Friday, January 16, 2015

Japani-1

उस दिन मैं शिकागो से अबु-धाबी आ रहा था। एतिहाद एयरवेज का जहाज अब उड़ान की शुरूआती कश्मकश के बाद सहज हो चुका था।  खिड़की की सीट तो मिली पर एक तो वो हवाई पंख पर थी और दूसरा ये कि रात घिर चुकी थी सो बाहर झांककर कुछ देख सकने का कोई मतलब नहीं था सो मैंने अपने इकॉनमी सीट पर अपने आप को भी इकोनोमिकली बैठाते हुए सामने स्क्रीन पर फिल्मे ढूंढ़ना शुरू किया। इकॉनमी क्लास में ड्रिंक्स लाने में क्यों देर करते हैं ये लोग? मैं भन्नाया और स्क्रीन पर "रेन"  (RAN) नाम की अकिरो कुरसवा की फिल्म लगा ली।
स्क्रीन पर जापानी में लिखे नाम उभरने और मैं फिल्म को वहीँ चलता छोड़ दूर निकल गया।

कोजी-सान.…
मेरा नाम कोजी है और आप मेरे नाम के बाद कृपया "सान" न लगाएं - उस लड़के ने कहा।
ठीक है, मैं आपको कोजी ही बुलाऊंगा।
हाँ ये ठीक रहेगा।

कोजी मैं आपकी मदद चाहता था यहाँ आस-पास की जगह घूमने के लिए।
हाँ मैं चल सकता हूँ, मुझे ख़ुशी होगी। मेरा ऑफिस में आज का काम खत्म हो गया है सो चलिए चला जाये।

अच्छा तो आप यहीं रहते हैं, मैंने पूछा।
हाँ पास ही में।

और खाना,

......अभी और लिखना है

Saturday, August 2, 2014

अरुण कोलटकर की कविता "मनोहर" का हिंदी अनुवाद

देख खुला दरवाज़ा, मनोहर
एक और मंदिर में झाँका।  

कौन से प्रभु से यहाँ मिलूंगा
विस्मय संग अंदर को आया।   

ज्यों उसने वहां बछड़ा पाया
तुरंत कूद वो बाहर आया। 

एक और मंदिर था जाना
पर ये तो गौशाला निकली।

अंग्रेजी में लिखी मूल कविता

सम्यक दृष्टि

कुछ हैं, जिनकी समझ बड़ी है
बात समझते रहते हरदम
समझ-समझ के हेर फेर में
रहते तले ये नासमझी के

बुद्ध कह गए सम्यक दृष्टि
कहाँ कठिन सी बात कही है
इसको भी तू बूझेगा तो
"समझ" अकल में गिरह लगी है

Monday, July 14, 2014

कुछ अंग्रेजी शब्द (जिनमे से कुछ सीधे सीधे अब हिंदी में भी इस्तेमाल होते हैं) जिनका उद्गम जापानी भाषा में है

ये जानना बड़ा ही मज़ेदार है कि काफी शब्द ऐसे हैं जो अंग्रेजी में जापानी भाषा से आये हैं।
एक छोटी लिस्ट ये रही:

1.  फुटों (FUTON) - एक किस्म का गद्दा
2.  होंचो (HONCHO) - लीडर या मैनेजर
3.  कराओके (KARAOKE) - पहले से रिकार्डेड ट्रैक पर साथ साथ गाना गाना
4.  रिक्शा (इंग्लिश RICKSHAW, जापानी JINRIKISHA)  - साईकिल रिक्शा
5.  सुनामी (TSUNAMI) - बड़ी समुद्री लहर जिसका कारण भूकम्प रहा हो
6.  टायकून (इंग्लिश TYCOON, जापानी (TAIKUN) - धनी-मानी व्यक्ति

ये भी देखें:
10 अंग्रेजी के शब्द जो जापानी भाषा से आये
100 काम के जापानी शब्द
कुछ शब्द इधर उधर से, जो अंग्रेजी में नहीं हैं!

