Sunday, July 26, 2009

मेडीटेशंस - प्रथम अध्याय (किश्त - ३)

अपोलोनिअस से सीखा: अपना स्वामी स्वयं बने रह पाना, स्वयं के लिए कुछ भी स्वतः घटित होने देने के लिए न छोड़ना, कभी क्षण भर के लिए भी तर्क का मार्ग न छोड़ना, तेज़ वेदना (दर्द) या कि अपने बच्चे कि मौत और या ही लम्बी चली बीमारी - सदा एक से ही बने रहना। जीता जागता उदाहरण था वो एक तीव्रता और ठहराव का, अपनी बुधिमत्ता और दार्शनिक ज्ञान का कभी बहुत फायदा नहीं लिया सिर्फ़ अपने लिए। उसने ही मुझे सिखलाया कि मित्रों से मदद लेने कि स्तिथि में भी कैसे अपनी शान को बरक़रार रखा जाए और अगर उनको मना भी कैसे करें जो उन्हें बुरा न लगे।

सेक्स्ट्स से सीखा: दयालुता, एक पिता कि भांति एक परिवार कैसे चलाया जाए इसका प्रतिरूप (मॉडल) भी, प्रकृति के अनुसार जीवन यापन, अप्रभावित हुयी शान, मित्रों के लिए सहानुभूति, साधारण या कम ज्ञान रखने वालों के प्रति सहनशीलता, सबके अनुरूप अपने आप को ढाल लेना जिससे सहमति का वार्तालाप हो सके और उसमे से चाटुकारिता कि बू न आए, लेकिन साथ ही ऐसे व्यवहार के दौरान लोग उसका बहुत सम्मान भी करते थे; जीवन के मूल सिद्धांतों की खोज और उनके स्थापन में उसकी योग्यता, कभी भी क्रोध या किसी अन्य भावना में न बहना, इस सभी से मुक्त होकर मानवीय सदभाव रखने की योग्यता, तारीफ़ करते हुए ज्यादा शोर शराबा न करना, और अधिक ज्ञान का स्वामी होने वे बावजूद उसका दिखावा न करना
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क्रमशः

Tuesday, July 21, 2009

Epictetus and Enchiridion

On the very first page of the Meditations, I met Epictetus. Epictetus was the greek philosopher who lived from 55AD to 135AD, almost 80 years. Once a slave, this greek philosopher came from the same school of stoic philosophy as the emperor Marcus himself. Both of them were the late Stoas.

Stoic
philosophy stresses on rising above the emotions to reach to a level where thinking becomes unbiased and one uses reason or logic as a way to deal with whatever life throws.

The primary works of Epictetus are - Discourses and Enchridion (means a Hand-Book), which were collected by his son Aaron.

Monday, July 20, 2009

A Good Travel Blog Found!

"Google searches at times bring forth some thing that we were not really searching for in the first place, but the some of the links redirect us user to something so engrossing that one tends to forget what he was really looking for."
Many a times all of us must have heard or experienced it ourselves.
I have found the following link "bilkul aise hi" :
http://www.yogeshsarkar.com/
This blog details the nitty-gitties of biking out to the extreme interiors of North India.

Thursday, July 16, 2009

Pondering Over...

Few changes in the past few days:

1. Removing the hindi translation of "The Alchemist" as it is surely a violation of the copyrights of the original owner and it might result in revenue loss for them.

In fact, when I started translating it, I had no idea of its reach - it it would reach so many people and it could possibly endanger the revenue for the publisher. Initially, when I started the blog, I thought of translating it for me, my family and my friends. I wanted to enjoy the process of translation and enjoy it word by word.

Now, after removing it from the blog, I am seeking / writing to the publisher to see the posibility of publishing it on the blog.

2. Lately I also thought of an invented/created future of hindi blogging...but somehow completing the same in English here.

Here is goes:
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For a few days, I have been thinking on lines of the "Open Source Movement" for the future that could be created by hindi bloggers.

A community of volunteers of the hindi blogging community. On the lines of the open source movement, they start enriching the hindi language by bringing in the richness from the literature written in the other languages in the world e.g. from Russian, Japanese, Chinese, French, Spanish, Portugese etc.

Since most of the bloggers come from different professions, and knowing that most of them are not doing blogging commercially - the cost of such enrichment can also be kept minimal.

Unlike Russian, Chinese, Japanese etc, hindi language pays a heavy price of the natural ability of Indians being comfortable in English. I am not sure whether on its own, the hindi language would enriched that fast without setting such a target in the first place.

