Sunday, June 28, 2009

गुस्ताव - एक कहानी (भाग- १)

दिमाग तो जैसे कहीं और ही खोया हुआ था, हाँ साईकिल जरूर सड़क पर ही चल रही थी, मानो अपने आप। रोशन के घर पहुंचकर उसके नए एसी की ठंडक में गपियाने का मजा - गुस्ताव मन ही मन पुराने लगभग मिलते जुलते अनुभवों से दो चार हो रहा था। साईकिल के पैडल अपने आप पड़ते जा रहे थे। एक बड़े ऊँचे से स्पीड ब्रेकर नीचे आते ही साईकिल उछल गई, धक् से दिल की कई धड़कने गायब हो गयीं, वास्तविकता में लौटा लाने को इतना काफ़ी था।

रोशन का घर आ चुका था। उसने साईकिल बाहर ही लगा कर घंटी बजाई और गेट खोलकर गैलरी तक जा पहुँचा। रानी, रोशन की पामेरियन कुतिया, भागकर बाहर आई और गुस्ताव के पैरों में लिपटने और उन्हें चूमने लगी। गिरते गिरते बच ही गए भाई साहब । तभी रोशन परदे को तेजी से बांयीं और झटक कर अंदर के कमरे से बाहर गैलरी में निकल आया। परदा इतनी बड़ी अड़चन तो नहीं था पर शायद उसके नींद से अचानक जागने से चिडचिडाहट चेहरे पर आ ही गई थी जो परदे के वहां बेवजह टाँगे जाने से बढ़ गई। "दिन दुपहरी थोड़ा आराम ही कर लिया करो महाराज", रोशन ने अपनी चिडचिडाहट दबाते हुए कहा। गुस्ताव को कुछ न सूझा । "नोवेल लेने आया था", गुस्ताव ने झूठ बोलकर बात साधी।

अंदर चलकर रोशन फ़िर से सो गया। गुस्ताव ने आगे बढ़कर अलमारी से कुछ पहले कभी न पढ़ी गई और शायद कभी खोली भी न गई तीन किताबें निकाल लीं। गुस्ताव उन्हें गौर से देखने लगा एक कोई कविताओं की किताब थी, दूसरी हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा का एक खंड और तीसरी अर्थशास्त्र की।

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क्रमशः