Monday, December 13, 2010

Learning Mandarin is being promoted in CBSE schools

Every other day there is an article in the newspapers about schools focusing on learnign Mandarin. So many kids to train and so less the teachers for it. Seems like teaching Mandarin is a profitable thing in the time to come. The real issue is that Mandarin is not an easy language to learn. As far as I know, learning Mandarin is difficult because it contains pictures - a photographic script. No alphabets!! Each Mandarin character relates to something from the nature, surroundings. I wonder how would a non-chinese environment is going to help someone learning it. Someone in the Sunday (Dec, 11 2010) article wrote that China is the next US - a land of opportunities for the world and yes I also believe in it. Visiting China for almost 5 years back, gave me the same impression. I could make out that learning Chinese / Mandarin is going to help in the future as one becomes acquinted to a language that is being spoken by 1/5th of the world. English is an added advantage of course. Indian can not think of beating China in terms of economic prowess and on other parameters until it is being ruled by "Rajas" so it is rather realiastic to think in terms of becoming a service center to the Chinese or may be joining them for mutual good.

Tuesday, October 26, 2010

RCA vs Problem Management

Found this ITSM / Service Management consulting site & blog -
http://www.pinkelephant.com/ & http://blogs.pinkelephant.com/index.php?/troy/comments/itil_problem_management_vs_root_cause_analysis/

The following lines give a quick insight into the difference between RCA and problem management:

  • The RCA process is focused on Problem Identification and Impact Reporting
  • ITIL Problem Management is focused on Problem Identification and Elimination
http://blogs.pinkelephant.com/index.php?/troy/comments/itil_implementation_roadmap_problem_management_part_6/
  • Incident management: Restore service (fix the user)
  • Problem Management: Identify the error and remove it (fix the technology)

 

Friday, October 1, 2010

शातिर

में ज्यों ही सीट से उठ कर खड़ा हुआ, मेरा सीधा हाथ अपने आप पेंट कि दोनों जेबों को चेक करने बढ़ गया. मोबाइल फ़ोन न दायीं जेब में था, न ही बाईं जेब में. धड़कन को बढ़ते वक़्त ही न लगा. सर्र से बहुत से ख्याल दिमाग में एक और से घुसकर दूसरी और तक जाते से लगे. कहाँ रखा था, टेबल पर या नीचे रखे कंप्यूटर कैबिनेट पर, नोकिया का एक महंगा सेट था, महीनों सोच विचार करने के बाद ख़रीदा था...घर के लोगों की सहमती बनाने, मॉडल तय करने में लगाया समय, अनगिनत मोबाइल स्टोर विजिट्स तथा पैसा इकठा करने के बाद मैं ये सेट ले पाया था. लगा जैसे एक नजर हटते ही कितना सारा कुछ तुरंत खो बैठा. सोच का जाल हटा तो गर्दन पीछे घूमी. पीछे वाली डेस्क पर वोही शातिर बैठा था.  जानता हूँ साले को. हरामी है साला. इसी ने उठा लिया होगा. देखो तो...साले की आँखें बता रहीं हैं की मजा लेने के लिए इसी ने उठा लिया होगा. क्या हो गया सर...उसने पूछा. यह तो तय है कि मेरी नज़र हटी तो येही उठा ले गया होगा. अब परेशां करेगा. कहीं दबा ही न जाए. सारे विचार उसी पर आ कर रुक गए. हर विचार उसी का खून पीने को उतारू था. मोबाइल नहीं मिल रहा, मैं धीरे से बोला. बोलना तो चाहता था कि कुत्ते फ़ोन वापिस कर. मैं घूम कर पीछे कि लाइन मैं भी गया लेकिन फ़ोन वहां कहाँ मिलना था? अब तो इसी से पंगा लेना पड़ेगा. परेशानी और बढ़ गयी.

अभी तो बड़ा मीठा बोल रहा था. लगता है पिछली बहस से उबरा नहीं है ये. लगता है कि ये इस बार फ़ोन मार लेगा...ये मजाक से ज्यादा हो जायेगा. ये बोला भी था कि देख लूँगा. कर ही दिया नुक्सान. वैसे भी मेरा और इसका मजाक का रिश्ता नहीं. मैं किसी का भी मजाक सहन करूँ पर इसका मजाक मुझे कभी भी रास नहीं आया था और कई बार पहले भी इसी बात पर नोक झोंक हो चुकी थी. आज इसका दाँव पड़ ही गया.