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Tuesday, July 14, 2009

हिन्दी ब्लॉग्गिंग का भविष्य - हमारी जिम्मेदारियाँ

हिन्दी ब्लॉग्गिंग के भविष्य पर अपने निहायत निजी विचार सार्वजनिक करना विवादस्पद हो सकता है, इसका अंदाजा है मुझे। लेकिन पिछले दिनों अचानक शुरू हुए विचार अपने मंथन से कुछ प्रेक्षण इकट्ठे कर बैठा जो पहले पहल बड़े ही विचित्र से और असंभव से जान पड़े। ऐसा भी लगा कि कहीं ये मेरी, सामने उपस्थित तथ्यों के बारे में व्यक्तिगत समझ तो नहीं। अब ऐसा तो हर बार होता है - मेरी समझ तो हमेशा मेरी व्यक्तिगत ही रहेगी। इस विचार के साथ साथ ये भी जान पड़ा कि मेरे विचारों से सबको अवगत कराने से कुछ नई संभावनाओं का सृजन हो सकता है।

मोटी मोटी बात कहूँ तो मेरा मानना है कि हिन्दी भाषा और ब्लॉग्गिंग का कुछ हिस्सा अगर नियंत्रित माहौल में एक ख़ास उद्देश्य कि प्राप्ति के लिए एक परियोजना की भांति कुछ समय तक चलाया जाए और अंतत ये उद्देश्य हासिल किए जाएँ।

परियोजना के उद्देश्य :
१ - हिन्दी (और इसकी प्रेरणा से अन्य क्षेत्रीय भाषों से भी) बड़े जन समूह को इन्टरनेट पर प्रकाशित
सामग्री की ओर लाना।
२ - हिन्दी के एक नए शब्दकोष का विकास
३ - हिन्दी विकास को अंग्रेज़ी विरोध या अंग्रेज़ी को दी गई प्राथमिकता को हिन्दी विरोध मानने की
धारणा का खंडन
४ - हिन्दी को चीनी, जापानी, स्पेनी , रूसी, पुर्तगाली, अरबी, जर्मन, फ्रेंच या अन्य भाषाओँ की भांति तरह
तरह के साहित्य से समृद्ध करना
५ - जहाँ हिन्दी के शब्द उपलध न हों वहां अंग्रेज़ी को हिन्दी के सहायक भाषा मानते हुए अंग्रेज़ी से
शब्दों की पूर्ति करना
६ - हिन्दी और अंग्रेज़ी के भाषाई आधार से जन्मे सामाजिक अंतर को पाटने में मदद करना व
सृजन को अपना आधार बनाना


आपने लेख के आगे के हिस्से को में तीन भागों में बाँट रहा हूँ:
१ - हिन्दी भाषा और हिन्दी ब्लॉग्गिंग का वर्तमान
२ - हिन्दी भाषा और हिन्दी ब्लॉग्गिंग का इसी वर्तमान पर आधारित भविष्य
३- नये और कई प्रकार के, परिणामोन्मुखी मोडलों की सहायता से एक तय भविष्य का निर्माण

१ हिन्दी भाषा और हिन्दी ब्लॉग्गिंग का वर्त्तमान


वर्तमान में यह साफ़ सिखाई पड़ता है कि पुरानी कुछ सदियों के विपरीत आने वाली कुछ सदियाँ ( चलिए सिर्फ़ अगले १० सालों के भविष्य का अनुमान लगते हैं) लड़ाईयों या आक्रमणों से ज्यादा व्यापार, टेक्नोलॉजी और खोजों से जुड़ी होंगी। व्यापार, टेक्नोलॉजी या खोजें - विशुद्ध रूप से सृजन से ही जुड़ी है। इनके विकसित होने में मानवीय वैचारिक आदान प्रदान का बड़ा ही महत्त्व है जो सीधे सीधे भाषा से जुडा है। भारत में, अपने इतिहास के चलते, समाज में एक भाषाई दरार है जो एक पूरी कि पूरी जेनरेशन को हीन भावना से भर रही है। यहाँ सरकारी स्कूलों में, सरकारी नीतियों के चलते हिन्दी में पढाई होती है, जो आग चलकर व्यक्ति को कुछ अपूर्ण रह जाने का अहसास दिलाती है जिसका भराव पटाव वो अंग्रेजी से पूरा करता है। हाँ हरेक ऐसा नहीं कर पाता। अंग्रेज़ी माध्यम से शिक्षा प्राप्त लोगों को ऐसी अपूर्णता नहीं होती।
अभी चल रही हिन्दी ब्लॉग्गिंग उसी स्थान में रहकर चल कदमी करने जैसा ही है। ब्लोग्गिन का मुख्या उद्देश्य अपने विचारों को समय रेखा पर दिन प्रति दिन रखते चले जाना है। ये विचार भी हरेक की अपनी अपनी योग्यताओं, भावनाओं और परिस्थितियों से आते हैं। मुख्यतः रिपोर्टिंग और प्रतिक्रियात्मक लेखन का पटल है ब्लॉग्गिंग। हाँ, जो लेखक थोड़े सृजनात्मक लेखन में भी दखल रखते हैं उनको भी इस माध्यम से न केवल अपनी रचनाओं लिखने वरन उन् को लोगों तक पहुँचने का सस्ता व् अच्छा माध्यम मिल जाता है। हिन्दी ब्लोग्गिन से हिन्दी भाषा की समृध्धि में योगदान तो मिलता है परन्तु ये सब कुछ "under one roof" न होने ऐसा योगदान काफ़ी "haphazard" है।


