुत कुछ.  देखना भी कोई महंगा नहीं - बड़ों की टिकेट १५ रूपये तो १२ साल तक के बच्चे सिर्फ ५ रूपये में वहां की सैर का आनंद ले सकते हैं .


क्रमशः

Thursday, July 7, 2011

गुस्ताव - एक कहानी (भाग - ६)

" साइकिल कभी भी डाक-गाडी के पीछे न रखना", गुस्ताव ने पीकू से कहा. पीकू ने तपाक से पूछा,"ऐसा क्यूँ"? "कभी देखा है डाक गाडी का पिछला हिस्सा...बिल्कुल साइकिल के पहिये जितना ही ऊपर होता है वो ज़मीन से. रुकी हुई गाड़ी आगे चलने के पहले हल्का सा पीछे आती है और अगर तुम उसके बिल्कुल पीछे खड़े हो तो तुम्हारी साइकिल के अगले पहिये की खैर नहीं. मेरे साथ हो चुका है रे", घटना के ख़राब अनुभव की पुनरावृत्ति करता गुस्ताव बोला.


दोनों पार्क में सुबह की सैर कर रहे थे. बारिश का सा मौसम था - घनघोर काले बदल, तेज़ ठंडी हवा और चारों ओर हरियाली ही हरियाली. कहीं कोई क्रिकेट खेलने में लगा है तो कोई फ़ुटबाल, कहीं बेडमिन्टन का जोर है तो कहीं कबड्डी का समां. गुस्ताव का मन क्रिकेट खेलने का है पर वहां खेलती किसी टीम से कोई वाकफियत नहीं है. बोले तो किस से बोले. दूर बैठा देखता रहा. अच्छे शोट पर मन ही मन तारीफ कर बैठता. पीकू उससे ७ या ८ साल छोटा था. दोनों एक ही बेंच पर बैठे थे. पीकू ने भी एक नींद खींच ली. गुस्ताव की ज्ञानवर्धक बोझिल बातों से सो जाना ही अच्छा है ऐसा पीकू के मन में चलता ही रहता था. गुस्ताव भी उसके ज्ञानवर्धन का कोई मौका न चूकता था.

Tuesday, June 28, 2011

The Karate Kid

Though the "wax on-wax off" is replaced with a jacket game in the new version of The Karate Kid but the virtue of a calm learner's mind and noble objective behind the learning is still the baseline of what this movie talks about. Mr. Miyagi in the older version was more convincing than our favorite Jacky Chan in this new version. Both the movies focus on the inner game while talking about Karate or Kung Fu which reminds me of a classic book on the subject - "The Inner Game of Tennis".

However the interesting part about this movie is  - how the Chinese audience  would have reacted to it? The protagonist Jaden Smith trains in mainland China with a Chinese guru (Jacky Chan) and eventually defeats a Chinese opponent. The political equation of the world is experiencing an over assertive China for at least a couple of years now. Such a movie could have hurt the sentiments of an egoist Chinese as the movie might be interpreted as American supremacy over  the Chinese. It may give birth to an idea of a Chinese entry to the world of high tech movies also. Here I am not talking about behind the scenes electronics which I am sure must have been a product of China as well but the software content of the movies too.

No matter which version was better, The Karate Kid is a movie worth watching as it gives some idea of "Optimal Experience" or "Flux" (this blog is named after such an experiential state) while performing day-to-day actions. At one point, Jacky Chan even mentions in the movie - "Every thing is Kung Fu"; it means to me that performing every action from within the optimal experience.

Saturday, June 18, 2011

मेडीटेशंस - द्वितीय अध्याय (किश्त - ४)

  ये जीवन किसी भी क्षण छोड़कर चले जाओगे तुम: कुछ भी करते, बोलते या सोचते समय ऐसा अपने मन मस्तिष्क में रखो. अगर ईश्वर का अस्तित्व है तो दुनिया से रुखसत होने में कैसा डर: वो तुमको कोई नुक्सान नहीं पहुंचाएगा. अगर ईश्वर का अस्तित्व नहीं है अथवा ईश्वर को इंसानों से की कोई परवाह नहीं है तो फिर ऐसे जीवन का भी कोई मतलब नहीं जिसमें ईश्वर न हो या उसकी कृपा दृष्टी न हो.  अर्थात ईश्वर हो या न हो - यह जीवन खोने से डरने की कोई जरूरत नहीं है.

