Sunday, August 16, 2009

मेडीटेशंस - प्रथम अध्याय (किश्त - ४)

१० अलेक्सेंडर दी ग्रामेरियन (भाषाविद अलेक्सेंडर) से सीखा: दूसरों की गलतियों पर बखेडा न खड़ा किया जाए; जब कोई शब्द या व्याकरण या उच्चारण की गलती करे तो उसमें नुक्ताचीनी या व्यवधान न डाला जाए बल्कि सफाई से उस बात का सही रूप प्रस्तुत किया जाए - उत्तर या पुष्टि के द्वारा और या फिर उसी बात पर विचार विमर्श के द्वारा न कि स्वयं को आनंदित करने हेतु बीच में बोलकर या बीच में ही उसका सही रूप प्रदान करके।

११ फ्रोंतो से सीखा: जलन या द्वेष, पाखंड, संदेह - तानाशाहों या रोम के संभ्रांत लोगों के व्यक्तित्व का भाग हैं। ऐसे लोगों में मानवीय प्रेम का प्रायः आभाव होता है।

१२ अलेक्सेंडर दी प्लाटोनिस्ट से सीखा: शायद ही कभी, जब तक कि ऐसा करने का कोई विशेष आवश्यक कारण न हो, किसी को भी कभी ये न कहा या लिखा जाए कि "मैं बहुत व्यस्त हूँ" ; न ही ऐसे किसी बहाने का सहारा लेते हुए, वर्तमान परिस्थितियों को दोष देते हुए, हमारे सगे सम्बन्धी जो साथ रहते हों, उनके प्रति अपने कर्तव्यों के निर्वहन से लगातार बचते रहना।

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क्रमशः

गुस्ताव - एक कहानी (भाग- २)

गुस्ताव ने "नीड़ का निर्माण फिर" के पन्ने पलटना शुरू कर दिया। बाहर की गर्मी की अपेक्षा अंदर का ताप कम तो था ही, साथ ही साथ वातानुकूलन के कारण बड़ा ही सुकून पा रहा था वो उस कमरे में।
आंखों के सामने रखी किताब को छोड़कर मन शायद कहीं और निकल चुका था।

किस्से कहानियों का शौक उसे बचपन से ही था। उसने कभी बचपन में एफिल टावर की कहानी पढ़ी थी। गुस्ताव नाम तो उसे इतना जंचा कि मन ही मन अपने आप को यही नाम दे दिया अपने अंतर्मन में। नाम तो कुछ और ही दिया गया था उसे पर नौ साल की उम्र से ही आत्म-संबोधन में गुस्ताव ने उसके वाह्य नाम को विस्थापित कर दिया था

गुस्ताव एफिल उस फ्रांसीसी इंजिनियर का नाम था जिसने एफिल टावर को सन १८८७ में तैयार कराया था।

Tuesday, August 4, 2009

परीक्षा


Gustav - A Story (Part -1)

Gustav was lost somewhere deep in a trail of thoughts as he cycled his way, it was almost like the bicycle was moving on its own. The fulfillment of having a stimulating conversation with Roshan in the comfort of his newly air-conditioned room – Gustav was almost nostalgic with few similar memories. The bicycle almost paddled on its own. He almost lost a heartbeat as the cycle suddenly wobbled past a completely unexpected speed breaker. It was enough to pull him back to the present moment.

Finally he was at Roshan’s house. He punched the bicycle bell while parking it right in front of the house, opened the gate and walked straight into the gallery. Rani, Roshan’s pet Pomeranian, dashed across the gallery and clung to Gustav’s legs as he struggled to maintain his balance. Roshan suddenly appeared in the gallery from inside his room as he pushed aside the drapes, almost violently. The drapes hung in the middle of nowhere were seemingly just an add-on to the annoyance of having been pulled out from his afternoon siesta which was almost apparent on his face. “Sir! Why don’t you try your luck with an afternoon nap sometimes? – a vain attempt at hiding his irritation. Gustav almost went blank. “Dropped in to pick a novel” – he lied to straighten things out.

Roshan went back into his room, back to his cozy slumber. Gustav walked over to the cubboard and picked up three unread and visibly ‘never-opened-before’ books. He studied them carefully – one was a random poetry collection, the other one was a piece of Harivansh Rai Bachchan's biography and the last one was something on Economics. The genres of the books were almost as random as the thoughts racing across his mind…

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(To be continued...)

Translated into English by Sushant Patnaik.