Saturday, July 5, 2014

असग़र वजाहत साहिब से भेंट

यह बात '94 से '96 के बीच की रही होगी। उन दिनों हिंदी की इंडिया टुडे बिना-नागा हमारे घर में खरीदी जाती थी, जो पहले एक मासिक पत्रिका थी पर बाद में पाक्षिक आने लगी। तब इंडिया टुडे में छपने वाली हिंदी कहानियों के लेखकों में तीन नाम मुझे याद आते हैं - असग़र वज़ाहत, ज्ञान प्रकाश विवेक और मनोहर श्याम जोशी।

तब हिंदी इंडिया टुडे के किसी अंक में एक कहानी छपी थी, जो तब बड़ी पसंद आई थी - लेखक, असग़र वज़ाहत।

समय के साथ बहुत कुछ बदला। सूचना तकनीक की क्रांति तो बाद में आई, पर हमारे घर इंडिया टुडे का यूँ खरीदा जाना काफी पहले ही बंद हो गया था। जरूरत जो नहीं रह गयी थी।
 
कुछ साल पहले असग़र वजाहत की एक किताब का नाम फिर सामने आया।  यह ईरान का यात्रा वृतान्त था  - "साथ चलते तो अच्छा था"। पढ़ने की बड़ी इच्छा हुयी पर ना किताब कहीं दिखी और न मैंने  ही उसे कहीं ढूंढा। अभी दो साल पहले की बात है, ये यात्रा वृतान्त  फ्लिपकार्ट की वेब-साइट पर दिखाई पड़ा;  तुरंत खरीद लिया गया। पढ़ने का अनुभव भी मज़ेदार रहा।

सोचा तो था ही नहीं कि कभी वज़ाहत साहिब से मिलना नसीब में बदा होगा। इसी साल, मई में उनसे अचानक मिलना हो गया।  एक प्रिय मित्र जो उनकी कहानियों का अंग्रेज़ी अनुवाद कर रहे हैं, उनके साथ मैं भी वज़ाहत साहिब से मिलने जा पहुंचा।  अपने आइकॉन से मिलना न भी कहूँ तो भी ये काफी कुछ वैसा ही रहा। पूरा वक़्त उन्हें ध्यान से सुनता रहा मैं। चलते चलते उन्होंने अपना नया, स्व-हस्ताक्षरित, पाकिस्तान यात्रा वृतांत मुझे भेंट किया।

चलते समय ही, उनके किसी कहानी-संग्रह के पन्ने पलटते हुए, इंडिया टुडे में तब छपी वही कहानी फिर दिखी - "मैं हिन्दू हूँ"।


Monday, May 5, 2014

नया-पुराना हिंदी लेखन

यूँ ही, हाल मे एक सज्जन टकरा गये। बात साहित्य की हो चली तो उन्होने हिंदी साहित्य के एक बड़े नाम, भगवती चरण वर्मा का जिक्र किया। मैं अब तक हिंदी के पढ़े साहित्य मे "राग दरबारी" और "गुनाहों का देवता" का ही नाम लेता चला आया था। हाल ही में निर्मल वर्मा के "अंतिम अरण्य" और "वे दिन" भी खरीदकर मैने पढ़ डाले थे जो मेरी पढ़े गये हिंदी नोवेल्स की लिस्ट मे दो नई प्रविष्टियाँ बनी थीं।
इन सज्जन से मिलने के बाद, कुछ ही दिन पहले, मैंने हिंदी के साहित्य मे गहरा ग़ोता लगाने का निश्चय किया।    इनकी अनुशंसा के मुताबिक भगवती चरण वर्मा कृत "चित्रलेखा" खरीदी और पहले ही दिन आधी पढ़ डाली।

हिंदी में नया और अच्छा साहित्य अब देख़ने को नहीं मिलता है। कुछ दिन पहले जब एक नयी प्रकाशित किताबों मे से एक मंगवायी तो उसे पढकर बड़ी निराशा हुई।  लेखन स्तर इतना गिर चुका है कि लोग कुछ भी लिख रहे हैं और प्रकाशित करा पा रहे हैं - हैरानी है। लगता है जैसे हिंदी के चेतन भगत की जगह खाली है और ये नये लेखक जैसे तैसे भागकर, तैरकर या उड़कर उस गददी पर विराजमान होना चाहते हैं।

हिंदी में अंग्रेजी और साथ ही अन्य भाषाओँ का सहित्य प्रकाशित होना बहुत अच्छी बात है लेकिन साथ ही मौलिक लेखन भी होना चाहिए। कहाँ से आयेंगे मौलिक लिखने वाले और उनको पढ़ेगा कौन?