हालांकि मेरा मानना है कि ईश्वर का अस्तित्व है और वे मानवजाति की परवाह भी करते हैं : साथ ही उन्होंने इंसानों को वो शक्ति भी दी है जिससे वो नकसान उठाने से खुद को बचा सके.  

जो कुछ भी नकसानदायक है उस सबसे बचने की शक्ति दी है उसने.  अब जब कोई चीज़ इंसान को ख़राब न कर पाए तो भला उसकी जिन्दगी को कैसे ख़राब करेगी वो.

संपूर्ण की प्रकृति (Nature of the Whole) ऐसी गलती जाने, अनजाने में या सामर्थ्य की कमी से कभी ऐसा न करेगी की सही और गलत का भेद ही खो दे.  जीवन, मृत्यु, प्रसिद्धी या एकाकी जीवन, दुःख या सुख, धन दुआलत या गरीबी - सही और गलत दोनों प्रकार के लोगों के पास आते हैं लेकिन अपने आप में इनमे से कोई भी स्वयं सही या गलत की परिधि से बाहर हैं.

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क्रमशः

Friday, June 17, 2011

Wednesday, June 15, 2011

अन्ना हजारे - एक "अनएलेक्टएड टाईरेंट"

आज कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी कह उठे की अन्ना हजारे एक "अनएलेक्टएड टाईरेंट" हैं. शब्दार्थ ढूंढें तो "अनएलेक्टएड टाईरेंट" का मतलब हुआ - "बगैर चुनाव लड़े सत्ता कब्ज़ाने वाला". कांग्रेस के बड़े बड़े नेताओं और मंत्रियों के रिकॉर्ड पर नज़र डाले तो पता लगेगा कि बहुत से महानुभाव "अनएलेक्टएड टाईरेंट" ही सत्ता पर काबिज़ हैं. श्री मनमोहन सिंह से पहले सारे प्रधान मंत्री लोक सभा के सदस्य होते थे लेकिन श्री सिंह जो कि निःसंदेह एक योग्य अर्थशास्त्री रहे हैं, ने यह परंपरा बदल दी है. वे जनता द्वारा सीधे नहीं चुने गए हैं.  "अनएलेक्टएड टाईरेंट" की ये पदवी उन पर भी फिट होती है.  जनतंत्र का मजाक देखिये कि वे राज्य सभा में आसाम से आते हैं. अब भला उनका आसाम में कैसे डोमिसाइल हो गया. लेकिन हमें उनसे कोई शिकायत नहीं. पर अन्ना का इस बिना पर तिरस्कार अच्छा नहीं. यह भी सही है कि बहुत से योग्य व्यक्ति जो देश कि व्यवस्था में बहुत महती योगदान दे सकते हैं उनमें से अधिकतर जनता के द्वारा चुनकर सत्ता में नहीं आ सकते.  संयुक्त राज्य अमेरिका, जो की दुनिया की सबसे बेहतरीन जनतांत्रिक व्यवस्थाओं में से एक है, वहां ऐसे योग्य व्यक्तियों को सीधे राष्ट्रपति द्वारा जन हित के पदों पर नियुक्त करने का प्रावधान है.  अपने यहाँ भी सरकार नंदन निलेकनी, सेम पित्रोदा, मोंटेक सिंह अहलुवालिया जैसे काबिल लोगों की प्रतिभा का लाभ उठा चुकी है. तो फिर अन्ना की सेना से परहेज़ क्यों?

निष्पक्ष रूप से भी देखेंगे तो पाएंगे कि अन्ना हजारे के द्वारा किये गए कार्य, मनीष तिवारी के कार्यों की अपेक्षा  कहीं ज्यादा जन हित साधते हैं.

अब मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित अन्ना कोई चुनाव न ही लड़ें तो अच्छा.  चोर उचक्कों के बीच उन्हें देखना मन को न भायेगा!

Monday, June 13, 2011

गुस्ताव - एक कहानी (भाग - ५)

 थोड़ी ही देर में झपकी आना शुरू हो गयी. कुछ देर कुर्सी पर ही सोने के बाद वो उठा और रसोई से पानी पीकर पलंग पर जा सोया. नींद में जो एक अवचेतन मन होता है वो जैसे जाग उठा...