२ हिन्दी भाषा और हिन्दी ब्लॉग्गिंग का इसी वर्तमान पर आधारित भविष्य


सभी कुछ इसी प्रकार कहते रहने पर, आने वाले समय में भी हिन्दी भाषा को हिन्दी ब्लोग्गिन से मिलने वाला योगदान बहुत बड़ा न कहलायेगा। समग्र तस्वीर को एक साथ देखें तो मालूम पड़ता है कि भाषा को ब्लॉगर दल से नई चीज़ों की जानकारी तो प्राप्त होगी, परन्तु अधिकत लोगों को फिर भी अंग्रेज़ी सीखकर ही आगे बढ़ना पड़ेगा। चीनी या जापानी भाषीयों के उलट हम हिन्दी भाषा कि कमियों को दूर करने के बदले या तो हम उसकी कमी को सहते चले जायेंगे या उसे अंग्रेज़ी ज्ञान से पाटेंगे। आने वाली पीढियां भी वर्तमान पीढी के अंग्रजी को प्राथमिक भाषा मानकर चलने से हिन्दी भाषा और हिन्दी ब्लोग्गिन को अगले १०-२० साल में विलुप्त हो जाने का खतरा भी है।


३ नये और कई प्रकार के, परिणामोन्मुखी मोडलों की सहायता से एक तय भविष्य का निर्माण

एक पुराना और परखा हुआ मॉडल है - "ओपन सोर्स मूवमेंट" पर आधारित मॉडल। जिस प्रकार १९८४ के बाद से कम्प्यूटर प्रोग्रामर्स के एक बड़े धडे ने सॉफ्टवेर विकास का आधार व्यावसायिक महत्त्वाकांक्षा की जगह स्वतंत्रता और क्वालिटी रख दिया और माइक्रोसॉफ्ट और ओराक्ल जैसी कंपनियों के सामने लिनुक्स, मोजिला, माय सीकुअल, विकिपीडिया, वर्ड प्रेस और अन्य तमाम शानदार सॉफ्टवेर बना दिए। इन प्रोग्रामर्स में से अधिकतर विश्वविद्यालय के छात्र थे। अधिकतर का इस प्रयास में धन उपार्जन न होता था। परन्तु कुछ पाहे से तय उद्देश्यों कि प्राप्ति में उन्होंने एक नये ही भविष्य का सृजन कर दिया जो शायद ऐसा न होता अगर सभी लोग सॉफ्टवेर विकास के उद्देश्य को सिर्फ़ व्यावसायिक महत्वाकांक्षा ही मानते चले जाते।
अगर हम हिन्दी ब्लोग्गिन के एक समूह को इसी मॉडल पर कुछ पहले से तय उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए चलायें जहाँ लोगों का सहयोग, न्यूनतम खर्चे में ही कुछ नया सृजन करे। यह निश्चित ही पहले से तय भविष्य तो पाये ही साथ ही प्रक्रम में उत्पन्न नई संभावनाओं को भी आगे बढ़ हासिल करने में मदद करेगा।

Saturday, July 11, 2009

मेडीटेशंस - प्रथम अध्याय (किश्त - २)

४ अपने दादाजी से मैंने सीखा कि जनता- जनार्दन के स्कूलों (उन दिनों में) कि बजाय घर पर ही अच्छे शिक्षकों से पढ़ना चाहिए। यह भी कि इस सबमें खर्चे कि परवाह न करनी चाहिए।

