Tuesday, October 26, 2010

RCA vs Problem Management

Found this ITSM / Service Management consulting site & blog -
http://www.pinkelephant.com/ & http://blogs.pinkelephant.com/index.php?/troy/comments/itil_problem_management_vs_root_cause_analysis/

The following lines give a quick insight into the difference between RCA and problem management:

  • The RCA process is focused on Problem Identification and Impact Reporting
  • ITIL Problem Management is focused on Problem Identification and Elimination
http://blogs.pinkelephant.com/index.php?/troy/comments/itil_implementation_roadmap_problem_management_part_6/
  • Incident management: Restore service (fix the user)
  • Problem Management: Identify the error and remove it (fix the technology)

 

Friday, October 1, 2010

शातिर

में ज्यों ही सीट से उठ कर खड़ा हुआ, मेरा सीधा हाथ अपने आप पेंट कि दोनों जेबों को चेक करने बढ़ गया. मोबाइल फ़ोन न दायीं जेब में था, न ही बाईं जेब में. धड़कन को बढ़ते वक़्त ही न लगा. सर्र से बहुत से ख्याल दिमाग में एक और से घुसकर दूसरी और तक जाते से लगे. कहाँ रखा था, टेबल पर या नीचे रखे कंप्यूटर कैबिनेट पर, नोकिया का एक महंगा सेट था, महीनों सोच विचार करने के बाद ख़रीदा था...घर के लोगों की सहमती बनाने, मॉडल तय करने में लगाया समय, अनगिनत मोबाइल स्टोर विजिट्स तथा पैसा इकठा करने के बाद मैं ये सेट ले पाया था. लगा जैसे एक नजर हटते ही कितना सारा कुछ तुरंत खो बैठा. सोच का जाल हटा तो गर्दन पीछे घूमी. पीछे वाली डेस्क पर वोही शातिर बैठा था.  जानता हूँ साले को. हरामी है साला. इसी ने उठा लिया होगा. देखो तो...साले की आँखें बता रहीं हैं की मजा लेने के लिए इसी ने उठा लिया होगा. क्या हो गया सर...उसने पूछा. यह तो तय है कि मेरी नज़र हटी तो येही उठा ले गया होगा. अब परेशां करेगा. कहीं दबा ही न जाए. सारे विचार उसी पर आ कर रुक गए. हर विचार उसी का खून पीने को उतारू था. मोबाइल नहीं मिल रहा, मैं धीरे से बोला. बोलना तो चाहता था कि कुत्ते फ़ोन वापिस कर. मैं घूम कर पीछे कि लाइन मैं भी गया लेकिन फ़ोन वहां कहाँ मिलना था? अब तो इसी से पंगा लेना पड़ेगा. परेशानी और बढ़ गयी.

अभी तो बड़ा मीठा बोल रहा था. लगता है पिछली बहस से उबरा नहीं है ये. लगता है कि ये इस बार फ़ोन मार लेगा...ये मजाक से ज्यादा हो जायेगा. ये बोला भी था कि देख लूँगा. कर ही दिया नुक्सान. वैसे भी मेरा और इसका मजाक का रिश्ता नहीं. मैं किसी का भी मजाक सहन करूँ पर इसका मजाक मुझे कभी भी रास नहीं आया था और कई बार पहले भी इसी बात पर नोक झोंक हो चुकी थी. आज इसका दाँव पड़ ही गया.

गार्ड को बोल कर सारा थैला-झोला चेक करा डालूँगा इसका. कहाँ ले जा पायेगा...सीट कि और बढ़ते हुए मैंने सोचा. उसकी आँखें तो जैसे चीख कर बोल रहीं थी कि देखा...आज तेरा नुक्सान कर डाला मैंने और तू कुछ कर भी नहीं पायेगा. मैं उसका मुंह तोड़ देना चाहता था. कुत्ता साला कभी किसी का सगा न होगा यह. मैं भी बार बार इसके चक्कर मैं क्यों आ जाता हूँ. थोड़ी ही देर पहले मेरी सीट पर आया था ये. बड़ा मीठा बोल रहा था. मुझे क्या पता था कि मेरा फ़ोन सरका लेगा चुपचाप.

इसी सोच विचार में अपनी सीट तक जा पहुंचा. सीट पर नज़र पड़ी तो फ़ोन वहां पड़ा चमक रहा था. में उसी पर बैठा था. जब उठा तो सीट की और देखा भी नहीं. बड़ी रहत मिली. लगा जैसे सारे नुक्सान की भरपाई एक पल में ही हो गयी. नज़र पीछे गयी...शातिर की आँखों में वोही चमक थी पर अब मुझे वो मेरे खिलाफ नहीं लगी. फिर से निष्कलं हो गया था वो. सारे सोच विचार मेरे दिमाग में होते रहे और मुझे उसका रंग पल पल बदलता नज़र आता रहा था. शातिर वो नहीं था ....