क्रिकेट का मैच चल रहा है. ६ खिलाडी पहले ही आउट होकर जा चुके हैं. पूरे २०० रन अभी और चाहिए जीतने के लिए. स्टेडियम के सारे दर्शक इस टीम से आस छोड़ चुके हैं. बेटिंग गुस्ताव कर रहा है. दे दनादन, शॉट पर शॉट - दूसरे बेट्समेन का तो नंबर ही नहीं आने दे रहा है यह. पासा जैसे पलट ही गया हो. स्टेडियम में चारों ओर गुस्ताव का ही हल्ला है. अंततः टीम को जीतकर ही लौटा वो.

कई ओर ऐसे ही नायक रूप से परिपूर्ण स्वप्न कब से कब तक चले पता नहीं. सुबह हो चुकी थी.


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क्रमशः

Friday, June 10, 2011

मेडीटेशंस - द्वितीय अध्याय (किश्त - ३)

हमेशा ये बातें याद रखो:

विश्व की प्रकृति क्या है ; तुम्हारी अपनी प्रकृति क्या है; दोनों का आपसी रिश्ता क्या है;  एक कितना विशाल तो दूसरा उसके सामने कितना बौना है; ऐसा कोई नहीं है जो तुमको उस प्रकृति के तारतम्य में रहते हुए कुछ बोलने और करने से रोक सके, जिसका कि तुम एक हिस्सा हो.

थेओफ्रस्तस ने जब दर्शनशास्त्र को एक आम इंसान के ज्ञान के अनुसार आसन रखकर पापों को तुलनात्मक क्रम में रखा तो उसने बताया कि लालसा से किये गए अपराध, क्रोध में किये गए अपराधों से कहीं अधिक गंभीर होते हैं.  क्रोधी व्यक्ति स्पष्ट रूप से किसी दर्द और अनियंत्रित उद्वेग में अपनी तर्क बुद्धि खो बैठता है जबकि लालसा से अपराध करने वाला अपने आनंद के अधीन हो जाता है और ऐसा व्यवहार कहीं न कहीं कम पौरुष का प्रदर्शक है.

आगे भी एक मंजे हुए दर्शनशास्त्री की भांति, थेओफ्रस्तस कहता है कि जो अपराध आनंद के अधीन होकर किया गया हो उसकी भर्त्सना दर्द के अधीन किये गए अपराध से कहीं ज्यादा की जाती है.

सामान्यतः देखा जाये तो भी एक तरफ घायल, उकसावे के दर्द से गुस्साया हुआ व्यक्ति है तो दूसरी तरफ स्वयं ही गलत करने के आवेग का स्रोत्र है जो लालसा के वश में अपराध करता है.

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क्रमशः

Thursday, June 9, 2011

गुस्ताव - एक कहानी (भाग - ४)

रोशन के साथ स्टेडियम आना और उसके कई चक्कर लगा चुकने तक कोने की सीढ़ियों पे बैठ कर चिंतन करते रहना गुस्ताव का शौक है और शायद आदतन ढल चुकी मजबूरी भी.

अँधेरा घिरने पर दोनों विदा लेकर अपने अपने घरों की और बढ़ चले. घर की और बढ़ना गुस्ताव को पसंद नहीं. साइकिल और धीरे हो जाती है,  अपने ही आप.

धीरे धीरे साइकिल कान्टोंमेंट के अँधेरे से होकर आगे बढ़ रही थी कि तभी गुस्ताव का  मन  किया कि क्यूँ न सिगरेट पी कर देखी जाए.  इधर विचार आया तो साथ में उधर से डर भी. हिम्मत कर के सिगरेट खरीद ही ली और साथ में एक माचिस. अब पहली बार सिगरेट पीयेंगे जनाब. अगर दुकान पर जलाई और पहली बार में न जली तो लोग पहचान जायेंगे कि देखो पहली बार सिगरेट पी रहा है.  इसी लिए दूर जाकर अँधेरे में साइकिल रोकी और सिगरेट जलाने के लिए माचिस निकाल ली. ३-४ तीलियाँ बर्बाद करने के बाद ही सिगरेट ने सुलगना शुरू किया.  पहले ही कश में काफी कड़वाहट थी. "पूरा मुंह सडा दिया दुष्टा ने",वो बुदबुदाया.   दो कश और लगाये पर मज़े की अनुभूति के आभाव में  तिरस्कारपूर्वक उसे सड़क किनारे की नाली में पटका और धर जा पहुंचा. घर पहुँचते ही उस माचिस को बाकी की माचिसों में मिला दिया और पढने बैठ गया. 
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क्रमशः

SEI CMMI-SVC

Got to know about CMMI for Services, today. CMMI-SVC stands for Capability Maturity Model Integration for Services. Being a model, it focuses on "what" needs to be done for making the Organizational processes mature and capable. The "how" part is taken care of by the Organization using other methods to deliver on the "What".