गार्ड को बोल कर सारा थैला-झोला चेक करा डालूँगा इसका. कहाँ ले जा पायेगा...सीट कि और बढ़ते हुए मैंने सोचा. उसकी आँखें तो जैसे चीख कर बोल रहीं थी कि देखा...आज तेरा नुक्सान कर डाला मैंने और तू कुछ कर भी नहीं पायेगा. मैं उसका मुंह तोड़ देना चाहता था. कुत्ता साला कभी किसी का सगा न होगा यह. मैं भी बार बार इसके चक्कर मैं क्यों आ जाता हूँ. थोड़ी ही देर पहले मेरी सीट पर आया था ये. बड़ा मीठा बोल रहा था. मुझे क्या पता था कि मेरा फ़ोन सरका लेगा चुपचाप.

इसी सोच विचार में अपनी सीट तक जा पहुंचा. सीट पर नज़र पड़ी तो फ़ोन वहां पड़ा चमक रहा था. में उसी पर बैठा था. जब उठा तो सीट की और देखा भी नहीं. बड़ी रहत मिली. लगा जैसे सारे नुक्सान की भरपाई एक पल में ही हो गयी. नज़र पीछे गयी...शातिर की आँखों में वोही चमक थी पर अब मुझे वो मेरे खिलाफ नहीं लगी. फिर से निष्कलं हो गया था वो. सारे सोच विचार मेरे दिमाग में होते रहे और मुझे उसका रंग पल पल बदलता नज़र आता रहा था. शातिर वो नहीं था ....

Wednesday, September 22, 2010

नव्या के स्कूल के लिए जाना, मुझको भी कुछ पढ़ा जाता है

नव्या के स्कूल दाखिले के लिए स्कूल पहुंचा तो तीन रोचक लेख देखे जो पहले कभी न देखे थे - 
 ऊँचाई - एक कविता,  श्री अटल बिहारी बाजपाई द्वारा रचित
किताबें - एक कविता, सफदर हाश्मी द्वारा रचित
हेड मास्टर के नाम पत्र - अब्राहम लिंकन द्वारा लिखित

बानगी :
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ऊँचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते,
पौधे नहीं उगते,
न घास ही जमती है।
....

किताबें
करती  हैं  बातें 
बीते  ज़मानो  कि 
दुनिया की, इंसानों की 

आज की – कल की 
एक एक पल की 
खुशियों की, ग़मो की 
फूलों  की , बमों  की 
जीत  की  हार  की 
प्यार  की , मार  की 
 ...

Lincoln’s Letter to his Son’s Teacher
He will have to learn, I know,
that all men are not just,
all men are not true.
But teach him also that
for every scoundrel there is a hero;
that for every selfish Politician,
there is a dedicated leader…
Teach him for every enemy there is a friend,
 ......

Tuesday, September 14, 2010

Some experiences making way back to conciousness

Navya makes it. School results are out and her name is there on the list. Now it is the second phase that takes up from here. I am going through a phase tougher than the previous...DECIDING. Realizing that even when the desired goal is achieved, a new journey begins. All pros and cons are being weighed down.

Well, just realized that protein and good tutrition changes the perception too. :-)
One of the keys for having good cognition is to have good hormones flowing and that comes from proper nutrition plus proper excercises. Just a little of this is getting me into some very old experiences of life at "tattva" level. I am able to sense all the "ghataks (parts)" of what is known as the experience of life;  something similar is already there in the store house to compare. A sort of snapshot taken years ago!

-Rahul

Friday, September 10, 2010

School hunt is on, but is it for Navya or for us?

Navya's first formal school interview today...seems she fared well. In the school premises, the parents, a hall full of them, were on the verge of nervous break down and were perspiring while their wards were relatively as ease. As they interviewed parents' too, it was a parents evaluation for sure and parents who are normally good at giving unsolicited advices were caught off guard when their own turn came; we were no different :-)

Results would show how did we fare. Navya informs that she did good in coloring and other puzzle activities she went through. The results depend solely on us.

Today, we have had our tête-à-tête with the plight of the Indian middle class who is already overburdened in keeping the "MOTOR" running!