विचार के साथ ही रुक जाता हूँ आज.…

Wednesday, February 19, 2014

To find the root cause - 5 whys Technique

5 Whys Technique - This technique was developed at Toyota. Using this approach, one can bypass the assumptions and logic traps and climb up from the effect to cause as explained by its wiki article: 5 Whys

This technique demonstrates that going through this iterative process of seeking the cause backwards would bring the seeker to a point where the root cause shows up as some broken process.

Sunday, February 2, 2014

Reading List - Fiction & Non-Fiction (2014)

Fiction:
1. Norwegian Wood**
2. Kafka on the shore**
3. One Hundred Years of Solitude
4. Memories of My Melancholy Whores**
5. Siddhartha (Hermann Hesse)
6. Fight Club
7. The Remains of the Day
8. Animal Farm
9. Unbearable Lightness of Being
10. My Name is Red
11. Such a Long Journey
12. The Stranger*
13. Antim Aranya (Hindi) **
14. Ve Din (Hindi) ** 
15. Chronicle of a Death Foretold**

Non-Fiction:
1. From Where You Dream
2. Confessions of a Buddhist Atheist*
3. The Naive and Sentimental Novelist**
4. Zen and the art of motorcycle maintenance
5. Made in Japan
6. Manufacturing Consent


** Finished Reading
*  Currently Reading


Sunday, January 5, 2014

जापान यात्रा वृतांत

अकेले कहीं जाने में स्वंतंत्रता के भाव के साथ साथ एक डर और असुरक्षा के भाव का भी समन्वय रहता है; मेरी जापान की यात्रा कुछ ऐसी ही रही।
टोक्यो के लिए एयर इंडिया की नयी नयी शुरू हुयी उड़ान सीधे 7:30 घंटे में इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से नरीता हवाई अड्डे पहुंचा देती है। दिल्ली में हवाई अड्डे पर सारी औपचारिकताएं पूरी करके मैं एयर इंडिया के जापान जाने वाले ड्रीमलाइनर में जा बैठा। उड़ान सँख्या AI-306 ने रात 9:15 पर उड़ान भरी और सुबह लगभग 8:00 बजे मैं नरीता एअरपोर्ट पर था।
एअरपोर्ट से बाहर आकर मैंने एअरपोर्ट-लिमोजीन नाम की बस सेवा का टिकट लिया और चल पड़ा मेरी मंज़िल योकोहामा की ओर. 3500 येन का ये बस टिकट थोड़ा महंगा तो लगा, लेकिन सुना जो था कि जापान एक महंगा देश है। एअरपोर्ट से योकोहामा तक की दूरी तकरीबन 100 किलोमीटर है जो बस लगभग 1:30 घंटे में पूरी करती है।

रास्ते भर मैं नींद में भरा होने के बावजूद आँखे खुली रख इर्द-गिर्द के नज़ारों का आनंद लेता रहा। कहीं भांति भांति की  कारें तो कहीं दनदनाती हार्ले डेविडसन मोटरसाइकिलें, तो कहीं साधारण साइकिलों पर पीछे बंधी प्लास्टिक सीटों में अपने बच्चों को बिठाकर घूमते उनके जापानी अभिभावक। सब कुछ चमचमाता, नया नया सा। मैं जैसे किसी नशे से अभी अभी जागा, हतप्रभ सा ये सब रास्ते भर देखता रहा और मेरी बस योकोहामा आ पहुंची।

Y-CAT स्टेशन पर उतारकर मैंने सब-वे तक (subway) (वहाँ कि भूमिगत लोकल ट्रैन) पहुँचने का रास्ता ढूंढ़ना शुरू किया जो मुझे इसेजकीचोजामाची (Isezakichojamachi) स्टेशन ले जाने वाली थी. अपने सामान को लेकर इस सब-वे को ढूंढ़ने में होने वाली असुविधा के चलते कई बार मन हुआ कि होटल तक टैक्सी कर लूँ लेकिन जापानी टैक्सियों के महंगे किरायों के बारे में इतना सुना था कि हिम्मत न हुयी। आखिरकार सब-वे भी मिल ही गया और मैं थका मांदा इसेजकीचोजामाची स्टेशन पर पहुंचा। वहाँ पहुंचकर नया संघर्ष शुरू - होटल का दिशा भ्रम। 

जापान में भी हर व्यक्ति को अंग्रेजी ज्ञान तो नहीं है लेकिन मदद करने के मामले में वे बहुत विनम्र हैं।  पूछते पाछते आखिरकार मैं Flexstay Inn Yokohama आ पहुंचा। चौड़ी सड़कें और पैदल चलने के सिग्नलों से मेरा वास्ता दिल्ली में पड़ा तो है लेकिन यहाँ का अनुभव कहीं बेहतर था।

अपने कमरे का मुआयना करके मैंने अपना सामान रखा और थोडा आराम करके वापिस रिसेप्शन लौटा जहाँ रिसेप्शन क्लर्क युसुकी मिनामी (Yusuki Minami) ने मेरे लिए कामाकुरा जाने के विवरण का प्रिंटआउट तैयार रखा हुआ था (जापानी आथित्य का एक और उदाहरण).