Still exploring the need for it when ISO20K is around.

CMMI for Services - Documentation

Friday, June 3, 2011

Nutrition Strategy from here onwards

Mastery involves learning a new domain of words to distinguish things on another level. It has been a sort of mastery in nutrition for me. I have turned calorie concious now. So burning any excess calories by the end of the day and maintaining at 81-82 kgs is the current agenda.

Slowly reducing the body fat and increasing the lean mass and thus staying at the same weight is what I desire now.
How to do it...here is my plan:
1. Reduce fat by keeping a negative calorie diet on weekdays
2. Excess calorie diet on the weekends for at least 36 hours
3. Burning Excess calories everyday, even on the weekends when it is a high calorie diet - 10 KM walk on both days
4. Suplimenting through L-Glutamine to minimize catabolism
5. Increasing fat matabolism by increasing intake of MUFA/Good Fat e.g. Nuts, Olive Oil etc

It may take another month before it falls under 15% total body fat limits.

Tuesday, May 10, 2011

On the path to six packs!

Health has always been on the back seat for many years for me. This January, it just happend. Chaubey and I visited a gym nearby and enrolled. We have had no idea as how long it is going to last. I have been to gyms lifting weights - the lightest of them, of course but could never manage for than a month or two.
Four months this time and still motivated. Achievements? Many!! Here is the list:

1. Body weight was 72 Kgs in the last week of Jan, 2011 and it is 84 Kgs since Mar,2011.
2. General health and stamina is better than my previous self.
3. Body fat accumulation is in control and is on the reducing path with a target of 10% or even lower - six packs come out at this stage!!
4. Great fitting clothes
5. Improved digestion and newly formed and yet healthy eating habits
6. Nutrition knowledge that was never there before

I feel like going into a new profession of being a health coach in the coming years with my acquired knowledge and experience of this nutrition and health world!! IT might take a back seat! :-)


I'll blog the pictures of my six packs when they arise or rather come out.
- Rahul

Sunday, February 20, 2011

The Devil


As soon as I emptied my coffee cup, I realized that my cell phone was not around. I had made a phone call right after coming to this tea house, almost half an hour hour back; so not having brought it in was out of question. Sudden gush of hormones made my heartbeat faster and my mind was running in all directions riding this untamable horse of thiniking. It was an expensive handset and so many efforts were put in before zeroing in on that one.

That "macho" waiter standing near the counter must have stolen it, I thought in sheer anxiety. I noticed a vicious spark in his eyes today. I have never been comfortable placing orders with him and yet, he has served me today. I hurriedly went up to him, keenly noticing everything on my way.

"What happened sir?", he asked. "I can't find my phone", I muttered. I felt short of ideas now. I wanted to beat the shit out of him but he was an endomorph - looked like coming from some US rugby team. I started to feel the certainty of not getting the phone back ever. I wanted to curse him with whatever evil words I had learnt consciously and subconsciously since my childhood.

I slowly walked back to my seat and found my phone lying there on the corner of my seat. It was me, who kept it there after that call was over. I looked around.
He was still standing there with the same spark in his eyes but it was not vicious any longer. Who has been a devil today – me, I realized.

Monday, February 7, 2011

Mausam Mausammm!

The dazzingly verdant sight of fields...growing wheat or yellow mustard flowers giving a mixed texture.
Heavenly feel that it gives coming out on any of the highways leaving Delhi!

Monday, January 3, 2011

मेरा नए साल का आगाज़ कुछ ऐसे हुआ...

