Sunday, March 21, 2010

मेडीटेशंस - द्वितीय अध्याय (किश्त - १ )

जर्मनी के क्वादी प्रान्त में, ग्रान नदी के तट पर लिखा गया।
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प्रातः उठने पर अपने आप को बताओ कि आज मैं ऐसे लोगों से मिलने वाला हूँ जो हस्तक्षेपी, कृतघ्न, आक्रामक, धोखेबाज़ या शैतानी सोच के मालिक हैं और साथ ही असामाजिक भी। वे लोग खुद भी अच्छे बुरे की समझ अपनी समझ न रखने के कारण इन परेशानियों में फंसे होते हैं।

मुझे ज्ञात है कि अच्छा वही है जो न्यायसंगत भी है जबकि बुरा अन्यायपूर्ण।

एक अन्यायी तथा मुझमें कोई खास अंतर नहीं है - रक्त या बीज, सब एक जैसे ही तो हैं - सामान बुद्धि तथा ईश्वरीय योग्यता, तो फिर उनके हाथों में क्योंकर नुक्सान उठाऊँगा। अपनी कमी से मुझको कोई न प्रभावित कर पायेगा - अपने नायबों से न नफरत और न ही क्रोध करता हूँ मैं।

हम सभी का जन्म परस्पर सहभागिता के लिए हुआ है जैसे कि दोनो पैरों या हाथों या पलकों या कि जबड़ों में होता है। आपसी शत्रुता तो प्रकृति विरुद्ध ही है।

जो भी हो - मेरा अस्तित्व हाड-मॉस, साँसें या नियंत्रक मस्तिष्क से ही है। हाड-मॉस तो ऐसे है जैसे कपडे या तारों का जंजाल, सांस भी हवा ही तो है -उसको शरीर के अंदर या बाहर आना जाना होता है। पुस्तकों को छोड़कर व् कोई भी इच्छा न रखकर ये सोचो कि मरते वक़्त बुढ़ापे में इन इच्छाओं कि गुलामी हट जाए , असामाजिक गतिविधियाँ कोई प्रेरण न दे पायें, वर्तमान कोई अकुलाहट न दे और भविष्य किसी प्रकार कि आशंका न पनपाये।
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क्रमशः

Tuesday, March 16, 2010

मेडिटेशंस -प्रथम अध्याय (किश्त-९)

ईश्वर का आभारी हूँ मैं जिन्होंने मुझे ऐसे सदगुणी दादा, माँ-बाप, बहन, अध्यापक, सहयोगी, परिवार, रिश्तेदार, मित्र आदि सभी कुछ दिया; साथ ही मुझको भी उनकी शान में गुस्ताखी करने कि भूल से बचाए रखा - हालाँकि मेरा ऐसा स्वाभाव तो है ही कि यदि ऐसा अनचाहा मौका आ पड़ता तो शायद मैं ऐसी भूल कर बैठता; लेकिन ईश्वरीय कृपा से ऐसा हो न पाया।
ये ईश्वर की ही कृपा है कि मैं अपनी परवरिश के दौरान अपने दादा की उस महिला मित्र के साथ न घुल मिल पाया। मेरा अपनी युवावस्था में न भटकना व इस अवस्था के साथ समयपूर्व परीक्षणों में न उलझना अच्छा ही रहा। ऐसा करने में शायद कुछ ज्यादा देर ही लगाई होगी मैंने।

ईश्वर का धन्यवाद जिन्होंने ऐसे शासक एवं पिता के अधीन किया जिसने अहंकार से परे रखते हुए ये अहसास कराया की महल में अंगरक्षकों , जड़ाऊँ वस्त्रों, मशालों या अपने बुतों के बिना भी रहा जा सकता है। एक शासक आम नागरिक की भांति रह सकता है ये उन्होंने ही समझाया; ऐसा करने में वह किसी प्रकार से घट न जायेगा।

ईश्वर का इन सभी बातों के लिए धन्यवाद - ऐसा भाई दिया जिसने मुझको अपनी खुद की देखभाल करना सिखलाया। जिसका प्यार व सम्मान मुझको सुखद अनुभव कराता था। मेरे बच्चे शारीरिक विकृतियों से मुक्त पैदा हुए थे। मैं व्यर्थ भाषण बाज़ी, कविताओं या ऐसी अन्य बातों में ज्यादा न उलझा वर्ना अगर ये मुझे जाँच जाते तो शायद मैं इन्ही का होकर रह जाता।

ईश्वर का इन सभी बातों के लिए धन्यवाद - मैं अपने अध्यापकों को उनकी अपेक्षा अनुसार, उनकी युवा अवस्था में ही, उचित पदों तक पहुंचा पाया। मैं अपोलोनियस, रुस्तिकस व माक्सिमस से परिचित था।


ईश्वर का इन सभी बातों के लिए धन्यवाद -मुझे यह ज्ञात था कि प्रकृति अनुसार जीवन यापन कैसा होता है। ईश्वरीय इच्छा, सहायता व प्रेरणा से मुझे ऐसा जीवन जीने में बाधा न आई। अगर ऐसा करने में थोड़ी बहुत कमी रह भी गयी हो तो वो मेरे ही किसी दोष के चलते होगी कि मैं ईश्वर के संकेतों को भांप न पाया। ईश्वर की कृपा से ही मेरा शरीर इस प्रकार के संघर्षशील जीवन में भी सुद्रढ़ बना रहा।