होटल के पास ही कन्नाई (Kannai) स्टेशन था जहाँ से मुझे ओफुना (Ofuna) स्टेशन तक जाना था; ओफुना से ट्रैन बदलकर कामाकुरा (Kamakura) स्टेशन; और कामाकुरा से इनोशीमा इलेक्ट्रिक ट्रैन (Enoshima Electric Train) पकड़कर हासे (Hase) स्टेशन। हासे स्टेशन के पास ही कामाकुरा के प्रसिद्ध अमिताभ बुद्ध की प्रतिमा है। शाम के कुछ घंटे इस विश्व प्रसिद्ध स्थल पर बिताकर मैं ट्रेनों और स्टेशनों के उसी क्रम में वापिस लौटा।

बात आती है कि इस दिन मैंने खाया क्या ? पहले दिन मैंने ग्रीन टी फ्लेवर की आइस क्रीम का आनंद उठाया और होटल के पास वाले KFC में डिनर लेकर सोने चला गया।

सुबह, काम का पहला दिन, सारा रिसर्च और प्लानिंग धरी की धरी रह गयी।  स्टेशन पहुंचकर वहाँ से अपने ऑफिस पहुँचने का रास्ता ढूंढने में अच्छी खासी कसरत हो गयी मेरी। एक महिला ने बड़ी मदद की और योकोहामा स्टेशन से Sogo स्टोर्स की ओर जाकर निस्सान ग्लोबल सेंटर तक मेरे साथ चलकर मुझे रास्ता दिखाया। वहाँ से ऑफिस पहुंचा आसान था।

ऑफिस पहुंचकर जल्दी ही लंच किया। मैंने गौर किया कि जापान में घड़ी के हिसाब से लंच जल्दी ही कर लिया जाता है। कुछ पतली पतली मच्छलियों के तंतु से पड़े थे उस इटालियन डिश में, जो उस दिन मैंने खाई।  काम निपटाकर ऑफिस के सभी साथियों के साथ मैं उनकी योजनानुसार सुशी (Sushi) रेस्टोरेंट चल पड़े।  उस शाम को मैंने अपने उन जापानी साथियों के साथ सुशी और साके का लुत्फ़ उठाया। मेरे हिसाब से, एक भारतीय स्वाद की तुलना में जापानी सुशी का स्वाद बिलकुल अलग तरह का है - अच्छे और बुरे से कहीं अलग।

 काम के हिसाब से अगला दिन, पिछले दिन की पुनरावृत्ति ही रहा।  ऑफिस के अधिकतर लोग टोक्यो या अन्य दूर कि जगहों से आते थे।  शाम को ऑफिस के ही एक जापानी साथी के साथ, जो योकोहामा में ऑफिस के पास ही रहता था, मैं मिनातो मिराइ(Minato Mirai) नाम की जगह घूमने निकला जो ऑफिस के पास ही थी। टोक्यो बे किनारे मिनातो मिराई एक आधुनिक उप-नगर है।  तमाम शॉपिंग मॉल, ऑफिस, रेस्टोरेंट और अन्य मनोरंजन की व्यवस्थाओं वाला ये शहर रात की रौशनी में गज़ब का नज़र आता है।  इसी उपनगर में जापान की तीसरी सबसे ऊंची इमारत लैंडमार्क टावर (Landmark Tower) है।  इन जगहों पर घूमते, फ़ोटो खींचते, मैं और मेरा साथी एक ब्रिक स्टोन से बनी एक इमारत के सामने आ पहुंचे जो पहले कभी एक स्टोर हाउस रही थी; आज इस इमारत में बहुत से रेस्टोरेंट हैं।  वहीँ एक रेस्टोरेंट में हमने डिनर किया।  खाना एक पोर्क डिश थी जिसका स्वाद काम चलाऊ ही था। वहाँ से निकल हमने कुछ वसाबी (Wasabi) (एक प्रकार की जापानी चटनी) खरीदी और अपने अपने ठिकाने लौट गए।

