Monday, April 5, 2010

मेडीटेशंस - द्वितीय अध्याय (किश्त - २)

ईश्वर की इस दुनिया में सब कुछ ईश्वरीय इच्छा के फल स्वरुप ही होता है जिसे किस्मत कहते हैं. किस्मत का खेल प्रकृति का ही हिस्सा है - किस्मत के तारों से बुना हुआ ताना बाना. सब कुछ इसी ईश्वरीय इच्छा से घटित होता है - आवश्यकता तथा संपूर्ण विश्व के भले की भावना भी सभी घटनाओं के कारकों में सम्मिलित होते हैं. तुम भी तो इन्हीं सब के अंश हो.

प्रकृति का प्रत्येक हिस्सा प्रकृति द्वारा ही निर्मित है और सबका भला उसमे निहित है.

विश्व का विन्यास (Order of the World) विश्व में फैली हर चीज़ पर अलग-अलग तथा सभी पर समग्र (wholly) रूप से निर्भर करता है. सो जो अभी तुम्हारे पास है वो पर्याप्त भी है - ये सिद्धांत है.
पुस्तकों के प्रति अपनी भूख से पीछा छुड़ाओ - मृत्यु शय्या पर पहुँचने के समय तुम्हारी दशा शिकायती या बडबडाते हुए न होकर शालीनता से भरी व ईश्वर के प्रति सद्भावना से भरी होनी चाहिए.

ध्यान दो कि जीवन में कब से तुम टाल मटोली में फंसे हो, ईश्वर से समय दान पाते जा रहे हो और फिर भी उस बढे समय का सदुपयोग करने में असमर्थ ही हो.
अभी वह समय है जब उस विश्व को, उसके रूप को समझो जिसका तुम हिस्सा हो. उस महँ नियंत्रक के खेलों को समझो जिसका तुम स्राव मात्र हो.जान लो कि यहाँ तुम्हारा समय निश्चित है और इसका इस्तेमाल करते हुए अज्ञान के अन्धकार से बहार निकलो अन्यथा समय के साथ साथ तुम भी चले जाओगे और ऐसा मौका दोबारा न आएगा.

प्रत्येक क्षण एक रोमन नागरिक तथा एक पुरुष होने के नाते जो कार्य सामने है उसको पूरी चेष्टा के साथ समझदारी, लगन, दया एवं न्याय से करो और साथ ही साथ अन्य किसी भी विचार से पीछा छुड़ा लो.
ऐसा तभी हो पायेगा जब तुम हर काम को ऐसा मानते हुए करो कि जैसे तुम्हारे जीवन का अंत समय अब निकट है. अपना सुस्त रवैया छोडो, तर्क कि जगह उन्माद में आकर काम करने की आदत से बचते हुए दिखावा या आत्म प्रेम की पराकाष्ठ से बचते हुए, अपनी किस्मत का रोना की आदत से बचते हुए किसी काम को अंजाम दो.

देखो कि किसी व्यक्ति को ईश्वरीय जीवन बिताने के लिए कितनी कम बातों का साथ चाहिए.
 ईश्वर भी उस व्यक्ति से कोई अपेक्षा नहीं रखते जो इन सब बातों का ध्यान रखता हो.

आत्म हानि से तो अपनी ही आत्मा को दुःख पहुँचता है - आत्म सम्मान खो देने का सबसे सुलभ रास्ता है ये. हममें से हरेक का जीवन एक क्षण भर का है. तुम्हारा जीवन अगले ही क्षण लगभा समाप्त ही है, रही अगर अब भी आत्म सम्मान न दिखलाया तो तुम्हारा भला तो दूसरों की आत्माओं पर ही निर्भर हुआ न.

क्या बाहरी संसार और इसकी बातें तुमको दिग्भ्रमित (distract) करती हैं?
अगर ऐसा हो तो अपने आपको अच्छी सीख सिखलाओ और इस सांसारिक भटकाव से अपने आप को रोको.

अगर ऐसा कर पाने में सफल हुए हो तो अन्याय प्रकार के भटकाव से भी रोको - उन् लोगों के बहकावे में न आओ जो लगभग मरा हुआ सा जीवन जी रहे है और जो अपने क्षणिक उन्माद पर अपनी जुबान व कर्म दोनों से ही लक्ष्यहीन हैं.

दूसरे के दिमाग में क्या चल रहा है, ऐसा पढ़ पाने कि असमर्थता तुम्हारी नाखुशी का कारन कभी नहीं होती; बल्कि हमेशा ये देखो कि तुम्हारे भीतर क्या चल रहा है (self awareness) ये न जान पाना जरोर तुम्हारी अपनी नाखुशी का कारण रहेगा.

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क्रमशः