Tuesday, September 7, 2010

Two quick keyboard shortcuts in MS-Excel 2007


1. Changing Cell reference from relative to mixed or absolute reference
If within a formula, the cell references are " =A1+B1", then double click over the cell or press F2 so that the cell contents become editable. Now, pressing F4
repeatedly makes the cell reference change from relative to absoulte and from absolute to both variants of mixed references
and then back to relative.
Also notice that reference nearest to the cursor, listens to the tune of function key F4. To make the entire formula dance,
select the whole text before pressing F4.
A typical reference change would look like the following, here the cursor was nearer to B1.
"=A1+B1" -> "=A1+$B$1" -> "=A1+B$1" -> "=A1+$B1" -> "=A1+B1"

2. Calculating auto sum
After writing down the numbers, press ALT key followed by the key that houses both "=" and "+".
Real quick...is't it ;-)

Saturday, September 4, 2010

मेरा ही दृष्टिकोण

सुथरी सड़कें और धुली धूप, हल्का हल्का सा हल्कापन
ये शहर वोही ये जगहें वोही, फिर क्यूँ लगती थी कमी कोई
और आज यहाँ जब सभी वोही, फिर भी है कुछ तो आकर्षण

सुबहे जब था उंनीदापन, कहीं न जाने का था मन
फिर भी निकला, आलस भूला
अनुभव भी बदल गया अब तो, उर्जा से भरा हुआ है तन

चेहरे पे लगती है ये हवा, अब कितना अच्छा लगता है
देख रहा हूँ क्या बाधा है, कैसे मुझे हरा पाती है
तनी दृष्टि भी ढूंढ़ रही है, बाधाएं बौनी लगती हैं

आकर अब जाना है मैंने, राज छिपा दृष्टिकोणों में
दो बूंद छलकती जैसे लपकीं, गौतम के अनुभव के प्याले से
मेरा जीवन मेरा दर्पण, समय, चेतना के बंधन में

Monday, August 23, 2010

Musings of Gustav - The arrival!

To him, the experiential part of preparing and applying for a job has been a little alien.
So many years of working and yet not having exercised this choice. No strategy, no planning all these years. A pure survival in all true sense so far. Now our boy has chosen to be in the grinder.

Veamos lo que sucede a nuestro hombre!!

Thursday, July 29, 2010

Bling-bling!!

Navya - New Laptop for kids
Anita - Gold Ornament or a sleek cell phone or ... ?
Rahul - Yet another book :-)

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Monday, April 5, 2010

मेडीटेशंस - द्वितीय अध्याय (किश्त - २)

ईश्वर की इस दुनिया में सब कुछ ईश्वरीय इच्छा के फल स्वरुप ही होता है जिसे किस्मत कहते हैं. किस्मत का खेल प्रकृति का ही हिस्सा है - किस्मत के तारों से बुना हुआ ताना बाना. सब कुछ इसी ईश्वरीय इच्छा से घटित होता है - आवश्यकता तथा संपूर्ण विश्व के भले की भावना भी सभी घटनाओं के कारकों में सम्मिलित होते हैं. तुम भी तो इन्हीं सब के अंश हो.

प्रकृति का प्रत्येक हिस्सा प्रकृति द्वारा ही निर्मित है और सबका भला उसमे निहित है.

विश्व का विन्यास (Order of the World) विश्व में फैली हर चीज़ पर अलग-अलग तथा सभी पर समग्र (wholly) रूप से निर्भर करता है. सो जो अभी तुम्हारे पास है वो पर्याप्त भी है - ये सिद्धांत है.
पुस्तकों के प्रति अपनी भूख से पीछा छुड़ाओ - मृत्यु शय्या पर पहुँचने के समय तुम्हारी दशा शिकायती या बडबडाते हुए न होकर शालीनता से भरी व ईश्वर के प्रति सद्भावना से भरी होनी चाहिए.

ध्यान दो कि जीवन में कब से तुम टाल मटोली में फंसे हो, ईश्वर से समय दान पाते जा रहे हो और फिर भी उस बढे समय का सदुपयोग करने में असमर्थ ही हो.
अभी वह समय है जब उस विश्व को, उसके रूप को समझो जिसका तुम हिस्सा हो. उस महँ नियंत्रक के खेलों को समझो जिसका तुम स्राव मात्र हो.जान लो कि यहाँ तुम्हारा समय निश्चित है और इसका इस्तेमाल करते हुए अज्ञान के अन्धकार से बहार निकलो अन्यथा समय के साथ साथ तुम भी चले जाओगे और ऐसा मौका दोबारा न आएगा.