तीसरा दिन भी ऑफिस में वैसे ही गुज़रा और शाम को मैं अकेला ही मिनातो मिराई घूमने निकल पड़ा। पहले मैंने लैंडमार्क टावर के 69 वें फ्लोर से योकोहामा को निहारा जिसके लिए मैंने 1000 येन चुकाए। इसके बाद घूमते घूमते मैंने पिछले दिन वाले रास्ते को अकेले ही तय किया और आखिर में जा पहुंचा यामाशिता पार्क (Yamashita Park)। वहाँ कुछ समय गुज़ार कर मैं होटल वापिस लौट गया।  इस दिन डिनर में था मैक डॉनल्ड्स का बर्गर और चिकन नगेट्स।

चौथे दिन ऑफिस के लोग देर से आने वाले थे और तय हुआ कि दोपहर बाद मिलेंगे; इस का फायदा उठाकर मैं पैदल घूमता घामता यामाशिता पार्क पहुंचा और वहाँ से पास ही सोका ग़ाक्काई (Soka Gakkai) नामक बौद्ध आर्गेनाइजेशन का ऑफिस है।  भारत में भी सोका ग़ाक्काई बहुत प्रसिद्ध है और मैं भी काफी समय से सोका ग़ाक्काई के पारवारिक उत्सवों में जाता रहा हूँ।  यामाशिता पार्क के सामने बने इस ऑफिस में जाकर मैंने तोदा मेमोरियल हाल देखा और वहाँ से पैदल पैदल ऑफिस चला आया।  मीटिंग्स ख़त्म करके मैंने ऑफिस के पास ही योकोहामा स्टेशन के पास के बाज़ार में समय बिताया और वहीँ एक रेस्टोरेंट में अनजान से भोजन किया जो पनीर जैसा दिख रहा था।  हाँ, उसका नाम अंग्रेजी में पता करने के लिए मैं उसका फ़ोटो लेना नहीं भूला। अगले दिन पता चला कि वोह सोयाबीन का पनीर यानि टोफू था. ये दिन भी ख़त्म और मैं होटल में वापिस।

पांचवां दिन मेरा ऑफिस के लिए आखिरी दिन था। दोपहर तक काम ख़तम करके मैं ऑफिस के साथियों के साथ ही लंच करने गया। इस तैरते रेस्टोरेंट में खाने में हमने टूना मच्छली और ग्रीन टी का स्वाद लिया। साथियों के साथ ऑफिस की ओर हम पैदल ही लौटे। कुछ फोटो खींचने के बाद मैंने साथियों से विदा ली और वहाँ बे में नाव की सवारी करने चल पड़ा।  इसके बाद मैंने यामाशिता पार्क के पास खड़े हिकावा मारु (Hikawa Maru) नाम के एक द्वितीय विश्व युद्ध के समय के जहाज़ को देखा जो आज एक संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया है।  इसके बाद मैं चल पड़ा इनोशीमा के लिए जहाँ मुझे समुद्र तट, माउंट फुजि और तत्सुनुकुची के दर्शन होने वाले थे। योकोहामा से कामाकुरा वाले ही रास्ते पर कामाकुरा से आगे इनोशीमा स्टेशन है; पास ही सोका ग़ाक्काई में अक्सर जिर्क किया जाने वाला एक स्थल तत्सुनुकुची है। तत्सुनुकुची वही जगह है जहाँ निचिरेन दाईशोनिन (Nichiren Daishonin) का सर कलम किया जाने वाला था जो किसी देवीय चमत्कार से अंत समय पर टल गया था। यह जगहें देख कर मैं वापिस योकोहामा स्टेशन लौटा और अपने जापानी साथी के साथ हो लिया जिससे न तमाम बैटन के दौर चले बल्कि लौटने की खरीदारी में भी मुझे मदद मिली। आज का खाना अब तक का सबसे महंगा खाना था - एक बड़े रेस्टोरेंट में बीफ की कोई डिश।
इस साथी के साथ बाज़ार में इधर उधर घूम कर मैं जापानी जीवन को एक जापानी की नज़र से समझने की कोशिश करता रहा। होटल वापिस लौट कर मैंने अगले दिन की योजना बना ली।