५ अपने अध्यापक से सीखा कि सर्कस या दौड़ में नीले या लाल दल का पक्ष न लूँ और न ही एक दूसरे को मौत के घाट उतर डालने वाले ग्लेडीएतरों के खेल में हलके या भारी दलों का पक्ष। साथ ही साथ ये भी कि दर्द को कैसे सहा जाए; इच्छाएं कम ही रखी जाएँ; अपने हाथ से काम करने को वरीयता; अपने काम से ही काम रखना - दूसरों के मतलब में टांग न अडाना; और भर्त्स्नाओं या दुर्भानाओं से प्रेरित चुगलियों से अप्रभावित रहना।

दिओगनेटस से सीखा कि बेमतलब कि या तुच्छ बातों में ज्यादा उत्साह न दिखलाया जाए; जादू, चमत्कारों या ऐसे ही कमाल दिखलाने का दावा करने वालों, प्रेत भागने वालों पर भरोसा न किया जाए; बटेर की लड़ाई या ऐसे ही किसी और खेल को बढ़ावा न दिया जाए; बोलने की स्वतंत्रता हो; दर्शन शास्त्र से लगाव रखा जाए, इन सबके भाषण सुने जाएँ - (नामों के इसी क्रम में) बाचिअस, टेनदसिस और मर्सीअनुस; कम उम्र से ही लेख-निबंध लिखे जाएँ; शिविर का सख्त बिस्तर, ओढ़ने का कम्बल और ग्रीक परम्परा की अन्य ऐसी ही चीज़ों के प्रति लगाव विकसित किया जाए।
रस्तिकस से सीखा कि ख़ुद को बेहतर करने की इच्छा रखी जाए; शब्दों के आडम्बर (जन समूह के आगे) के चस्के से बचा जाए; न अपने अनुमान या कयास प्रस्तुत किए जाएँ; न ही दिखावे के लिए अपनी अनुशासित या उदार बना जाए; शब्दों के सुंदर दिखावे से भी बचा जाए; घर में खास अनुष्ठानों के कपड़े पहन कर न घूमा जाए;
पत्र लेखन सहज साधारण ही रखा जाए - जैसा रस्तिक्स ने सिनेओसा से मेरी माँ को लिखा था; जिन्होंने भी मुझे बुरा भला कहा सुना हो उनसे जल्दी ही सम्बन्ध वापिस सामान्य कर लिए जाएँ, जैसे ही वो इसके लिए तैयार हो जाएँ; गौर से पढ़ना, पुस्तक पढ़कर उसकी छिछली समझ पा कर ही संतुष्ट न रह जाना; लोगों से जल्दी या आसानी से सहमत न हो जाना; प्रसिद्ध ग्रीक दार्शनिक एपिक्टेट्स के उपयोगी लेख रस्तिक्स ने मुझे अपनी व्यक्तिगत पुस्तक से पढ़वाए थे।

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क्रमशः
नोट: मेडीटेशंस का एक तात्पर्य है अपने आप से की गई बातें। यह पुस्तक मार्कस औरिलिय्स के अपने आप से किए गए वार्तालापों का ही संकलन है। इसके कई अंग्रेज़ी अनुवाद होने और उन सभी में थोड़ा फर्क होने के कारण यहाँ इस हिन्दी अनुवाद का उद्देश्य किसी एक अंग्रेज़ी संस्करण का अनुसरण न कर एक रोचक हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत करना है जो मूल रूप में कई अंग्रेज़ी संस्करणों से आता होगा।

Thursday, July 9, 2009

मेडीटेशंस - प्रथम अध्याय (किश्त - १)

१ अपने दादा वेरुस से (की भांति) मैंने शालीनता और नर्म स्वभाव पाया है।
२ जैसा लोग कहते भी हैं, और मुझको भी ऐसा याद है, अपने पिता से (की भांति) मैंने सम्पूर्णता और पुरुषत्व पाया है।
३ अपनी माँ से मैंने सीखा : धर्मनिष्ठा, उदारता, ग़लत करने से बचना - यहाँ तक की इसके विचार से भी, जीवन की सादगी, धनिकों की आदतों से परे रहना।


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मेडीटेशंस एक महान रोमन शासक मार्कस औरिलियस द्वारा लिखी गई
एक प्रसिद्ध पुस्तक है जिसमें उसने अपने विचारों को संगृहीत किया है।

मेरी इच्छा इस ग्रीक भाषा में लिखे ग्रन्थ के इंग्लिश अनुवाद को
हिन्दी में प्रस्तुत करना है।

पुस्तक के बहुत से संस्करणों में से एक यहाँ है : क्लिक करें
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तस्वीर विकिपीडिया के सौजन्य से।