प्रत्येक क्षण एक रोमन नागरिक तथा एक पुरुष होने के नाते जो कार्य सामने है उसको पूरी चेष्टा के साथ समझदारी, लगन, दया एवं न्याय से करो और साथ ही साथ अन्य किसी भी विचार से पीछा छुड़ा लो.
ऐसा तभी हो पायेगा जब तुम हर काम को ऐसा मानते हुए करो कि जैसे तुम्हारे जीवन का अंत समय अब निकट है. अपना सुस्त रवैया छोडो, तर्क कि जगह उन्माद में आकर काम करने की आदत से बचते हुए दिखावा या आत्म प्रेम की पराकाष्ठ से बचते हुए, अपनी किस्मत का रोना की आदत से बचते हुए किसी काम को अंजाम दो.

देखो कि किसी व्यक्ति को ईश्वरीय जीवन बिताने के लिए कितनी कम बातों का साथ चाहिए.
 ईश्वर भी उस व्यक्ति से कोई अपेक्षा नहीं रखते जो इन सब बातों का ध्यान रखता हो.

आत्म हानि से तो अपनी ही आत्मा को दुःख पहुँचता है - आत्म सम्मान खो देने का सबसे सुलभ रास्ता है ये. हममें से हरेक का जीवन एक क्षण भर का है. तुम्हारा जीवन अगले ही क्षण लगभा समाप्त ही है, रही अगर अब भी आत्म सम्मान न दिखलाया तो तुम्हारा भला तो दूसरों की आत्माओं पर ही निर्भर हुआ न.

क्या बाहरी संसार और इसकी बातें तुमको दिग्भ्रमित (distract) करती हैं?
अगर ऐसा हो तो अपने आपको अच्छी सीख सिखलाओ और इस सांसारिक भटकाव से अपने आप को रोको.

अगर ऐसा कर पाने में सफल हुए हो तो अन्याय प्रकार के भटकाव से भी रोको - उन् लोगों के बहकावे में न आओ जो लगभग मरा हुआ सा जीवन जी रहे है और जो अपने क्षणिक उन्माद पर अपनी जुबान व कर्म दोनों से ही लक्ष्यहीन हैं.

दूसरे के दिमाग में क्या चल रहा है, ऐसा पढ़ पाने कि असमर्थता तुम्हारी नाखुशी का कारन कभी नहीं होती; बल्कि हमेशा ये देखो कि तुम्हारे भीतर क्या चल रहा है (self awareness) ये न जान पाना जरोर तुम्हारी अपनी नाखुशी का कारण रहेगा.

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क्रमशः

 

Sunday, March 21, 2010

मेडीटेशंस - द्वितीय अध्याय (किश्त - १ )

जर्मनी के क्वादी प्रान्त में, ग्रान नदी के तट पर लिखा गया।
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प्रातः उठने पर अपने आप को बताओ कि आज मैं ऐसे लोगों से मिलने वाला हूँ जो हस्तक्षेपी, कृतघ्न, आक्रामक, धोखेबाज़ या शैतानी सोच के मालिक हैं और साथ ही असामाजिक भी। वे लोग खुद भी अच्छे बुरे की समझ अपनी समझ न रखने के कारण इन परेशानियों में फंसे होते हैं।

मुझे ज्ञात है कि अच्छा वही है जो न्यायसंगत भी है जबकि बुरा अन्यायपूर्ण।

एक अन्यायी तथा मुझमें कोई खास अंतर नहीं है - रक्त या बीज, सब एक जैसे ही तो हैं - सामान बुद्धि तथा ईश्वरीय योग्यता, तो फिर उनके हाथों में क्योंकर नुक्सान उठाऊँगा। अपनी कमी से मुझको कोई न प्रभावित कर पायेगा - अपने नायबों से न नफरत और न ही क्रोध करता हूँ मैं।

हम सभी का जन्म परस्पर सहभागिता के लिए हुआ है जैसे कि दोनो पैरों या हाथों या पलकों या कि जबड़ों में होता है। आपसी शत्रुता तो प्रकृति विरुद्ध ही है।

जो भी हो - मेरा अस्तित्व हाड-मॉस, साँसें या नियंत्रक मस्तिष्क से ही है। हाड-मॉस तो ऐसे है जैसे कपडे या तारों का जंजाल, सांस भी हवा ही तो है -उसको शरीर के अंदर या बाहर आना जाना होता है। पुस्तकों को छोड़कर व् कोई भी इच्छा न रखकर ये सोचो कि मरते वक़्त बुढ़ापे में इन इच्छाओं कि गुलामी हट जाए , असामाजिक गतिविधियाँ कोई प्रेरण न दे पायें, वर्तमान कोई अकुलाहट न दे और भविष्य किसी प्रकार कि आशंका न पनपाये।
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क्रमशः