अगला दिन खाली था।  टोक्यो जाने के लिए मैंने दोपहर में ट्रेंन पकड़ी और जा पहुंचा टोक्यो स्टेशन। वहाँ से हातो बस (Hato Bus)  सेवा द्वारा 5000 येन में आधे दिन का टोक्यो भ्रमण मज़ेदार रहा। बस में अलग अलग देशो से आये लोग थे। टोक्यो टावर और गिंजा के पास से गुज़रकर हमने इम्पीरियल पैलेस देखा जो जापान के सम्राट का आधिकारिक निवास है।  वहाँ से निकल हमने एक प्रसिद्ध बौद्ध मंदिर सेंसो-जी देखा, एक जापानी डिश यकितोरी खायी और चल पड़े सुमिदा नदी में नौका भ्रमण के लिए।
टोक्यो यात्रा ख़तम कर मैं योकोहामा वापिस लौट आया।

अगले दिन जल्दी ही मैं नारिता एअरपोर्ट के लिए निकल पड़ा। रास्ते भर जापान यात्रा को फ्लैशबैक में सोचता हुआ मैं बस के शीशे से अपने सामने आने वाली हर चीज़ को घूरता सा एअरपोर्ट आ पहुंचा। जहाज से लौटते हुए रास्ते में वहाँ माउंट फुजि और हिंदुस्तान के पास आकर माउंट एवेरेस्ट के दर्शन हुए.

अपने घर पहुँचने में गज़ब की शांति मिलती है चाहे आप जापान से ही क्यूँ न लौटे हों; बस घर वापिस आकर मैंने स्वादिष्ट भारतीय भोजन का स्वाद उठाया जिनसे मैं पिछले कई दिन से वंचित था।












Friday, October 25, 2013

A poem for little "Insiyah" on her first birthday!

नन्ही सी हैं ये उँगलियाँ, नन्ही सी जान है तू ;
तू गुम है अपने खेल में, हाँ! मेरी जान है तू।

जीने की कश्मकश में, भूला था मैं जिसे कब;
अहसास जिन्दा होने का, हाँ! होता है मुझे अब।

बचपन में अपने मुझको, चाहत थी सयानेपन की;
अब आके मैंने जाना, बचपन ही बेहतर था।

कभी ऐसा भी लगे है, छोटा सा हूँ अभी मैं;
जीना शुरू किया है, बस साल भर से मैने।

जो वक्त गुजरता है, वापिस नहीं है आता;
तुझे गोद में जो ले लूँ, तो ये भी ठहरता है।

शुक्रिया तेरा "इन्सिया", घर मेरे जो तू आयी;
जीने का अब मज़ा है, जो साथ तू ले आयी।

पहले का जो था जीना, भूले हैं हम अभी तो;
रिश्ता हमारा तूने, गाढ़ा ही बस किया है।

लेकर तुझे चलें तो, देखें हैं सब हमें भी;
नई किस्म की ख़ुशी का आनंद हमने पाया।

फरिश्तों के पास जो है, वो सब मिले तुझे भी;
बचपन की खासियत भी तू साथ ही सहेजे।

जीने की राह पर जब, आगे तू बढ़ती जाए;
जो कुछ भी हो मुनासिब, हासिल वो सब तू करले।

है शुक्रिया तेरा "इन्सिया", खुशियाँ जो सब तू लायी;
तू गुम है अपने खेल में; जीना ही अब मज़ा है।

Thursday, June 27, 2013

Searching Older E-mails in Gmail

Type the following query in the search box shown:

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Thursday, May 16, 2013

Albert Camus - The Outsider

Few good links on Albert Camus:

http://www.guardian.co.uk/commentisfree/2006/apr/12/books.comment

http://www.macobo.com/essays/epdf/CAMUS,%20Albert%20-%20The%20Stranger.pdf


Tuesday, January 1, 2013

"यशवंत राव" - अरुण कोलटकर की एक इसी नाम की अंग्रेजी कविता का हिंदी अनुवाद

==============
भगवान ढूँढ़ते हो?
मैं जानता हूँ एक भगवान को।

नाम यशवंत राव है उसका
अच्छे भगवानों में से एक।

कभी जेजुरी जाएँ तो 
मिल आना उससे।

हालाँकि वो दोयम दर्जे का भगवान् है
मुख्य मन्दिर के बाहर है रहता।
उस बाहरी दीवार के भी परे।
जैसे कोई कारीगर या फिर कोई कोढ़ी।