मैंने बेनेतिक्टुस या थेओदोतस को कभी न छुआ। ईश्वर की इच्छा से ही ( sexual passions ) में पड़ जाने के बाद भी मैं बाहर निकल आया।

रस्तिकुस पर कई बार क्रोधित होने पर भी मेरा उसके प्रति व्यवहार शर्मिंदगी की हद तक न गया था।

ईश्वर की ही कृपा थी कि मेरी माँ , जो जल्दी ही चल बसी, अंतिम दिनों में मेरे ही साथ थी।


ईश्वर का इन सभी बातों के लिए धन्यवाद - जब भी मैंने किसी गरीब की मदद करना चाह तो कभी यह सुना कि धन की कमी से हम ऐसा करने में असमर्थ होंगे। में भी कभी ऐसी स्थिति में नहीं फंसा था। मेरी पत्नी जो कि प्रेम करने वाली, परिस्थितियों से अप्रभावित, अक्सर सहमति जताने वाली है। मेरे बच्चों को अच्छे अध्यापकों का आभाव कभी न रहा था।

मुझको को तो स्वपन में भी काफी ईश्वरीय मदद मिली है - भांति भांति कि बिमारियों से बचने का ज्ञान। रूचि होने के बावजूद भी मैं विभिन विषयों के फेर में न पड़ा था, जैसे - साहित्य, तर्क, खगोल आदि से सम्बंधित ज्ञान।

ईश्वरीय वरदान से ही तो बहुत से ऐसे काम जीवन में हो पाते हैं।

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प्रथम अध्याय समाप्त।

क्रमशः


Wednesday, March 10, 2010

मेडिटेशंस - प्रथम अध्याय (किश्त - ८)

(औरिलियस अपने पिता के बारे में...)
वे किसी प्रतिभावान व्यक्ति को, जो अच्छा वक्ता, ज्ञानी, कानूनविद या नैतिक्शास्त्री या ऐसे ही किसी अन्य विषय या क्षेत्र से आता हो, से मेरे पिता बिना ईर्ष्या किये उसको उसका सामाजिक संस्थानों में उचित स्थान दिलाने में मदद करते थे।

वे परम्पराओं के अनुसार चलते तो थे पर परम्पराओं को बनाये रखने कि वकालत या प्रदर्शन उन्होंने नहीं किया था।

वे परिवर्तन के शोकीन तो न थे; एक ही जगह रहते रहना व अपनी बनी बनायीं आदतों का पालन करना ही उनका स्वभाव था। कभी तेज सिरदर्द उनको होता था तो उसके ख़त्म होने के तुरंत बाद काम पर उसी जबरदस्त उर्जा के साथ लौट आते थे जो दर्द के पूर्व थी। उनकी जिन्दगी में बहत कम ही बातें गोपनीय रहीं थीं और वे भी सब जन गतिविधियों से ही सम्बंधित थीं।

प्रदर्शनों, भवन निर्माणों या दान-चंदों में होने वाले खर्चों में वे उतनी उदारता न दिखलाते थे। उनका पूरा ध्यान इस पर होता था कि किया क्या जाना है न कि इस पर कि काम की वाहवाही कितनी होगी।

अनुचित समय स्नान न करते थे वो।

अपने लिए मकान बनवाने, स्वादिष्ट पकवान खाने, अपने कपडे की गुणवत्ता या रंग - इस सब से ज्यादा वास्ता नहीं रखते थे वो; और न ही अपने गुलामों के रंग रूप में ही कोई रूचि।

उनके कपडे लौरियम नमक जगह से आते थे। वहीँ उनका पैत्रक घर था। हमें ज्ञात है कि उन्होंने टसकुलुम में उस कर-संग्रहण अधिकारी से कैसा अच्छा व्यवहार किया था जो उनसे क्षमाबहा याचना कर रहा था।

उनमें कठोरता, हिंसा या जिद न थी। पसीना बहा देने की हद तक किसी बात को जाने ही न देते थे। उनका तरीका जल्दबाज़ रहित, व्यवस्थित, प्रभावकारी तथा निश्छल होता था।

सुकरात के जिन गुणों से हम सब वाकिफ हैं, उन् पर वो सब लागू होते थे जैसे - मानो विनोद करने या उसके निषेध पर वे नियंत्रण कर पाते थे, जब जैसा आवश्यक हो; अधिकतर लोग कर पाने के लिए आवश्यक इच्छा शक्ति का अभाव रखते हैं।

जहाँ जरूरी हो वहां दृढ़ता तथा जहाँ जरूरी हो वहां नरम रूख - यही सम्पूर्ण व अजेय आत्मा के स्वामी कि पहचान है। मेक्सिमस ने अपनी बिमारी के दौरान ऐसा ही व्यवहार प्रदर्शित किया था।

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क्रमशः

Tuesday, March 9, 2010

Life is an intersting mix of surprises

When one thinks that everything is back on track, "bhaiya! all is well again and I need no extra gyan", suddenly a realization brings one back to an uncomfortable feeling or what they say - "there is something wrong here" syndrome.

The search for more gyan begins immediately.
This is what is happening to me right now!!

Found some more gyan and the links are here for some curious souls:

1. Millindapanho or other buddhist texts
http://www.buddhanet.net/ebooks.htm
http://www.buddhanet.net/ebooks_s.htm
http://www.buddhanet.net/ebooks_ms.htm

2. Hindu - Shaiva text
http://www.himalayanacademy.com/resources/books/mws/mws_table_of_contents.html


In the process of creating a win in a major battle...fear has been a constant companion...stopped hating it though...return with the results soon!!

- Rahul