Tuesday, March 16, 2010

मेडिटेशंस -प्रथम अध्याय (किश्त-९)

ईश्वर का आभारी हूँ मैं जिन्होंने मुझे ऐसे सदगुणी दादा, माँ-बाप, बहन, अध्यापक, सहयोगी, परिवार, रिश्तेदार, मित्र आदि सभी कुछ दिया; साथ ही मुझको भी उनकी शान में गुस्ताखी करने कि भूल से बचाए रखा - हालाँकि मेरा ऐसा स्वाभाव तो है ही कि यदि ऐसा अनचाहा मौका आ पड़ता तो शायद मैं ऐसी भूल कर बैठता; लेकिन ईश्वरीय कृपा से ऐसा हो न पाया।
ये ईश्वर की ही कृपा है कि मैं अपनी परवरिश के दौरान अपने दादा की उस महिला मित्र के साथ न घुल मिल पाया। मेरा अपनी युवावस्था में न भटकना व इस अवस्था के साथ समयपूर्व परीक्षणों में न उलझना अच्छा ही रहा। ऐसा करने में शायद कुछ ज्यादा देर ही लगाई होगी मैंने।

ईश्वर का धन्यवाद जिन्होंने ऐसे शासक एवं पिता के अधीन किया जिसने अहंकार से परे रखते हुए ये अहसास कराया की महल में अंगरक्षकों , जड़ाऊँ वस्त्रों, मशालों या अपने बुतों के बिना भी रहा जा सकता है। एक शासक आम नागरिक की भांति रह सकता है ये उन्होंने ही समझाया; ऐसा करने में वह किसी प्रकार से घट न जायेगा।

ईश्वर का इन सभी बातों के लिए धन्यवाद - ऐसा भाई दिया जिसने मुझको अपनी खुद की देखभाल करना सिखलाया। जिसका प्यार व सम्मान मुझको सुखद अनुभव कराता था। मेरे बच्चे शारीरिक विकृतियों से मुक्त पैदा हुए थे। मैं व्यर्थ भाषण बाज़ी, कविताओं या ऐसी अन्य बातों में ज्यादा न उलझा वर्ना अगर ये मुझे जाँच जाते तो शायद मैं इन्ही का होकर रह जाता।

ईश्वर का इन सभी बातों के लिए धन्यवाद - मैं अपने अध्यापकों को उनकी अपेक्षा अनुसार, उनकी युवा अवस्था में ही, उचित पदों तक पहुंचा पाया। मैं अपोलोनियस, रुस्तिकस व माक्सिमस से परिचित था।


ईश्वर का इन सभी बातों के लिए धन्यवाद -मुझे यह ज्ञात था कि प्रकृति अनुसार जीवन यापन कैसा होता है। ईश्वरीय इच्छा, सहायता व प्रेरणा से मुझे ऐसा जीवन जीने में बाधा न आई। अगर ऐसा करने में थोड़ी बहुत कमी रह भी गयी हो तो वो मेरे ही किसी दोष के चलते होगी कि मैं ईश्वर के संकेतों को भांप न पाया। ईश्वर की कृपा से ही मेरा शरीर इस प्रकार के संघर्षशील जीवन में भी सुद्रढ़ बना रहा।

मैंने बेनेतिक्टुस या थेओदोतस को कभी न छुआ। ईश्वर की इच्छा से ही ( sexual passions ) में पड़ जाने के बाद भी मैं बाहर निकल आया।

रस्तिकुस पर कई बार क्रोधित होने पर भी मेरा उसके प्रति व्यवहार शर्मिंदगी की हद तक न गया था।

ईश्वर की ही कृपा थी कि मेरी माँ , जो जल्दी ही चल बसी, अंतिम दिनों में मेरे ही साथ थी।


ईश्वर का इन सभी बातों के लिए धन्यवाद - जब भी मैंने किसी गरीब की मदद करना चाह तो कभी यह सुना कि धन की कमी से हम ऐसा करने में असमर्थ होंगे। में भी कभी ऐसी स्थिति में नहीं फंसा था। मेरी पत्नी जो कि प्रेम करने वाली, परिस्थितियों से अप्रभावित, अक्सर सहमति जताने वाली है। मेरे बच्चों को अच्छे अध्यापकों का आभाव कभी न रहा था।