जानता हूँ कुछ ऐसे भी भगवानों को भी
सुन्दरतम चेहरे
या पूर्णतः दोषरहित। 
भगवान् जो तुम्हारा स्वर्ण चाहें।
भगवान् जो तुम्हारी आत्मा तक जाएँ।
भगवान् जो तुम्हें गर्म कोयलों पे चलवायें। 
भगवान् जो तुम्हारी पत्नी की बच्चों की मनोकामना पूर्ण करें।
या तुम्हारे दुश्मनों पे चाकू से प्रहार करें।
भगवान् जो तुम्हे जीने के तरीके बताएं,
पैसा दुगना करने के राज़ बताएं,
या ज़मीन-जायदाद तिगुनी करने के गुर।
भगवान्, जो मुश्किल से अपनी मुस्कान दबाते नज़र आते हैं 
जब तुम मील भर सरकते हुए उससे मिलने पहुँचते हो।
भगवान् , जो तुमको डूबा के मारेंगे
अगर तुमने उन्हें एक मुकुट न दिया।
मेरे हिसाब से, यद्यपि ये सभी प्रशंसा के पात्र हैं,
या तो बहुत सुडोल से
या फिर बहुत ही नाटकीय।


यशवंत राव
किसी लावे के टुकड़े जैसा,
जैसे चमकता पोस्ट बॉक्स,
प्रोटोप्लास्म का सा जिस्म
या लावे का बड़ा सा गोला
किसी दीवार से सटा हो
एक हाथ नहीं, न ही एक पैर
सर भी तो सिर्फ एक ही नहीं है इसका।

यशवंत राव,
एक भगवान जिससे तुमको मिलना होगा।
यदि तुम्हारा कोई अंग भंग हो
यशवंत राव तुम्हारे लिए हाथ बढ़ा देगा
और उठाकर खड़ा कर देगा तुम्हे, तुम्हारे ही पैरों पे।

यशवंत राव कुछ विलक्षण सा नहीं करेगा।
ये संसार तुम्हारे नाम नहीं लिख देगा वो
और न ही तुम्हे अगले अंतरिक्ष यान में स्वर्ग जाने हेतु कोई सीट दिला देगा।
हाँ यदि हड्डियाँ टूटी हों
तो जोड़ देगा।
तुम्हे अपने ही शरीर में सम्पूर्ण होने का अहसास करा देगा वो
साथ ही ऐसी आशा भी कि तुम्हारी आतंरिक शक्ति ही तुम्हारा ख्याल कर पाए।
किसी हड्डी विशेषज्ञ के जैसा है।
तुम्हे ढंग से समझ पाता है वो
क्यूंकि उसके न सर है, न हाथ और न ही पैर।

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Sunday, December 16, 2012

गाँव की यादें...

सुबह हुई,
हाथ की चक्की के पाटों के घिसने की आवाजें,
चिड़ियों के चहचहाने का शोरगुल,
झाड़ू लगाती घर की महिलाएं,
खेत की ओर निकलते पशुओं का झुण्ड -
सब घटित हो रहा था तब, अकारण, यूँ ही,
उस सब में शामिल था मैं, पर किसी का भी कारक न था।

खेलने जाते बच्चे,
किसी का बैट लाना तो किसी का बौल,
मज़ा बना लेते थे उस माहौल में,
हाँ, कंचे भी तो खेलते थे,
सर्दी में नाक लटकाते आते उस फटी पैंट वाले लड़के के पास कितने कंचे थे!

मख्खन लगी रोटी सुबह चाय के साथ खाना,
मामा के घर का लाड,
दोपहर को गेंहूँ के बदले बर्फ खरीदकर खाना,
शाम को मोहन सब्जी वाले के कलींदे का इंतज़ार,
दिन छिपते ही रजाई में दुबक जाना,
गाँव की बहुत सी यादें आज भी ताज़ा हैं।

Thursday, December 13, 2012

आत्म-वार्तालाप...1

पहले शिकायतें थीं,
अब समझौता कर लिया;
बदला कुछ नहीं।

हिदायतें देना एक आदत सी थी;
खुद भी कहाँ मानी हमने अपनी ही बात;
झेला किये नतीज़े, कहाँ जायेंगे।

सादगी से जियें या करलें मन की ही,
दोनों ही ओर भरम बराबर है;
करिए दिमाग से बेदखल, इन जोड़ घटावों को।