२१ दिसम्बर को ही तय कर लिया था कि ३१ तारीख को अपने गृह नगर चला जाऊँगा. नव्या का जन्म दिन भी ३१ दिसम्बर का ही है - नव्या नाम उसको इसी लिए दिया गया है; नए के आगमन का सूचक एक नाम. उसके लिए नाम तो "ज़ूनी" भी सोचा था हमने. कहीं से पता लगा था कि "ज़ूनी" एक फ़ारसी शब्द है जिसका मतलब है "पुरानी". अगर ३१ दिसम्बर को जन्म दिन पड़ता हो "ज़ूनी" नाम भी सार्थक सिद्ध किया जा सकता है. आजकल अनोखे नाम रखने का चलन है, नाम अगर "ज़ूनी" रखें तो हम भी इसी चलन के साथ बने रहेंगे; लेकिन फिर सोचा कि "ज़ूनी" नाम तो इसके स्कूल में इसके साथी बिगड़कर बोलेंगे - "जूनी" - अब बर्तन धोने वाला कपडे का टुकड़ा भी तो "जूनी" ही कहलाता है. सो हमारी बेटी का नाम "नव्या" रखा जाना तय हुआ.

हाँ तो बात थी कि नव्या का जन्म दिन मनेगा ३१ को जब सब लोग एक साथ आगरा में इकट्ठे होंगे. लेकिन एक ई-मेल ने मेरी योजना को बदलवा डाला. मैंने अभी हाल ही में एक टेलिकॉम कंपनी ज्वाइन की है. यहाँ ३१ दिसम्बर की रात को ऑफिस आना होता है. अरे भई, कमाई का दिन है! सभी लोग नए साल के आगमन पर आपस में  एक-दूसरे को शुभ-कामनाएं देंगे और फ़ोन कंपनियां इसी रात, अपनी दिन पर दिन गिर रही कमाई साधेंगी. टेलेफोन नेटवर्क जाम न हों इसलिए पहले से ही खास इन्तेजाम कर लिए जाते हैं कि अंत समय सब कुछ ठीक चले.

अब आगरा तो न जा पाया, पर नव्या को मैंने फ़ोन से ही बधाई दी. रात को ऑफिस जा पहुंचा. सब कुछ ठीक ठाक ही गुजरा. कोई बड़ी दिक्कत पेश नहीं आई और रात १ बजे तक सब अपना काम पूरा कर चुके थे. अब बारी थी खाने पीने की. ऑफिस की ओर से बड़े-बड़े पिज़्ज़ा मंगवाए गए थे. लोग तो लोग ही ठहरे, चाहे ऑफिस में हों या कहीं और - सब बिना बारी "डी डी ए" आवास लूटने की भांति खाने पर टूट पड़े. जिसे जो मिला उसने वो सब भर पेट खाया. दूसरे ने खाया या नहीं इसकी परवाह किसी ने नहीं की. मैं साक्षी हूँ - इंसान वाकई पशु को मात देता दिख रहा था. कुछ पिज़्ज़ा पाने से रह गए तो उन्होंने केक से बदला उतारा. मैं भी सही गलत की उधेड़-बुन में फंसा लुटता पिज़्ज़ा देख रहा था. बॉस का भाषण अभी ख़तम न हुआ था. खाने की सरकारी घोषणा अभी न हुयी थी. फिर भी लोग न माने. सही का साथ दूँ तो फ्री का महंगा पिज्जा हाथ से जाए...गलत का साथ देना गवारा नहीं. तभी किसी का हाथ पीठ पर पड़ा. साथी ही था. "चल खाएं नहीं तो ये मिलने वाला नहीं", वो बोला. बुद्ध का मध्य मार्ग शायद यही था. रोम में रहते हुए भी रोमन न बनना मेरी मूर्खता होगी. मैं भी आखिरी गाड़ी से जैसे निकल पड़ा. सवाल सिर्फ - "मेरी पशुता उसकी पशुता से कम है या ज्यादा का रह गया था". उस आप-धापी में एक तिकोना मेरे भी हाथ लग गया. "उद्यमेन ही सिध्यन्ति..." की सार्थकता का अहसास हो चला था मुझको. फिर तो मैं केक की लाइन में धक्का मारकर आगे पहुंचा और वहां से कई बार "आवंटन" पाया.  कई बार केक खा चुकने के बाद पेट और नीयत दोनों भर चुके थे. कुछ अपूर्णता जरूर थी - देर से पशुता-जागरण के कारण पिज़्ज़ा के सिर्फ एक ही प्रकार का रसास्वादन कर पाया. इसी उधेड़-बुन में लगा लगा मैं बाहर निकल आया.

मेरा २०११ शुरू हो चुका था - उस रात.
केक की बात न करो, हाँ पिज़्ज़ा कम खाया.