मुझको को तो स्वपन में भी काफी ईश्वरीय मदद मिली है - भांति भांति कि बिमारियों से बचने का ज्ञान। रूचि होने के बावजूद भी मैं विभिन विषयों के फेर में न पड़ा था, जैसे - साहित्य, तर्क, खगोल आदि से सम्बंधित ज्ञान।

ईश्वरीय वरदान से ही तो बहुत से ऐसे काम जीवन में हो पाते हैं।

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प्रथम अध्याय समाप्त।

क्रमशः


Wednesday, March 10, 2010

मेडिटेशंस - प्रथम अध्याय (किश्त - ८)

(औरिलियस अपने पिता के बारे में...)
वे किसी प्रतिभावान व्यक्ति को, जो अच्छा वक्ता, ज्ञानी, कानूनविद या नैतिक्शास्त्री या ऐसे ही किसी अन्य विषय या क्षेत्र से आता हो, से मेरे पिता बिना ईर्ष्या किये उसको उसका सामाजिक संस्थानों में उचित स्थान दिलाने में मदद करते थे।

वे परम्पराओं के अनुसार चलते तो थे पर परम्पराओं को बनाये रखने कि वकालत या प्रदर्शन उन्होंने नहीं किया था।

वे परिवर्तन के शोकीन तो न थे; एक ही जगह रहते रहना व अपनी बनी बनायीं आदतों का पालन करना ही उनका स्वभाव था। कभी तेज सिरदर्द उनको होता था तो उसके ख़त्म होने के तुरंत बाद काम पर उसी जबरदस्त उर्जा के साथ लौट आते थे जो दर्द के पूर्व थी। उनकी जिन्दगी में बहत कम ही बातें गोपनीय रहीं थीं और वे भी सब जन गतिविधियों से ही सम्बंधित थीं।

प्रदर्शनों, भवन निर्माणों या दान-चंदों में होने वाले खर्चों में वे उतनी उदारता न दिखलाते थे। उनका पूरा ध्यान इस पर होता था कि किया क्या जाना है न कि इस पर कि काम की वाहवाही कितनी होगी।

अनुचित समय स्नान न करते थे वो।

अपने लिए मकान बनवाने, स्वादिष्ट पकवान खाने, अपने कपडे की गुणवत्ता या रंग - इस सब से ज्यादा वास्ता नहीं रखते थे वो; और न ही अपने गुलामों के रंग रूप में ही कोई रूचि।

उनके कपडे लौरियम नमक जगह से आते थे। वहीँ उनका पैत्रक घर था। हमें ज्ञात है कि उन्होंने टसकुलुम में उस कर-संग्रहण अधिकारी से कैसा अच्छा व्यवहार किया था जो उनसे क्षमाबहा याचना कर रहा था।

उनमें कठोरता, हिंसा या जिद न थी। पसीना बहा देने की हद तक किसी बात को जाने ही न देते थे। उनका तरीका जल्दबाज़ रहित, व्यवस्थित, प्रभावकारी तथा निश्छल होता था।

सुकरात के जिन गुणों से हम सब वाकिफ हैं, उन् पर वो सब लागू होते थे जैसे - मानो विनोद करने या उसके निषेध पर वे नियंत्रण कर पाते थे, जब जैसा आवश्यक हो; अधिकतर लोग कर पाने के लिए आवश्यक इच्छा शक्ति का अभाव रखते हैं।

जहाँ जरूरी हो वहां दृढ़ता तथा जहाँ जरूरी हो वहां नरम रूख - यही सम्पूर्ण व अजेय आत्मा के स्वामी कि पहचान है। मेक्सिमस ने अपनी बिमारी के दौरान ऐसा ही व्यवहार प्रदर्शित किया था।

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क्रमशः

Tuesday, March 9, 2010

Life is an intersting mix of surprises

When one thinks that everything is back on track, "bhaiya! all is well again and I need no extra gyan", suddenly a realization brings one back to an uncomfortable feeling or what they say - "there is something wrong here" syndrome.

The search for more gyan begins immediately.
This is what is happening to me right now!!

Found some more gyan and the links are here for some curious souls:

1. Millindapanho or other buddhist texts
http://www.buddhanet.net/ebooks.htm
http://www.buddhanet.net/ebooks_s.htm
http://www.buddhanet.net/ebooks_ms.htm

2. Hindu - Shaiva text
http://www.himalayanacademy.com/resources/books/mws/mws_table_of_contents.html


In the process of creating a win in a major battle...fear has been a constant companion...stopped hating it though...return with the results soon!!

- Rahul